Thursday, 20 July 2017

इतिहास का एक पन्ना: वो गुम ताजमहल

एक दिन पहरेदार ने दूरबीन से देखा कि कुछ गोरे नाव में बैठकर इलाहाबाद की ओर जा रहे हैं। उसने तुरंत ही श्रीमंत नाना साहब को सूचित किया और उन्हें तोप से उड़ा देने की आज्ञा मांगी। पहरेदार ने ही बताया था कि नाव में औरतें और बच्चे भी हैं, स्त्रियों को मारने की आज्ञा कैसे देते श्रीमंत, मना कर दिया। उधर नाव आगे बालू में फंस गई। अब इसे मां गंगा की उन अंग्रेजों पर अकृपा मानते हुए वो पहरेदार फिर नाना साहब के पास आया और अनुमति के आवरण में सूचित कर गया कि हमें उन्हें उड़ा देना चाहिए और जाकर तोप में बत्ती दे दी। नाव में बारूद भरी थी जो गोला पड़ते ही धधक उठी और साथ ही जल मरे कुछ अंग्रेज मर्द, औरतें और बच्चे। जो 10 औरतें, 3 बच्चे और 4 पुरुष बच गए उन्हें कैद कर लिया।

ब्रह्मावर्त (बिठूर) की जेल में 8 अंग्रेज औरतों और कुछ बच्चों को कैद किया गया, 25 आदमी पहरे पर थे। सुबह दिशा-मैदान हाजत-रफा के लिए उन्हें गंगा किनारे लाया जाता और फिर वापस जेल। एक गोरी ने एक भंगिन को फोड़ लिया, एक दिन जब निपटने के बाद वो उसी जगह एक पत्र छोड़कर और भंगिन को इशारा कर जाने लगी तो एक पहरेदार ने देख लिया। लगभग तुरन्त ही पत्र खोज लिया गया और नाना साहब के सामने पेश किया गया। अंग्रेजी जानने वाले बुलाये गए जिन्होंने बताया कि खत में लिखा था कि यहां लोग अपनी जीत में मस्त हैं, फौज भी आराम कर रही है, हमला करने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा।

ये सब पढ़कर सैनिक भड़क उठे और इन औरतों को मारने चले। नाना साहब रोकते रहे कि सिर्फ उस षणयंत्रकारी औरत को गोली मारो पर उन्माद कहाँ किसी की सुनता है और ये भी कि जब दिल में किसी विशेष रंग वर्ण के लिए नफरत भरी हो तो मस्तिष्क की आंखें सो जाती हैं। जैसे कागज को कोई बच्चा चिन्दी चिन्दी कर देता है, इन पापियों ने निरपराध औरतों बच्चों को काट डाला।

हिन्दू इतिहास में ऐसा कुकृत्य कभी नहीं हुआ था। ये वो घटना थी जिसने स्वतंत्रता संग्राम को बस एक गदर भर बन जाने दिया। लोगों को लगने लगा कि इस महापाप से अंग्रेजो पर बनाई बढ़त खत्म होगी और गोरे फिर से राज करेंगे।

बस 15 ही दिन बाद तो गोरी पलटनों और मद्रासी काली पलटनों ने घेर लिया था कानपुर को। जंग शुरू हुई और ग्यारहवें दिन नाना अपने भाइयों बाला साहब और राव साहब के साथ मैदान छोड़कर बिठूर वापस आ गए और उसी रात अपनी पत्नियों सहित गंगा पार कर लखनऊ की बेगम की शरण चले गए।

इधर दूसरे दिन कानपुर में 'खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का, अमल अंग्रेज सरकार का' की घोषणा कर दी गई। पेशवा के सहायकों को गोली मार दी गई, कुछ को सरेराह फाँसी दी गई। 2 दिन लगे ये सब व्यवस्था करने में, फिर गोरी और उनकी सहायक काली फौजें चली बिठूर अपना बदला लेने। बिठूर की सड़कों पर जो आदमी मिला उसे गोली मार दी गई, घरों में घुसकर औरतों का शील लूटा गया।   हजारों लोग मरे, नगर मुर्दाघर बन गया। अगले दिन शहर लूटा गया, गोरों ने सोना चांदी, कालो ने तांबा पीतल कपड़े। 12 बजे तक शहर लूटने के बाद लुटेरे बढ़ चले श्रीमंत के महलों की ओर। तसल्ली से राजमहल को लूट कर उसमें आग लगा दी गई। राम मंदिर, उसकी मूर्ति, राजोद्यान सब तोड़ फोड़ दिया गया।

बाजीराव (द्वितीय) पेशवा ने गंगा किनारे श्री सरस्वतेश्वर महादेव मंदिर बनवाया था, जो पूरी तरह संगमरमर का था और जिसकी लागत लाखों रुपये थी।

बाजीराव जैसे भी रहे हों, अपनी पत्नी से अथाह प्रेम करते थे। सरस्वती बाई थी भी अद्वितीय। रूपसी, गुणवती, दिलदार, तेजस्विनी, न्यायपरायण, हँसमुख पर साथ ही नियम कायदों की पाबंद। इतनी कि चाहे वो कोई भी हो, गर रत्ती भर भी नियम कायदों का उलंघन करता, उसे तुरंत ही महल से बाहर करवा देती।

आप सबसे ज्यादा उसी से डर सकते हैं जिससे सबसे अधिक प्रेम करते हों, बाजीराव पेशवा भी कोई अपवाद नहीं थे। सरस्वती बाई अगर कभी बैठक में आने वाली होती तो पेशवा अपने आप-पास बैठे ऐरो-गैरों को तुरन्त हटा देते। बीमारी के कारण बाई दिवंगत हुई तो पेशवा बहुत दुखी हुए। गंगा किनारे उचित जगह देखकर उनकी चंदन कपूर की चिता जली। उसी जगह पर पेशवा ने बाई साहब की याद में एक भव्य विशाल संगमरमर के शिवमन्दिर का निर्माण कराया।

अंग्रेजों ने पूरा मंदिर तहस नहस कर दिया, शिवलिंग तोड़ दिया। वो शानदार इमारत धूल में मिल गई। वो महिला जिसे प्रजा का एक एक बच्चा प्यार करता था, उसके गुणों का बखान करता था, आज उसका कोई नाम तक नहीं जानता। उसके पति ने पत्नी का नाम चिरकाल तक अमर रखने के लिए जिस अजीम शिवमन्दिर की स्थापना की, उस सरस्वतेश्वर महादेव शिवालय दुनिया के नक्शे से बस यूं ही गायब कर दिया गया। आज उस जगह शायद कुत्ते लोटते हों या घूरा पड़ा हो।
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अजीब था ये गदर, अपने मूल चरित्र के विरुद्ध हिंदुओं ने स्त्रियों बच्चों की हत्या की, और अंग्रेजों ने कत्लेआम के साथ-साथ स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरणों, कई मंदिरों भवनों को मटियामेट कर दिया।

मेरे मन में हमेशा ये प्रश्न रहा कि क्या वास्तव में 1857 पहला स्वतंत्रता संग्राम था या सिर्फ एक गदर?
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मस्त रहें, मर्यादित रहें, महादेव सबका भला करें।


Tuesday, 30 May 2017

वे दिन

वे दिन
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गर्मी बहुत है। इतनी कि अब मच्छर नहीं काटते, मर गए सब। बस यही एक अच्छी बात है गर्मियों की। अलसाई सी सुबह है, रात भर इधर उधर करवट बदलने के बाद सुबह थोड़ी नींद आई थी कि इन चिड़ियों ने खलल डाल दी। अंगड़ाई लेता हुआ उठा, सामने सूरज धीरे से अपना सर निकाल कर झांक रहा है। ढेरों तोते सर के ऊपर से टें टें करते निकल गए। ताड़ के पेड़ पर कोई बन्दर है शायद, अरे नहीं, ये तो कोई आदमी है जो किसी सर्कस के नट की भांति जल्दी जल्दी लटकी हुई लभनियाँ चेक कर रहा है। लभनी पता है ना, वो मिट्टी के करीब 5-7 लीटर के बर्तन जिन्हें पिछली शाम के फेरे में ताड़ के फलों के नीचे लगा दिया गया था।

भरी हुई दो लभनियों को उसने अपनी कमर में लगे रस्से में ना जाने कैसे लटका लिया और सरपट नीचे उतर आया, इतनी तेज तो फौज के जवान भी ना उतर पाएं। बड़े भैया भी उठ गए हैं, मैं प्रकृति निहार रहा हूँ और वो मुझे। फिर बैठे बैठे ही हांक लगाई और वो 'बन्दर' एक लभनी घर पहुंचा गया। ऊपर तैरते, रसपान की कोशिश में शहीद कीड़ों को हटा कर ताड़ी पी, आनन्द आ गया।

ऊंचे स्वर में कोई गा रहा है, नजर दक्षिण में बहती वरुणा की तरफ चली गई, कितनी सूख गई है, पर इतनी है कि मल्लाह की नाव अपने धंदे पर लग सके। ये गीत वही नाववाला मल्लाह गा रहा है। याद आया, इससे एक कील मांगी थी, पहुंचाया नहीं अभी तक।

तपन बढ़ रही है। नीचे आ गया। पिता अखबार निगल रहे हैं, मां किचन में सज्ज है। सारे भाई हैंडपंप से नहा रहे हैं, किल्लोल कर रहे हैं। मैं भी पहुंच गया हूँ, अभी ढंग से कपड़े भी नहीं उतारे की भीग चुका हूं, पता नहीं कौन पीठ पर साबुन लगा गया। 5 मिनट में ही, बिना हाथ हिलाए पूरी तरह नहा लिया है।

नाश्ता अमीर लोग करते होंगे, इधर तो भर पेट खाना खाते हैं। शिकायतों का अंबार लगा दिया है सबने। मुझे लौकी की दाल नहीं पसन्द, मुँह फुला लिया, एक भाई को दही कम मिला, एक की खीर में गरी क्यों है, मंझले भैय्या प्याज का टुकड़ा चाहते हैं पर इतने शोर में मां सुन ही नहीं पाती। अपना हुक्का छोड़ आजी (दादी) ने मोर्चा संभाला अब, 5 मिनट में सबको राजी कर लिया उन्होंने, प्यार से डांटकर 2 रोटी अधिक खिला दी सबको। उसके बाद भी सबके पेट दबा दबा कर देखती है कि कही कोई जगह बची है तो कुछ और ठूंस दिया जाय।

दोनों बड़े भाई पता नहीं क्या ये मोटी मोटी किताब पढ़ते हैं, उपन्यास, पर हम चारों को तो कॉमिक्स पसन्द है। कोई ध्रुव तो कोई नागराज का दीवाना, पर मुझे तो बाँकेलाल और हवलदार बहादुर अच्छे लगते हैं।

लाइट हो तो दोपहर में कूलर के आगे नींद बहुत अच्छी आती है। नींद खुलने पर पता चलता है कि कूलर के आगे आपका स्थान बदल चुका है, या कूलर की दिशा ही बदल दी गई है। बताओ, इतना कपट।

शाम होने से पहले ही हम चारों निकल पड़े हैं मैदान में, आज गेंतड़ी खेलेंगे। आस पास के 10-12 लड़के भी आ गए। एक घण्टा होने को आया, पापा वापस आने की आवाज लगा रहे हैं पर छोटा जाकर "10 मिनट" और मांग लाया है। अगले एक घण्टे में हम पस्त हो चुके हैं, पसीना फूट पड़ा है, आराम कर रहे हैं कि किसी लड़के ने खींच कर गेंद मारी जो भाई को लग गई। दौड़ा के पकड़ लिया उस लड़के को और जी-भर कूट दिया अच्छे से।

वापस आये तो नहाने का एक और दौर चालू, पर इस बार ना हैडपम्प है ना कपड़े उतारने का मौका ही मिला। बड़े भैया पौधों को पाइप से पानी दे रहे थे, इस समय प्रेशर भी खूब आता है, वही पाइप हम लोगों की ओर मोड़ दिया। बेचारी चिड़िया, हमारी धमाचौकड़ी से डर कर उड़ गईं, थी भी तो बहुत, और कितने अलग अलग टाइप की।

अंधेरा होने लगा है, 50 मीटर पर स्थित तपोवन आश्रम के साधू विशाल बरगद पर बैठे गिद्धों को उड़ाने के लिए थाल और नगाड़े पीट रहे हैं, उन्हें उसी बरगद तले सोना जो है, पता चला रात में कोई बीट कर दिया तो। ये गिद्ध वहां से उड़ इधर की तरफ बीसियों ताड़ के पेड़ों पर बैठ जाते हैं। आजी भुनभुनाते हुए कहती है कि "ज्जा ये भइय्या, जाने कवन करम कइला जा कि साधू क जनम मिलल, अब बेचारी चिड़िया उड़ावत बाटा जा, अगले जनम जाने का बनबा"। हा हा हा, जैसे कोई जन्म से साधू ही पैदा होता हो, आजी भी ना...
थोड़ी देर में ही घण्टनाद और शंखनाद सुनाई देता है, घण्टियाँ बज रही हैं, मतलब शाम की आरती होने लगी। कान लगा कर सुनो तो कितना सुंदर, कितना सुमधुर लगता है इन साधुओं और भक्तों का एकलय में गाना।

रात हो गई, छत पर पानी छिड़कने के बाद सबने अपने अपने बिस्तर बिछा लिए हैं, बतियाते बतियाते कब नींद आ जाएगी, पता ही नहीं चलेगा।

आई लव गर्मी
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डेढ़ साल बाद बनारस आया हूँ। सुबह सोकर उठा और बालकनी में चाय लिए बैठा हूँ। घर के आसपास इतने नए और ऊंचे घर बन गए कि उगता हुआ सूरज नहीं दिखता, वरुणा नहीं दिखती, मल्लाह की आवाज नहीं आती, वरुणा पर पुल बने भी तो कई साल हुआ अब।

याद ताजा करने को ताड़ के पेड़ों की ओर देखता हूँ, 40-50 में से गिनती के 3 पेड़ दिखते हैं, आवाज देता हूँ तो एक 'बन्दर' बोतल में ताड़ी पहुँचा जाता है। (सुबह की ताड़ी, बिना मिलावट वाली नशा नहीं करती, स्वास्थ्य के लिए उत्तम कही जाती है।)

ना अब हैडपम्प है ना यहाँ भाई, सामूहिक स्नान अब स्वप्न है। अकेले बैठ कर खाना खाया और फेसबुक लेकर बैठ गया। दोपहर हुई तो एसी चलाकर सो गया।

शाम छत पर आ गया, मैदान बहुत छोटा रह गया है, पर एक भी बच्चा नहीं दिखता। बाबाओं का वो थाली और नगाड़े का शोर नहीं, अब गिद्ध बचे ही कहाँ जो उन्हें उड़ाने की जरूरत पड़े। नीचे आंगन में झांकता हूँ तो 2 फाख्ते और तीन चार बया दिखती हैं, पर मेरी फेवरेट गौरैया कहीं नहीं। गौरैयों की बहुत याद आती है, उनकी जाने कितनी पीढियां साल दर साल हमारे कमरे के रौशनदान में अपना घोंसला बनाती थी, हम डर के मारे पंखा नहीं चलाते थे।

समय तो हो गया, पर घण्टनाद और शंखनाद क्यों नहीं सुनाई दे रहा। क्या साधू भी बदल गए? नहीं, ध्यान से सुनों को सब सुनाई दे रहा है, पर सभी घरों में एकसाथ चलाये गए 'टुल्लू' मशीन की आवाज में, पुल के ट्रैफिक में सब दब गया हैं। हां, इस तरफ के दैत्रा बाबा मंदिर में बजता डिजिटल भजन अपने पूरे जलाल पर सभी आवाजों को दबाता हुआ मेरे सर में घुस रहा है।

रात हो गई, सोने जा रहा हूँ, फिर से वही बोरिंग दिन शुरू होगा कल।

ये गर्मी का मौसम बहुत बुरा लगता है।
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अजीत
30 मई 17

Monday, 17 April 2017

इश्क और 'सच'


"का हो अजय, आजकल बड़े स्मार्ट बन के घूम रहे हो मरदे, कउनो को छांट लिए हो का। पहिले क्लियर कर दो गुरु, बाद में बवाल नहीं चाहिए।"
"अब अइसन तो कउनो बात नहीं है परेश भैया, पर जो रिनवा है ना, हमको बहुत पसंद है। उसको देखते ही दिल बमक जाता है।"
"तो बेटा, तनी कम बमकाओ, बीबीए वाला प्रकाश तुमसे पहले दावा ठोक चुका है। हम तो कह रहे बेटा पसन्द बदल लो, खुश रहोगे।"
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फिल्मों ने वैसे ही दिमाग खराब किया होता है, रही सही कसर ये स्कूल सिस्टम, जी आई सी अलग, जी 'जी' आई सी अलग। बचपन से ही लड़को लड़कियों को एक दूसरे से इतना दूर रखा जाता है कि जब ग्रेजुएशन में ये साथ आते है तो वो भरी हुई उत्कंठा, कुंठा, हार्मोन सब ललक ललक कर बाहर आना चाहते हैं।

कोढ़ में खाज ये कुकुरमुत्ते की तरह उगे इंस्टिट्यूट। इनको बस पैसे से मतलब, कोई भी आ जाये, पैसे पूरे भरे तो सीट पक्की। एक एक क्लास में अस्सी नब्बे बच्चे, और क्लास भी मुर्गी के दड़बे जैसी। ऊपर से तुर्रा ये कि अभी तक एक दूसरे को एलियन समझने वाले छोरो छोरियों को मॉडर्न बनाना है, तो पहले जहां बेमतलब की रोक थी अब अत्यधिक खुलापन। दिमाग खराब होना लाजमी है।

सीनियर्स जूनियर लड़कियों पर अपना हक समझते हैं, बाकायदा छांटी जाती है लड़कियां, ये मेरी, वो मेरी। अजय सेकंड ईयर में था। एक साल के इंतजार के बाद उसका मौका आया था, और छांटा भी तो किसे, रीना, अब तक कि सबसे सुंदर लड़की। पर अभी अभी परेश सर ने बताया कि प्रकाश भी....।
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"अरे अजय, अजय, अबे अजयवा... सारे सुन के अनसुना करते हो।"
"प्रकाश! कैसे हो, सच में सुना नहीं, क्लास के लिए देर हो रही है, जल्दी में था..."
"बेटा, जल्दी में तो तुम हो ही, कुछ ज्यादा ही जल्दी में। सुनो, रीना तुम्हारी भाभी लगेगी, तो कायदे से रहोगे तो फायदे में रहोगे।"
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"अबे अजयवा, रुक सारे, कहाँ भागा जा रहा है...
तुमको मना किये थे ना, बोले थे ना दूर रहने को उससे। बड़ा इंट्रो लेने वाले बने हो, कल लाइब्रेरी में काहे छेंक लिए थे उसे? बोले थे ना भाभी है तुम्हारी। बिना लप्पड़ खाये नहीं मानोगे? लो सारे, आज प्रसाद लेते जाओ, तुम्हरा गोड़ तोड़ देते हैं, महिंन्ना भर आराम करो। लो चखो..."
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"अरे प्रकाश बेटा, देखो तुम्हारे दोस्त आये हैं। आज होली है, छोड़ो ये कंप्यूटर, जाओ होली खेलो, देखो सब कैसे बन्दर बने हुए हैं। एक भी पहचान में नहीं आ रहा। जाओ जाओ, एक दो घण्टे में वापस आ जाना।"
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उस होली की दोपहर पटाखों की आवाज आई थी। घर से थोड़ी ही दूर रेत के छोटे से ढेर पर प्रकाश औंधे मुँह पड़ा मिला था। रेत ने काफी कुछ सोख लिया था पर रंगत लाल थी।

कॉलेज में शोकसभा हुई थी।

प्रकाश के माता पिता अपने एकलौते बेटे का गम सह नहीं पाए, शहर काटने को दौड़ता, नौकरी छोड़ गांव चले गए।

प्रकाश के हत्यारों का कभी पता नहीं चला।

रीना कभी जान ही नहीं पाई कि कितने लड़के पागल थे उसके पीछे। सुना अपने NRI पति के साथ खुश है कही किसी और देश में।
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(सत्य घटना पर आधारित)


अजीत
18 अप्रैल 17

Thursday, 23 March 2017

रोमियो


चेतगंज से आगे एक गली में ठाकुर और बिहारी कोल्डड्रिंक के साथ सिगरेट फूंक रहे हैं। किसी काम से आये थे, अब काम हो गया तो ये निहायत ही जरूरी वाला काम निपटा रहे हैं। स्कूली लड़कियां गुजर रही हैं पर ये दोनों उनसे निर्लिप्त सिगरेट में लिप्त हैं कि कुछ बाइकर्स आ जाते हैं और फब्तियां चालू। छोड़ों लड़के हैं मस्ती कर रहे हैं, कितनों को रोकें, पर ये क्या, एक ने उनका रास्ता रोक लिया है, उसकी तरफ हाथ बढ़ा रहा है।
अब बिहारी को रोकना मुश्किल है, बोतल फेंक के दे मारी और दौड़ते हुए पहुंच गया। ठाकुर भी जाना चाहता है पर 2 कश और बचे हैं, इत्मीनान से फूंककर बिहारी से आ मिलता है। दोनों ने मिलकर उन 4 लड़कों की अच्छी खबर ली। लड़कियां पहले तो डरती हैं फिर मुस्कियाते हुए निकल लेती हैं।
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ठाकुर अपनी फ्रेंड के साथ बैठा है एक पार्क में। कुछ पुलिस वाले आते हैं और हड़का कर पूछते हैं यहां क्या कर रहे हो?
ठाकुर: बैठे हैं।
पुलिस: क्यों बैठे हो?
ठा: टहलने का मन नहीं इसलिए।
पु: जबान लड़ाते हो?
ठा: जवाब देता हूँ।
पु: ये लड़की कौन है?
ठा: दोस्त।
पु: तुम्हारे बाप को पता है?
ठा: पिताजी, पिताजी बोलिये, नहीं उन्हें नहीं पता, पर आप चाहें तो बता सकते हैं।
पु: तो घर पर ही क्यों नहीं मिलते?
ठा: क्योंकि पार्क इसीलिए बने हैं, ये रसीद देखिये, एंट्री फीस भरी है।
पु: चलो घर जाओ, भले घर के बच्चे पार्कों में नहीं आते।
ठा: आप कहते हैं तो ठीक है, पर ये रविदास पार्क है, उधर आजाद मैदान है, इन महापुरुषों के पार्क में क्या बुरे घर के ही बच्चे आ सकते हैं?
पु: चल भाग यहां से।
ठा: जी नमस्ते।
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बिहारी: यार ठाकुर, काम तो सही कर रही है गोरमेन्ट, पर जे का बात हुई, नाम तो सही रखते, एंटी रोमियो स्क्वाड, हुंह। अरे कितना सुन्दर नाटक लिखा है शेक्सपीयर ने, और जे रोमियों को ही बदनाम कर रहे।
ठाकुर: तेरी बात भी सही है पर इसी शेक्सपीयर ने बोला था ना कि "व्हाट इज इन द नेम", फिर नाम को लेकर इत्त्ता क्यों परेशान होना। चल सिगरेट इधर ला, आधी फूंक गया।
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अजीत
24 मार्च 17

Tuesday, 14 March 2017

☆ग्रे★


किसी व्यक्ति को नापसन्द करने के जितने संभावित गुण और लक्षण होने चाहिए वो सब थे सर्वेश्वर प्रसाद सिंह में। सिंह साहब मेरे पिता के शिक्षण काल के सीनियर फिर सहपाठी थे, पिता की मत मारी गई होगी जो नौकरी लगने के बाद भी इस दोस्ती को कायम रखते हुए अगल-बगल मकान खड़ा कर लिया।

छोटा कद, काली त्वचा, धूर्त आँखें, तीखी आवाज, झकड़ा मूछें, मटका पेट। ऐसे गुणों के विलक्षण संयोजन को देखकर ताज्जुब नहीं कि हम बच्चे इन्हें अव्वल दर्जे का घृणित प्राणी मानते थे। समाज की अवधारणा ही ऐसी होती है, बच्चों का क्या कसूर। ऊपर से इनके कारनामें भी कम नहीं थे।

जमाना कोई भी रहा हो, वर्तमान हमेशा ही महंगा होता है, वो तो हमें भूतकाल स्वर्णिम और भविष्य अंधकारमय देखने की आदत सी है इसलिए कह जाते हैं कि पुराना जमाना बड़ा सस्ता था। तो ऐसे ही किसी जमाने में ये महाशय लगातार चार पुत्रियों, फिर एक पुत्र बाद दो पुत्रियों के पिता बने।

हालाँकि हम खुद चार भाई और एक बहन हैं पर ये सोच कर हम पिटी फील करते थे कि देखो कैसा इंसान है, बेटे की चाह में बेटी पर बेटी पैदा करते गया। उनसे घृणा करने का सिर्फ यही कारण नहीं था, छोटी मोटी अनेक बातें थी। बचपन में मेरी हमउम्र उनकी दुहिता जब भी साथ खेलती तो उन्हें दिक्कत होती कि ये बच्चे परिवार वाला खेल क्यों खेलते हैं, और मैं हमेशा उसका पति क्यों बनता हूँ। हंसिये मत जनाब, उस जमाने में मोबाइल गेम नहीं होते थे, बच्चे यही सब खेलते थे।

गालियों के बड़े रसिया थे। ऐसी ऐसी अद्भुत गालियां निकालते कि ठेठ बनारसी भी इनके आगे पानी भरते। और गालियां अर्पण करने में कोई भेदभाव नहीं, आवाज लगाते कबाड़ी वाले हों कि सब्जी ठेले वाले, हल्ला करते बच्चें हों कि फुसफुसाती बीवी, टिटियाती टिटहरी हो कि कूंकती कोयल, टरटराते मेंढक हों या गोबर करती भैंस, ये किसी को नहीं बख्शते। गरारे की भयानक आवाज हमारी नींद तोड़ देती, सुर्ती की पीक जी घिना देती।

जब थोड़े बड़े हुए तो मैं और मेरे भाई बाल स्वभाव अनुसार शरारतें शोरगुल करते, जिसपर उन्हें हमेशा ही दिक्कत होती, अक्सर तो शिकायत करते पर कभी कभी पिता के अनन्य मित्र होने के अधिकार का इस्तेमाल कर लपड़िया भी देते।

सरकारी नौकर अधिकांशतः भ्रष्ट होते ही हैं, भ्रष्टाचार को सामाजिक मान्यता मिली ही है, तो छोटे मोटे भ्रष्ट आचरण को लोग नोटिस ही नहीं करते पर हमने इन्हें खुलेआम लूट मचाते देखा था। घर आया कोई भी आसामी उनके आंगन में रोता हुआ और घर से निकलते समय गालियां बकता हुआ ही दिखता। एक बार तो भीड़ इन्हें मारने पर आमादा थी, हम तो खुश ही हुए पर ना जाने क्यों पिताजी बीचबचाव करने कूद पड़े, मजबूरन मुझे और बड़े भाई को भी जाना पड़ा, और एक मनभावन घटना घटते घटते रह गई।
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धीरे धीरे अपनी बेटियों की शादी करते गये, सुनते कि लड़कियां बस ऐसे वैसे घरों में जैसे तैसे खपा दी गईं थी, खुश नहीं थी वे। अब दीदी बोलते थे उन्हें, बुरा लगता था और सिंह साहब के प्रति घृणा बढ़ती जाती।

अपने एकलौते बेटे की भी शादी की। समय पर प्रसव भी हुआ, और पहली सन्तान कन्या। पता नहीं उन्होंने कैसा महसूस किया होगा, पर मुझे बुरा लगा था, ऐसे घरों में लड़कियां ना ही पैदा हो तो अच्छा। पर कुछ दिनों बाद इतना ललक ललक कर उन्हें उस बच्ची को खिलाते हुए देखा कि लगा चलो आदमी जैसा हो, बच्चे को प्यार तो दे ही रहा है। उनके कहे कई सारे जुमले आज मैं अपनी बच्ची से कहकर उसे खिलाता हूँ।

पर मेरा ये भ्रम बहुत दिन तक रहा नहीं। सुना कि भाभी फिर से उम्मीद से हैं, पर फिर कुछ हुआ नहीं, कुछ दिनों बाद हवाओं में फिर से 'उम्मीद' तैर रही थी पर हुआ इस बार भी कुछ नहीं। जाहिर है कि कुछ कर-कुरा दिया जाता होगा। 4-5 सालों में कई बार ऐसा हुआ। इस आदमी पर इतना गुस्सा आता, और भाभी के लिए इतना बुरा लगता कि क्या बताऊँ। क्या फायदा औरत का इतना पढ़ा लिखा  होने का, जब कायदे से विरोध भी ना कर सके।
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पीजी के टाइम पर अपनी एक दोस्त के साथ घर और कॉलेज से काफी दूर सुंदरपुर के एक ठीकठाक रेस्टोरेंट में नाश्ता कर रहा था, अचानक ही सिंह साहब और उनके बेटे-बहू आते हुए दिखे। चोरी करते हुए रंगेहाथ पकड़े जाने वाली फीलिंग थी। क्या करूं, कहां जा कर मरूं, समझ नहीं आ रहा था। वो तीनों बैठे भी तो मेरी टेबल के जस्ट पीछे। एक झलक देखा, वो लोग अपने आप में ही डूबे थे, किसी और पर ध्यान देने की फुर्सत ही नहीं थी उन्हें। दम साध कर बैठा रहा और वे लोग भी अपने आप में ही मगन, सब चुप।

अचानक ही सिंह साहब की भर्राई हुई आवाज सुनाई दी, अपनी बहू से कह रहे थे, "बेटा, बस करो, कितनी बार, अरे मैं पालूंगा इसे, इतना पाप मत करो बेटा, नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी"।
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अजीत
15 मार्च 17

Wednesday, 22 February 2017

मैं और तू, हम


शिवराज बाबू ने जब से ये खबर सुनी है, उनके कंधे झुक से गए हैं। शाम की ठंड बढ़ चली है पर उन्हें आग में सागौन के सूखे पत्ते डालने का होश नहीं। बुझ चुकी राख में उन्हें अपने बचपन से लेकर जवानी तक की यादें एक के बाद दिख रही हैं। ना जाने किस उम्र में उनकी दोस्ती मियांपट्टी के कमालू से हो गई थी। अली बे ते सीखते समय, उस्ताद जी की मार खाते समय, पटिया के लिए खड़िया घोलते समय पता नहीं कब कमालू उन का साथी बन गया। शोख शरारतें, भोर में खरहा पकड़ने की दौड़, तीतर का शिकार, गंगा में की गई अठखेलियां, तालाब से मछली मारना, बड़े हुए तो पहलवानी का अखाड़ा, ऐसी कोई जगह नहीं थी जहां कमालू साथ ना हो। एक जैसी पगड़ी और लुंगी, कई बार तो घर वाले ही पीछे से पहचान नहीं पाते कि शिवा है कि कमालू।

घड़रोज नीलगाय का शिकार हो या चँदवा गांव की लड़ाई, दोनों की बंदूकें और लाठियां एक साथ उठती थी। और आज उसी कमालू के नवासे ने चंदन का माथा फोड़ दिया। बेटा बहू तो गंगा मैया की भेंट चढ़ गए, बस एक चंदन ही तो बचा रह गया है उनके पास। कमालू की बेवा बेटी जिस बरस अपने दुधमुँहे जमाल को लेकर गांव आई थी हमेशा हमेशा के लिए, उसी बरस चंदन हुआ था। कमालू अपना दुख भूल कितना खुश हुआ था कि ऊपर वाले ने दो दो बच्चे बख्शे उसे।

इन दोनों बच्चों में दोनों बूढों ने अपना बचपन देखना चाहा था, पर ना जाने क्या बात थी कि चंदन और जमाल कभी दोस्त नहीं बन पाए। सीधे साधे खेल में भी पता नहीं कैसे झगड़ा खोज ही लेते दोनों।

जब कमालू बिस्तर पर जा पड़ा तो शिवा कई कई घण्टे उसका हाथ थामें पैताने बैठे रहते। अपना अंतिम बखत जानकर उसने कहा था कि यार मैं तो चला, मेरे जमाल का ध्यान रखना। मिट्टी डालते समय शिवा का अपना ही एक हिस्सा जैसे मर गया था।

और आज, आज वॉलीबॉल के छोटे से झगड़े में लड़ पड़े दोनों, गबरू जवान हो गए हैं पर बचपना गया नहीं अब तक, या बचपन की ही अनजानी तकरार आज जवानी के बल पर फूट पड़ना चाहती थी। बताते हैं कि खेत से लौट रहे रमेसरा का फरुसा छीन कर चला दिया था उसने, वो तो बाकियों के दखल से निशाना गलत बैठ गया नहीं तो भगवान जाने क्या हुआ होता। ऊपरी चोट है, ठीक हो जायेगी। सब कह रहे थे कि केस कर दो, पर कमालू के नवासे को शिवा खुद ही जेल भिजवाए, राम राम।
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शिवराज बाबू खाना पीना निपटा कर सोने की तैयारी कर रहे हैं कि उन्हें सामने अंधेरे में कोई साया सा नजर आता है। कड़क कर उसका परिचय पूछते हैं तो बाबा पालगी की आवाज सुनाई देती है और वो साया आगे बढ़कर उनके पैरों में गिर जाता है। अरे ये तो जमाल है, 12 दिन से गायब था और आज अचानक ऐसे?
"बाबा, गलती हो गई बाबा, तुम तो जानते हो कि गुस्सा संभाल नहीं पाता, मेरा उसे सच में ही मारने का इरादा नहीं था, वो तो बस, अब क्या कहूँ, चैन से नहीं रहा हूँ इतने दिन, बस तुम माफ़ कर दो बाबा, मैं कल ही जेल चला जाऊंगा। नानू की लाल आंखें दिखती हैं आँख बंद करते ही, तुम माफ़ कर दोगे तो मेरा नाना भी मुझे माफ़ कर देगा।"
शिवराज बाबू की उँगलियाँ उसके बालों में फिर रही हैं, उन उँगलियों को महसूस कर वो रोये जा रहा है। माफ़ कर दिया, मियांपट्टी तक छोड़ आए उसे। वापसी में सोचते हुए चले आ रहे हैं कि काश चंदन भी ये सब भूल जाए।
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महीनों हो गए इस बात को, जिंदगी वैसी ही चल रही है, बस अब चंदन उधर नहीं जाता, जमाल इधर नहीं आता। शिवा बाबा कंबल ओढ़ कर बैठे हैं और चंदन घर में ही छोटी सी जगह पर छोटे छोटे पौधे लगा रहा है। बाबा उसे कुछ ना कुछ हिदायत दिए जा रहे हैं। ये बुजुर्ग लोग भी ना, अरे बैठे रहो ना चुपचाप, हुक्का पियो, धुँआ निकालो, शांति से करने दो काम।

अचानक गांव में शोर सा सुनाई देता है। रमेसरा ने आकर बताया कि चँदवा गांव में मैच के दौरान झड़प हो गई, जमाल बुरी तरह जख्मी है। शिवराज बाबा धम्म से खटिया पर गिर गए, आँखों के आगे अँधेरा छा रहा है। काश कि वो जवान होते तो इन चँदवा वालों को दिखा देते। तभी सामने से चंदन जाते हुए दिखता है, हाथ में तेल पिलाई हुई लाठी है, और उसने गांव को ललकार कर नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया है।

बाबा की आँखें चमक गई हैं।
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अजीत
23 फरवरी 17

Thursday, 16 February 2017

काला


सच कहूं तो मुझे घर अच्छा नहीं लगता, मतलब घर में रहना अच्छा नहीं लगता। शायद बीस बाइस की उम्र ही ऐसी होती है। बाकी दिन तो कॉलेज में कट जाते हैं, पर रविवार और छुट्टियां नहीं कटती, इसलिए आ जाता हूँ परेश के घर। परेश बिहारी है, बाप अमीर, भभुआ जिले के पुराने रईस। बेटे को बनारस पढ़ने भेजा तो लगे हाथ दो बिस्सा जमीन लेकर चार कमरे भी खड़े कर दिए। मकान बने साल होने को आया है और परेश बाबू यहां शिफ्ट कर गए हैं। तीन चेले भी साथ में रहते हैं इनके, बनारस वैसे तो सस्ता है पर फ्री में रहने को मिले तो क्या बुरा है।

मेरे घर से आठ दस किलोमीटर ही है तो पैदल भी आ जाता हूँ। उन दिनों जाड़ों में गुनगुनी धूप निकला करती थी, छत पर कुर्सियां डाले बैठ जाते थे हम। अपने अपने 'नशे' हाथ में पकड़े। मेरे हाथ में गिलास भर चाय और उपन्यास, उसके हाथ में कभी चुनौटी तो कभी चिलम। गांजे के शौकीन हैं बिहारी बाबू। खैर, उनके छत पर आने का असल मकसद पड़ोस की बिंदिया से आँख लड़ाना है। बिंदिया शैलजा मास्टरनी की हाइस्कूल-गामिनी बिटिया है। अल्हड़ यौवना, कुछ पाने को कुछ जानने को कुछ निछावर करने को पूरी तरह से उद्धिग्न। परेश बाबू की लॉटरी लगी हुई है। गाहे-बगाहे थोड़ा बहुत लेनदेन भी चलता रहता है।

शैलजा मास्टरनी भी नाजाने कैसी मास्टरनी हैं। प्राइमरी की टीचर हैं पर हमेशा अपने घर के अगले कमरे में, जिसे दूकान का रूप दे दिया है, बैठी हुई सौदा सुफल करते हुए दिखती हैं। इस दुकान में प्रत्यक्ष रूप से सुर्ती पान बीड़ी सिगरेट नमकीन बिस्कुट, और अप्रत्यक्ष रूप से गांजा भांग और अंग्रेजी बिकती है, दाम थोड़े महंगे हैं पर सर्विस टंच है। परेश बाबू को गांजे की आपूर्ति यहीं से हो जाती है।

अंग्रेजी उपलब्ध होने के बावजूद बेचू को देशी पसन्द हैं, पहड़िया से अकथा चौराहे के बीच कहीं भी और कभी भी दिख जाते हैं दीन-दुनिया से बेखबर, अधिकतर सोते हुए। सबको एक आँख से देखने वाला मुहावरा इन्हीं को देखकर बना है शायद, मतलब सोने के लिए कोई विशेष सुविधा की अभिलाषा नहीं हैं इनमें। किसी के भी घर दूकान का चबूतरा और बजबजाती नालियां सब बराबर। काम भगवान जाने क्या करते हैं। बेचू शैलजा मास्टरनी के पति लगते हैं।

नवाब अक्सर दिख जाता है शैलजा की दुकान पर। बाहर स्टूल पर बैठा रहता है और कभी बीड़ी का धुँआ तो कभी पान की पीक उगलता रहता है। इस गंदे मरघिल्ले से आदमी में पता नहीं क्या देखा इस मोटी शैलजा ने, हरदम बैठाए रखती है इसे। बेटी छत पर होंठों को दांत से चुभलाती रहती है और ये नवाब के सामने जब न तब अपना पल्ला ही संभालती दिखती है।

कल सामने वाले अधेड़ गुप्ता ने पत्थर में लपेट कर एक कागज फेंका था, बिंदिया ने अपनी माँ के लिए आया समझ झट से उठा कर पढ़ भी लिया। उर्दू-इंग्लिश की भरमार थी जो उसके पल्ले नहीं पड़ी तो कागज अपने बांके बिहारी को दे आई। ये महाशय भी कुछ खास समझ नहीं पाए तो मुझे थमा दिया। बकवास भरा हुआ था पत्र में पर ये तय था कि सारी शायरियां बिंदिया को समर्पित थी। बिहारी बाबू एक तो वैसे ही गर्म खोपड़ी, ऊपर से गांजा, आग में केरोसिन। शाम को गुप्ता जी के दो दांत शहीद।

थोड़ा आगे सिंह साहब भी हैं। 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना' की तर्ज पर ये बिजली विभाग में क्लर्क होने के बावजूद सट्टा लगाते हैं, नौकरानी में बड़ा रस लेते हैं, और अपने मकान के पिछले कमरे में जुए की फड़ चलाते हैं। उनसे सटा मकान बुधराम जी का है, पिछले साल इनकी बहु छत पर कपड़ा डालते वक्त 'दुर्घटनावश' पंद्रह फिट ऊपर से गुजरने वाली हाईटेंशन तारों की जद में आ गई थी, अब पुलिस रिपोर्ट तो यहीं कहती है। खैर...
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कुर्सी पर अधलेटा, रेलिंग पर पैर टिकाए बैठा हुआ हूँ। बिंदिया वापस जाते हुए और परेश बाबू अपने होंठ पोछते हुए आते हुए दिख रहे हैं। चार-पांच घर आगे शोर सुनाई दिया, मालुम चला कि बुधराम जी के यहां चोर घुस आया था। 10-12 लोगों की भीड़ चोर को मारते हुए सामने ही रुक गई है। परेश बाबू भी जल्दी जल्दी सुर्ती फांक कर नीचे पहुंच गए और जमा दी एक लात चोर को। शैलजा उसके लंबे बालों को पकड़ कर पूरी ताकत से हिला रही है। गुप्ता ने उसके जर्जर टीशर्ट को फाड़ दिया और नवाब ने उसकी पीठ पर पान की पीक छोड़ दी। बेचू उस चोर की मां बहन से आंतरिक सम्बंध जोड़ रहा है। बिंदिया ने बालकनी से थूक कर ही चोर के प्रति अपनी घृणा दिखा दी है। सिंह साहब पीछे से आकर उसका मुँह काला कर देते हैं। हुजूम आगे बढ़ जाता है।

चोर बारह तेरह साल का मरियल सा लड़का था, पता चला कि बुधराम के घर से कुल 300 रूपये सफलतापूर्वक चुरा लिए थे, वो तो जब भगौने से ही दूध पीने लगा और बर्तन खड़क गये तब पकड़ा गया।
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अब उस मोहल्ले में नहीं जाता, मुझे वहां के हर आदमी के मुँह पर कालिख दिखती है। कुछ छींटें अपने चेहरे पर भी महसूस करता हूँ।
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पुरानी डायरी का एक पन्ना
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अजीत
17 फरवरी 17