Saturday, 5 November 2016

व्हाट इज़ इन दि नेम....


जो जगह जितनी ज्यादा भीड़ भाड़ वाली होती है, असामान्यता की पहचान उतनी ही कठिन होती जाती है। किसी भी शहर की तरह के एक शहर की कचहरी में, भागते काले कोटों के पीछे दौड़ते कदमों और तीन तीन बित्ते की दूरी पर जमी चौकियों के ऊपर रखी टाइपराइटरों की खटपट के बीच कहां दिखता है किसी का चुपचाप किसी कोने में बैठे रहना। वो तो गनीमत कि कचहरी के एक सार्वजनिक कुक्कुर की अपनी भाषा में किए गए प्रचण्ड विरोध के बावजूद, उस निद्रामय व्यक्ति के सर पर 'जूं तक ना रेंगने' के बाद पान वाले चौरसिया का ध्यान उसपर पड़ा।

धीरे धीरे लोग जमा होने लगे, एक होशियार आगे बढ़ा तो मालूम चला कि व्यक्ति दिवंगत हो चुका है। मरकर भी उसने एक भला काम किया, लोगों के सूखे जीवन में कुछ पलों का मनोरंजन दे गया। कचहरी क्षेत्र में ही वर्तमान थाने से पुलिस भी आ गई, पर इसी बीच किसी ने मृत व्यक्ति के धारीदार पैंट से ये अंदाजा लगा लिया कि मरा आदमी हो ना हो कोई वकील ही है। इतना मालूम चलना था कि आधी कचहरी जमा हो गई, नारे गूंजने लगे, हमारी मांगे पूरी करो, वकील एकता जिंदाबाद, प्रशासन मुर्दाबाद, मुआवजे की मांग। फिर आये कुछ समझदार वकील, पूछताछ खोजबीन की गई तो स्पष्ट हुआ कि वो कोई वकील नहीं था।

पुलिस अपना काम करने ही वाली थी कि किसी की नजर उसकी लम्बी दाढ़ी पर चली गई और एक नया बवाल हो गया। नारा ए तकबीर से गूंज उठी कचहरी। आम आदमियों के बीच का एक आम मुसलमान यूँ मर गया और सरकार देखती रही। यही तो जुल्म है। छाती कूटने के लिए नेता लोग पहुँचने ही वाले थे कि किसी समझदार ने आगे बढ़के चेक कर ही लिया। अब ये तो तय था कि जो भी हो, मुसलमान तो नहीं ही होगा। नेता लोग हाथ मलते आधे रास्ते से वापस।

पुलिस भी परेशान, दोपहर से शाम होने को आई जब वे उसके पास तक पहुंचें। एक फिट की दूरी पर एक छोटा सा थैलीनुमा पर्स मिला जिसमें कुछ चनों के साथ एक दो कागज भी थे, उन कागजों पर एक नाम भी था जो गलती से हवलदार के मुँह से निकल गया। लपकने को तैयार बैठे लोगों ने फलाने 'राम' लपक लिया और बवाल की एक नई जमीन तैयार हो गई। पांडवों में से बलिष्ठतम की जय जय होने लगी, मनुवादी सरकार को गालियां पड़ने लगी, आस पास की दुकानें मय गाड़ियों के टूटने लगी। न्यूज़ चैनलों में जबरदस्त उछाल देखा गया, रात के प्राइम टाइम का बढ़िया मसाला जो मिल गया था।

फिर किसी पुलिस वाले को उसके बालों से भरे धूलधुसरित बाएं हाथ पर कुछ गोदना सा दिखा जो उसी का नाम हो सकता था। ना जाने क्या नाम था, पर जो भी था, अचानक ही भीड़ खत्म हो गई, रात को प्राइम टाइम में फिर से 'अरहर दाल' चल रही थी।
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तीन दिन बाद गंगा में एक लाश बहती दिखी थी, क्या पता किसकी हो, लावारिस लाशों के क्रियाकर्म के लिए 100 रूपये जो मिलते हैं।


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अजीत
4 नवम्बर 16

Monday, 31 October 2016

पति पत्नी और ...


ठाकुर:
का बे शुक्ला, मउगा हो बे तुम एकदम, मर्द बनो मर्द, ये साले कोई मर्दों के काम हैं? जब देखो तब औरतपना फैलाये रहते हो। सुना नहीं है क्या, जिसका काम उसी को साझें, का जरूरत है तुम्हें सब्जी-फब्जी काटने की, बेटा घर में औरत ले आये हो तो का पूजा करने लिए लाये हो, उसे ही करने काहे नहीं देते ये सब काम।
अबे शास्त्रो में लिखा है, सकल ताड़ना के अधिकारी, और तुम ससुर लल्लो चप्पो में लगे रहते हो। इतना प्यार दिखाओगे न, त ये जो औरत जात है न, सर चढ़ जाती है। लिख लो, बताये दे रहे हैं, नारी नारी सब करे, नारी नरक का द्वार।
सुना तुम खाना बनाते हो, बर्तन-कपड़े भी धो देते हो, इस्तरी भी कर लेते हो, ससुर तो तुम स्त्री मने पत्नी लाये काहे, कुँवारे बने रहते। तुम जैसे बिना रीढ़ के आदमियों की वजह से ही इन औरतों के दिमाग खराब होते हैं। कभी सरदर्द का बहाना तो कभी कमरदर्द का। बेटा इनकी सुनेगा ना तो नौकर बन के रह जाएगा, बताये दे रहा हूँ...
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शुक्लाइन:
ये जब सुबह सुबह उठकर मेरे लिए चाय बना देते हैं न, चाय नहीं बनाते, मेरा दिन बना देते हैं। सच, सुबह सामने मुस्कुराते चेहरे के साथ जब ये चाय के लिए धीरे से आवाज देते हैं न, तो मन में जैसे सितार बजने लगता है। उसके बाद तो दिन भर की भाग दौड़...
सुनिये शुक्ला जी, ये जो ऑफिस से घर आते ही किचेन में घुस जाते हो ना, मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता। दिन भर के थके हारे, जा कर आराम करो, टीवी देखो, ये क्या कि आये और धड़धड़ाते हुए किचेन में। अभी परसो ही हाथ काट लिया था तुमने, आलू तो काट नहीं पाते, आये बड़े संजीव कपूर।
सुनो, इतने दिन हो गए इस शहर में आये, कभी किसी के यहां चाय पर भी नहीं गए हम। परसों जो ठाकुर साहब आये थे, कितना कह गए थे आने को, चलो ना उनके यहां ही चला जाए। ठीक है.... 
ठीक... 
बस 10 मिनट में होती हूँ तैयार।
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ठकुराइन:
मेहमान? आज? देखों, आज मेरा मन नहीं है किचेन में सड़ने का, मना कर दो उन्हें। नहीं कर सकते? सुनो ये ज्यादा बकैती मेरे सामने नहीं चलेगी हाँ, बताये दे रही हूँ। ये वही शुक्ला है ना जो तुम्हें उलटे सीधे पाठ पढ़ाता रहता है? खूब जानती हूँ इन मर्दों को, खुद तो अपने घर में भीगी बिल्ली बने रहते हैं और दूसरों के आगे शेर बनते हैं। दफा करो ऐसे आदमियों को, चलो बन्द करो ये टीवी और सुनों, आटा गूंथ दो फिर मशीन में कपड़े डाल देना। हाय मेरी कमर...
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ठाकुर (फोन पर): हाँ शुक्ला, सुन, निकल गए क्या तुम लोग, यार एक्चुअली एक इमरजेंसी आ गई है आज तो...
शुक्ला: कोई बात नहीं यार, हम फिर कभी आ जाएंगे, तू कपड़े धो ले...
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अजीत
31 अक्टूबर 16

Saturday, 1 October 2016

बुरा जो देखन मैं चला...




मासूमियत तो हाईस्कूल में पूरी तरह खत्म हो चुकी थी, इंटर में 'दुनिया ठेंगे पे' वाला मन बन चुका था और स्नातक में प्रवेश लेने तक असहिष्णुता घर कर चुकी थी। वैसी वाली नहीं जिसका हल्ला पिछले कुछ दिनों तक देखा सबने। ये सबके लिए था, खासकर अपने परिवार के लिए, उम्र का तकाजा था शायद, माँ-पा साथ थे नहीं, भाई भाभी के साथ रहते थे। हम चार भाइयों में आपस में भले ही कितना प्रेम हो पर ऊपरी दिखावटी लगाव जैसा कुछ नहीं है, पानी जब तक नाक से ऊपर ना हो जाए, बड़े भाई कुछ बोलते नहीं थे, मैं भी छोटे से कुछ नहीं कहता, जैसे मुझे पता है वैसे ही बड़े भैया को भी पता था कि जितनी आवारागर्दी कर ले, कोई अख़लाक़ी, नैतिक गलत काम नहीं करेगा। तो हम कायदे से आवारा टाइप बन चुके थे। सुबह 10 से 5 कॉलेज में C, C++ प्रोग्रामिंग करने के बाद जम के लखैरापन मचाते। लहुराबीर से गोदौलिया तक परेशान था हमसे। रातें घर से ज्यादा होस्टल या कमल या तिवारी के घर पर बीतती।

लैंग्वेज के अलावा सभी विषयों में निल बटे सन्नाटा थे, अगले दिन से सेमेस्टर एग्जाम, सोचा कि जब सारी आवारागर्दी साथ की तो पढ़ाई भी साथ ही करते हैं। होस्टल में एक एक रजाई में चार चार बालक जुट गए किताब लेकर, तीन बजते बजते सारा कोर्स निपट गया। चाय के तो हम वैसे ही शौक़ीन थे, तलब लग रही थी, नजदीक ही बेनियाबाग पर चौबीसों घण्टे खुलने वाली दुकान भी थी। बाकी लड़के किताब छोड़ने को तैयार नहीं और तलब के मारे हमारा गला सूखा जाए। बहाना खोजने के लिये दिमाग दौड़ाया तो आँखें सैय्यद पर टिक गई। रमजान का महीना और सहरी का टाइम, इमोशनल ब्लैकमेल किया सबको, और बारह लड़के चल दिए सहरी करवाने का पुण्य लेने। एक बात पहले बता दें कि उस समय हम घनघोर वाले नास्तिक हुआ करते थे। क्या काबा क्या शिवाला।

बनारस वाले दोस्त जानते हैं कि बेनिया मुस्लिम बहुल इलाका है। चाय की दुकान पर भीड़ लगी थी, बनारसीपन फैला हुआ था। गालीगलौज पान बीड़ी गाली गुफ़्ता का बाजार गर्म। हम लोग अपनी अपनी चाय सुड़कने के बाद कुल्हड़ सड़क पर बिना तोड़े फेंकने की बाजी लगा रहे थे कि देखा एक मुल्ला जी अपने पान से गुलगुलाये मुँह को रोजे के मद्देनजर खूब जम कर साफ़ कर रहे थे, साफ़ करने का माध्यम मुँह में पानी भर पिचकारी छोड़ना ही था। पहली पिचकारी हमारे पैरों के पास आकर गिरी, हमारे बिदक जाने से उन्होंने अपना मुंह दूसरी ओर कर लिया और फिर से मशगूल हो गए।

दो तीन पिचकारी के बाद हमारा ध्यान गया कि उनकी धार जहां गिर रही है वो एक छोटी सी गदाधारी बन्दर की मूर्ती है। हमारे यहां ये बड़ा कॉमन सा है, सड़क के किनारे, पेड़ों के नीचे छोटा सा मंदिर बना दो, कुछ दिन पूजा करो, फिर कोई ज्यादा बड़ा, ज्यादा भव्य मंदिर दिखे तो पुराने वाले को भूल जाओ। ये भी उन्ही भक्तहीन मन्दिरों में से एक, हनुमान मंदिर था।

धीरे धीरे मेरे साथ के सभी लड़कों की नजर पड़ी उस दृश्य पर, पर ताज्जुब कि कोई एक शब्द नहीं बोला। सैय्यद को क्यों फर्क पड़े, मैं नास्तिक, पर बाकी दस तो हिन्दू थे। आज तो खैर मैं पूरा भगत हूं, पर उस समय, उस पल पता नहीं क्यों, नास्तिक होने के बावजूद आँखें लाल होने लगी थी, तिवारी ने रोकने की पूरी कोशिश की थी और जैसे तैसे मुझे वहां से हटा ले गया।

ऐसा नहीं था कि अंदर धर्म के अंकुर फूट रहे हों पर शायद संस्कार ऐसे मिले थे कि अपना अपना मन, अपना अपना मत, और अगर तुम नहीं मानते, या अगर तुम्हे अपने मानने पर इतनी श्रद्धा है तो दूसरों की भी इज्जत करो। जब कुछ दिनों तक बार बार, लाख टालने पर भी, वो मूर्ति आँखों के सामने आ जाती तो एक कायर होने का, अपराधी होने का, खुद की ही नजरों में गिर जाने का अहसास भर जाता अंदर। जब रहा नहीं गया तो एक रात उसी समय सहरी के टाइम पर पहुंच गया वहां। हालाँकि बेवकूफी ही थी, दिन में भी जा सकता था पर गर्म खून। किसी दोस्त को नहीं बताया, बताता तो आने ही नहीं देता कोई। चाय वाले के यहां से एक बाल्टी पानी लिया और रगड़ रगड़ कर धूल मिट्टी पीक वगैरह साफ़ किया। आसपास रोजेदार खड़े थे और हँस रहे थे, गालियाँ भी पड़ रही थी, ताज्जुब कि मार क्यों नहीं पड़ी, आज सोचते हुए भी डर लग रहा है पर उस समय ना जाने कैसा तो जुनून सा था। अगले बारह दिन लगातार, दिनभर में किसी न किसी समय एक बार आकर उस मंदिर की सफाई कर जाता, पहले कभी पूजा नहीं की थी इसलिए पूजापाठ का दिखावा नहीं कर पाया, हालाँकि चाहता यही था।

शुरू के तीन चार दिन नये सिरे से कूड़ा मिलता, पान की ताज़ी पीक पड़ी होती पर धीरे धीरे गन्दगी कम होने लगी थी। एक दिन दोपहर में वहीं बैठा चाय पी रहा था, कि किसी ने चाय का कुल्हड़ मंदिर की तरफ उछाला, और मुझे आश्चर्य में डालते हुए पांच छः आवाजें एक साथ निकली, 'अबे आन्हर हउ्व्वे का बे' 'देख के बे' 'दिखता नहीं है क्या' 'देख के रजा' 'बा रजा' 'मंदिर है उधर'।

कुछ दिनों बाद रात को ही जब मंदिर की सफाई निपटा कर चाय सुड़क रहा था तो एक मुल्ला जी बोले, बेटा, तुम अपनी पढ़ाई लिखाई पर ध्यान दो, अब कुछ नहीं होगा तुम्हारे बजरंगी को। चायवाले ने भी कहा कि भइय्या अब आप परेशान ना हों, किसी को उधर गंदगी नहीं करने देंगे।
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कभी मौका मिले तो देखिएगा, बेनियाबाग की फेमस ऑल नाइट खुलने वाली चाय की दुकान के साथ में लगा छोटा सा साफ़ सुथरा हनुमान मंदिर।


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अजीत
2 अक्टूबर 16

Sunday, 25 September 2016

एहसास



आज करीब बत्तीस साल बाद वैसा अनुभव हुआ। इतने साल पहले मैं भी तकरीबन इतनी ही उम्र का था जब मेरी पत्नी ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ अपने उभरे हुए पेट पर रख दिया था। शायद सातवां या आठवां महीना था, पत्नी से विरक्ति सी हो रही थी, बेडौल शरीर, वाहियात चाल और अंग प्रत्यंगों पर काली भूरी रेखाएं और धब्बे। पर जब उसने अंदर से हल्की सी सरसराहट की तो ना जाने कैसा तो अहसास हुआ।
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हालाँकि मनौती मैंने लड़की की मांगी थी पर जब ये हाथ में आया तो लगा कि ये दुनियां की सबसे अनमोल नेमत है जो ऊपर वाले ने मुझे दी है। इतने नन्हें हाथ पैर, इतना कोमल, इतना मुलायम।

हाइजीन का कीड़ा है मुझे पर इस बच्चे के सामने जैसे कुछ पता ही ना चलता। परिवार के नाम पर हम पति पत्नी बस दो ही लोग थे, बहुत रोता था ये और जितना रोता उससे ज्यादा इसके कच्छे बदलने पड़ते, दिन रात सुबह शाम बस एक ही काम, ये निकालें और हम साफ करें।

जब पहली बार घुटनों पर चला और फिर जब खुद अपने पैरों पर, आहा, ऐसी खुशी का पल पहले कभी नहीं आया था जीवन में। कुछ कुछ बोलने भी लगा था और पहला शब्द इसने 'माँ' नहीं 'पा' कहा था।

ऑफिस से थक हार जब घर पहुंचो तो ये साहब हमेशा बाहर सड़क पर अपनी माँ की ऊँगली पकड़े मेरा इंतिजार करते हुए दिखते, और फिर जब तक इन्हें गाड़ी पर बिठा दो तीन चक्कर ना लगवा दो, घर जाने की आज्ञा नहीं मिलती।

स्कूल में सबसे अच्छे विद्यार्थियों में गिने जाते, इनकी माँ जो इनपर खूब मेहनत करती। आठवीं तक तो वे इनकी मदद करती रही फिर नवीं से मेरे हवाले हो गए। इनको पढ़ाने के लिए ऑफिस में दिन भर खुद पढ़ा करता और फिर शाम को इन्हें पढ़ाता।

शायद परवरिश में कोई कमी रह गई जो बुरी संगत में पड़ गए, गुटका और सिगरेट, ना जाने कैसा साहित्य। उसे दो तीन थप्पड़ मारने के बाद खुद कितना मानसिक आघात पहुंचता था, कैसे बताऊँ।

यहां वहां कई जगह पढ़ता कि एक उम्र के बाद पिता को पुत्र का मित्र बन जाना चाहिए। कई बार कोशिश की, पर जब भी ये सामने आता तो अंदर का पिता इस मित्रता को कुचल डालता, कैसे कोई पिता दोस्त बन सकता है। धीरे धीरे ना जाने कैसे एक गैप सा आता जा रहा था हम दोनों के बीच, कितनी कोशिश करता था इसे कैसे भी तो भर दूं पर होता ही नहीं था। बचपन में बोलना शुरू करता तो चुप ही नहीं होता था, पा ये क्या, पा ये क्यों, पा ये कैसे, और अब कुछ बोलता ही नहीं । मैं ही कुछ बोल दूं, कुछ पूछ दूं तो बस हां हूं ठीक है।

जीवन भर की कमाई इनकी पढ़ाई में होम कर दी, अच्छे से अच्छे कॉलेज में दाखिला करवाया, कॉलेज से निकलते ही अच्छी सी नौकरी मिल गई इन्हें। शायद नौकरी का ही इंतिजार कर रहे थे बरखुर्दार, देश के दूसरे कोने में पोस्टिंग ली और भूल गए कि कोई बाप भी है इनका। हद्द तो तब जब एक दिन फोन से बताया कि शादी कर ली किसी तमिल लड़की से। अगर मुझसे पूछा होता तो यकीनन मना ही करता पर ये तसल्ली तो रहती कि पूछा तो, और क्या पता मान ही जाता जिद्द करता तो।

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आज फोन किया और बताया कि पा, मैं पा बनने वाला हूं और आप दादा, लात मारी इसने आज, और हां, मुझे कुछ नहीं पता हां, इसकी परवरिश आप ही करोगे बस बता दे रहा हूं, कल की टिकट भेज रहा हूं.....

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अजीत
25 सितंबर 16

Tuesday, 13 September 2016

धार्मिकता


किसी प्रगतिशील मुल्क के किसी प्रगतिशील शहर की किसी बहुमंजिला इमारत में सरकारी बाबू श्री नरेंद्र जी रहते हैं। श्वेत सम्प्रदाय के थे, ये उस मुल्क में अल्पसंख्यक समुदाय है पर चूँकि बहुसंख्यक समुदाय से ही निकला है तो बहुसंख्यक इसे अपना ही हिस्सा मानते हैं। उस मुल्क में पंथनिरपेक्षता का जोर है, पड़ोसी ड्रैगन की तरह धर्म पर कोई रोक टोक नहीं तो पूरे मुल्क के साथ साथ ये भी बड़े वाले धार्मिक। इनके यहां बीस के ऊपर पैगम्बर हुए, सारे राजा राजकुमार थे फिर साधू हो गए थे। अंतिम वाले तो इतने बड़े तपस्वी कि तपस्या में ही कपड़े लत्ते गल गये। अहिंसा पर बड़ा जोर है इनके यहां। जमीन के नीचे उगी सब्जी तक नहीं खाते, और तो और अपने यहां पेस्ट कंट्रोल तक नहीं होने देते। वैसे भले आदमी हैं, धार्मिक आदमी भला ही होता है।

बाकी बिल्डिंग और आस पास के मोहल्ले में भगवा सम्प्रदाय के लोग रहते हैं। ये वो सम्प्रदाय है जो आजकल असहिष्णु सा हो गया है, लोग तो यही बोलते हैं टीवी पर। पचास तरह के देवता और 100 तरह की रवायतें। गाय बैल सूवर पीपल बरगद, मतलब लगभग हर चीज की पूजा करते हैं। इन लोगों के यहां पैगम्बर तो ना जाने कितने आये, खुद ऊपर वाला भी कई बार आया। इज्जत तो इतनी देते हैं अपनी मान्यताओं को कि घर की छत पर पीपल उग जाए तो खुद नहीं उखाड़ते, दूसरे सम्प्रदाय के लोगों को बुलाते हैं। धार्मिक लोग हैं, धार्मिक लोग भले ही होते हैं।

थोड़ी ही दूर पर हरे सम्प्रदाय के आठ दस घर भी हैं। ये सम्प्रदाय सुना कि बाहर से उस मुल्क में आया था। बड़ा शांतिप्रिय समुदाय है। धार्मिक तो इतना कि दिन में कई-कई बार चिल्ला-चिल्ला के पूरे शहर को अपने पूजा पाठ का टाइम बताता है। इनके यहाँ भी कई देवदूत आये गये, कितनी बार आते जाते तो अंतिम वाले ने ऊपर वाले से अंतिम तौर पर उसकी सारी हिदायतें मांग कर नोट कर ली। अब यही किताब इनके लिए जो है सो है। धार्मिक हैं तो बिलाशक भले भी होते हैं।

हुआ कुछ यूं कि किसी दूर देश में, कई शतक पहले 'हरों' ने 'भगवों' की इबादतगाह उजाड़ अपना पूजास्थल बना लिया था, इतने साल सहने के बाद 'भगवों' का खून खौला और उन्होंने अपनी इबादतगाह पर क्लेम कर लिया, मतलब तोड़ ताड़ दिया। तो 'हरों' का खून भी कौन सा हरा था, इन्होंने जगह जगह 'भगवों' के इबादतगाहों की मूर्तियों को तोड़ना चालू किया। इस खून की खौला खौली में बहुत खून बहा। ये बिमारी उस प्रगतिशील मुल्क तक भी पहुंची। अब पता नहीं यहाँ के 'हरों' ने पहले बुत तोड़े या 'भगवों' ने रंग फेंका, जो भी हुआ यहां भी कांड शुरू हो गए।

शहर में कर्फ्यू लगा था, रह रह कर शोर और चीख पुकार की आवाजें सुनाई देना जैसे आम बात हो गई। नरेंद्र बाबू ना तीन में ना तेरह में, चुपचाप अपने घर में बैठे चाय पी रहे थे कि किसी ने दरवाजा भड़भड़ाया, इनकी सिट्टी पिट्टी गुम। शोर की आवाजें पास आ रही थी और इधर दरवाजे के बाहर से दयनीय भीख सी मांगती पुकार, भाई बचा लो, दरवाजा खोल दो, अंदर आने दो, मैं और मेरा छोटा बच्चा, ऊपर वाले के लिए हमें बचा लो। ऊपर वाले के नाम पर, ऊपर वाले को याद कर बाबू साहब ने जैसे तैसे उन दोनों को अंदर ले तो लिया, पर फिर उन्हें याद सा आया कि अरे ये तो 'हरे' वाले हैं। कितना नापसंद करते हैं ये इन्हें। बड़ी कशमकश, क्या करें, बीवी से भी सलाह ली। फिर उन्हें 'भगवों' का पीपल वाला तरीका याद आ गया।
धार्मिक जो थे....


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अजीत
13 सितम्बर 16

Sunday, 11 September 2016

बुद्धिजीविता


जिस तरह आवश्यकता आविष्कार की जननी है वैसे ही अपने लिए अतिआवश्यकता ही कुछ सीखने की मजबूरी। कुछ मामलों में सम्पन्न थे हम, जैसे की दोपहिया। बचपन से ही देखते आये थे पर कभी सीखने का मन नहीं हुआ, वो तो कहो की एग्जाम सेंटर काफी दूर पड़ा तो सिर्फ एग्जाम देने के लिए लगे हाथ बाइक चलाना भी आ ही गया। ऐसे ही पड़ी रहती थी घर में रिटायर्ड बुजुर्गों की तरह, पिताजी पहाड़ पर थे और बड़े भाई की अपनी बाइक, तो अलिखित समझौते की तरह ये तिरासी मॉडल सीडी 100 हमारी सम्पत्ति मान ली गई। पिता कठोर अनुशासन प्रिय थे पर रूपये पैसे दे देते थे, भाई लिबरल थे पर पैसे नहीं देते थे, दोनों का ही उद्देश्य बच्चे को बुराई की तरफ जाने से रोकना ही था पर 'जाको बिगड़ना ही होय, का करी सके कोय'। इस समय हम भाई की छत्रछाया में थे, बाइक तो मिल गई पर चले कैसे, इस मामले में हमारे मित्रगण काम आये। खुद के आने जाने या गर्लफ़्रेंड को घुमाने के लिए बाइक मांगते तो भलमनसाहत से या शायद शुद्ध व्यापारिक रीत से 20 रूपये का तेल डलवा देते। उस समय WTC वाला काण्ड हुआ था फिर भी तेल 25-30 के रेंज में था, अपना काम चल जाता।

सर्वीसिंग जैसी चीज भी होती है पता नहीं था, घिसे जा रहे थे कि एक दिन बड़े भाई ने कान पकड़ 500 रूपये थमाये और बोले, घोड़े हो गए हो तो का हमसे भी बड़े हो गए, मांगने में शर्म आती है, गाभिन भैस की तरह चिचिया रही है गाड़ी और तुम इसे ठेले जा रहे हो।

बनारस में दो ही जगह है जो थोड़ी ठीकठाक है, जहां ठेठ बनारसी अपनी टुच्चई नहीं दिखा पाता, फलस्वरूप ये दो जगह बनिस्पत थोड़े साफ़ हैं, एक बीएचयू दूसरा कैंटोमेंट एरिया। इसी एरिया में बड़े बड़े होटल हैं, बनारस की शान ताजगंगे के सामने, मखमल के कपड़े में पैबंद की तरह, बाइक मिस्त्री की दुकान वर्तमान थी। एक नंबर का मिस्त्री और दो कौड़ी का आदमी। सुबह 8 बजे गाड़ी दो तो 12 बजे का टाइम देता और सच में 3 बजे तक ही दे पाता। ये सारा हिसाब लगा हम 4 बजे इसकी दुकान पहुँचे, हमारी प्रियतमा बाइक 36 टुकड़ो में बिखरी पड़ी थी, आंतरिक हिस्से तेल ग्रीस में लटपटाये बिखरे पड़े थे और मिस्त्री साब रंगीन दांत लिए हमारे सामने बिखर गए, हमें सांत्वना सी देते बोले, बाबूसाब बस 10 मिनट, होई गयल बस।

एक कुर्सी रख दी गई हमारे लिए सड़क से लगी हुई, आधी डब्बी सिगरेट बमय माचिस पेश कर दी गई। हम भी इतनी आवभगत देख, अनुप्रास के तहत, भले आदमियों की तरह भोलेनाथ के भगत बन मुँह से भकाभक धुँआ भकोसने उगलने लगे। सड़क पार थोड़ी दूर स्थित टी हॉउस से, जिसकी इमारत चार पहियों पर चलने वाले ठेले पर बनी थीे, छोटू को आवाज लगा चाय मंगवा ली। किसी भी ट्रक या कार के गुजरने पर होने वाली दहशत के अलावा राजाओं वाली फीलिंग थी ये। सामने के नजारे भी मनभावन थे, हर पांच मिनट बाद गोरे काले विदेशी दिख जाते, ये वो विदेशी थे जो केवल पर्यटन के लिए आते थे, उन गंगा किनारे वाले विदेशियों से रंग वर्ण छोड़ बिलकुल अलग। वो तो हम बनारसियों से बड़े बनारसी लगते हैं अब।

माबदौलत अपनी रियासत की रियाया को साथ में इन विदेशियों की ओर गर्व से देख रहे थे कि ना जाने कहां से एक 10-11 साल का बालक सामने खड़ा हो गया हाथ फैलाये। आम लड़कों जैसा ही लड़का था, बस अपनी दिगम्बरता छुपाने के लिए एक कच्छा टाइप कुछ पहने था। आँख से अनवरत बहते आंसू जो आँखों की गंगोत्री से बहते बहते गालों से होते हुए गले को पार कर, मैदानी क्षेत्रों से गुजरते हुए कच्छे की खाड़ी में लुप्त हो रहे थे। वैसे बालक इतना सुदर्शन था कि रामानंद सागर का बाल बलराम या बी. आर. चोपड़ा का बालक भीम बन सकता था। आँखे बिलकुल बैल जैसी बड़ी बड़ी। बैल हमारे सांस्कृतिक पशु गाय जिसे हम श्रद्धावश माँ कहते है का पुत्र होता है और कुछ सालों पहले तक शहरों में कम और गाँवों में बहुतायत में पाया जाता था पर अब इसका उल्टा है, प्रकृति के अपने नियमों से जैसे हिरण शेरों के बावजूद जंगल में बचे हुए हैं, बैल भी कसाइयों और ट्रकों से बचकर बहुतायत में सड़कों पर स्वच्छंद घूमते और सफाई अभियान में अपना अमूल्य योगदान देते दिख जाते हैं।
अमूमन भिखारियों को देख दिल नहीं पसीजता, पर पता नहीं क्या था इस बच्चे में, इसे देख खुद भिखारी होने की अनुभूति हुई। इस और इस जैसे बच्चों को भीख मांगने पर क्यों मजबूर होना पड़ता है, क्या एक संप्रभु राष्ट्र की नाकामयाबी नहीं ये। बरसों से सुनते आ रहे साम्यवाद और राज करते आ रहे समाजवाद का मजाक सा उड़ाता ये बालक हाथ फैलाये एक रुपया नहीं, जवाब मांग रहा था। राष्ट्रवाद की परिभाषा के अंतर्गत क्या ये लज्जा का विषय नहीं कि भाषणों में जिन बच्चों से उम्मीद की जाती है कि वे आगे चलकर गांधी पटेल अम्बेडकर कलाम रमन बनेंगे वे आज भीख मांग रहे हैं।

इतना कुछ सोचकर लगा कि हल्का हो गया हूं, बुद्धिजीवी यही तो करते हैं ना, पर वो बालक तो अब भी खड़ा था, क्या देता, जेब में सिर्फ पांच सौ थे जो मिस्त्री को देने थे, फुटकर था नहीं, झिड़क दिया उसे। वो भी ढींठ, जाए ही ना, मांगता रहा और मुझे शर्मशार करता रहा। कभी तो उम्मीद टूटनी थी उसकी, आखिरकार कोई और आसामी दिखा तो उधर लपक लिया।

अगले 60-70 मिनट में मुझे वो कई बार दिखा, मेरी तरफ देख मुझे अनदेखा कर किसी और के आगे हाथ फैलाता, जब जब मेरी तरफ आशा से देखता, मैं और संकुचित हो जाता। उसके बहते आंसू मुझे परेशान कर रहे थे। कई बार तो मन आया कि फुटकर करा उसे बुला कर कुछ दे दूँ, पर फिर ना जाने क्या सोच ऐसा किया नहीं। शायद उसे देने वालों की कमी नहीं थी। सामने विदेशियों से भी कुछ ले ही ले रहा था।

आखिरकार मेरी प्रियतमा बाइक तैयार हो गई, पैसे वैसे दे किक मारते समय आज का सबसे बड़ा अजूबा देखा। सामने खोखे पर वही लड़का 7 रूपये वाली सिगरेट पी रहा था (मेरी वाली उस समय ढाई की आती थी), उसने मेरी तरफ देखते हुए धुँआ छोड़ना शुरू किया, लगा कि अनंत काल तक छोड़ता ही रहेगा, कुटिल मुस्कान से मुझे नवाजने के बाद, ठाठ से टैम्पो रुकवाया, हाथ में थामी हुई रेजगारी से भरी पारदर्शी थैली अंदर सीट पर फेंकी, टैम्पो के आगे बढ़ने से तुरंत पहले आधा बाहर लटक कर मुझे बनारस की प्रसिद्ध 'ब' शब्द 'भ' शब्द, जिनके बाद 'के' लगाते हैं और साथ ही भारत भर में प्रसिद्ध 'च' शब्द बोलता, ये जा वो जा।


भरे बाजार वो नंगा, मुझे नंगा कर गया।
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अजीत
11 सितंबर 16

Monday, 29 August 2016

प्रतिशोध



सौरभ:


आज फिर से ये दिन आ गया, पूरे साल में एक यही दिन है जो मुझे हमेशा दुविधा में डाल देता है। इण्डिया से भेजी गई अपनी राखी बांधू या नहीं, शिल्पी हर साल भेजती है और हर साल ही मुझे इस कशमकश के गुजरना पड़ता है। ना पहनूं तो शिल्पी के साथ नाइंसाफी, उस बेचारी का क्या दोष और अगर पहन लूं तो जाने अनजाने प्रिया का दिल जरूर ही दुखा जाऊँगा। हालांकि प्रिया भरपूर कोशिश करती है कि आज के दिन वो नार्मल दिखे पर मैं आखिर पति हूँ उसका, जानता हूं कि वो मन ही मन खूब रोती है, क्या जाने छुप के भी रोती हों। मैं कुछ कर भी तो नहीं पाता, उसको उसके भाई से यूँ जुदा करने वाला भी तो मैं ही हूँ, किस मुँह से उसे समझाऊं और समझाने को है भी क्या। जब मैं खुद राखी टाइम पर ना पहुंचे तो इतना उतावला हो जाता हूँ और ये बेचारी तो कभी भेज ही नहीं सकती।

कुंदन और मैं बहुत अच्छे दोस्त थे, लोग तो हमें सगा भाई ही समझते। ग्रेजुएशन में मिला था ये, ट्रांसफर ले कर जब पहली बार उस कॉलेज में एडमिशन लिया तो नया होने के कारण बाकी लड़के थोड़ा मजा लेने के मूड में रहते पर ये बन्दा बिलकुल अलग ही था, पढ़ाई लिखाई में तो बस पास भर हो लेता पर बाकी चीजों में नम्बर वन था। थोड़ा गुंडा टाइप था, इसे पता नहीं क्या पसन्द आया मुझमे कि दोस्त बन गया मेरा। हम उत्तर दख्खिन थे एक दूसरे के, फिर भी, वो कहते हैं न ऑपोज़िट एट्रैक्ट्स।

मेरे घर का दुलारा था ये और मैं इसके घर का। मेरे पापा मम्मी को तो जैसे इसने गोद ले लिया हो, साले तो ना तो कहना ही नहीं आता था, वो लोग जो भी कह दे, बस हुक्म की देर और ये जिन्न की तरह उसे पूरा करने में लग जाता। शिल्पी भी मुझसे ज्यादा इसी को भैया भैया बोल सारे काम निकलवा लेती। ये तो चोट्टी थी ही शुरू से, मैं इसके झांसे में नही आता पर कुंदन तो भोला शंकर, जो कह दो, नो इफ नो बट, काम हो जाना है चाहे जैसे भी हो।

इसके घर में मेरी इज्जत होने का सिर्फ एक कारण था कि मैं टॉपर था, पढ़ाई में सबसे आगे। मेरी वजह से बेचारे को रोज ताने मिलते, साला पढ़ता भी तो नहीं था कभी। बस एग्जाम से पहले मेरे घर में डेरा डाल लेता या मुझे अपने घर बिठा लेता, इसके लिए रात भर की पढाई काफी होती सेमेस्टर क्लियर करने के लिए। दिमाग तो था बन्दे में, पर खुराफात से बचे तो पढ़ाई में लगाए न। कभी किसी का सर फोड़ रहा होता या कहीं कोई समझौता, कभी इस यूनिवर्सिटी में तो कभी उस डिग्री कॉलेज में चुनाव लड़वा रहा होता, ना जाने किन किन फंदों में उलझा ही रहता हमेशा।
प्रिया इसकी सगी जुड़वाँ बहन है। हमउम्र होने की वजह से इन दोनों के बीच भी दोस्ती वाला रिश्ता ही था, तो मेरे से भी वैसा ही रिश्ता बन गया था। मैं थोड़ा शर्मिला टाइप इंसान हूं, जब भी ये सामने आती मेरी बत्ती गोल कर जाती, शरारत में तो कुंदन का बाप थी ये। पर मुझे भी इसकी शरारतें अच्छी लगती। कितनों को नसीब होता है भई लड़कियों से छिड़ना। सच मानिए, मैंने बहुत कोशिश की कि इस चक्कर में ना पडूं पर इस क्यूपिड ने तो अपना तीर निशाने पर बैठा के मारा था, क्या करता।

पता था, जानता था, और वो भी जानती थी कि कोई भी ना तो इसे समझेगा ना स्वीकार ही करेगा। क्या करता, उसकी शादी तय हो रही थी, कैसे हो जाने देता, और वो भी तो जिद किये बैठी थी। भाग गए हम, कितना वाहियात सा शब्द है ना 'भाग गये'। अबे पागल कुत्ते ने काटा था या भागने का शौक था, करा दी होती शादी। तुम भी चैन से रहते और हम भी, पर नहीं भई, तुम्हे तो इस समाज में अपनी ये बित्ते भर नाक जो संभालनी है। देख लो इसका अंजाम, ना तुम चैन से होगे और हम तो बस जी ही रहे हैं जैसे तैसे।

साले कुंदन, माफ़ कर दे यार अपने दोस्त को...
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कुंदन:

बाई गॉड, जिंदगी में इतने धोखे खाये पर कभी इतना अफ़सोस ना हुआ, ई साला सौरभवा कमीना जो धोखा दिया है न। ई साले को हम छोड़ेंगे नहीं। मने का, समझ का लिया है उसने कि कुंदन को धोखा देना और फिर उसे पचा जाना इतना आसान है का। मिलो साले तुम बताते हैं तुम्हे।

अबे, दुनिया में सारी लड़कियां मर गई रही जो अपने दोस्त के घर में ही डाका डाल दिए। साले, एक्को बार सोचे भी नहीं कि कर का रहे हो, किसके साथ कर रहे हो। कमीने, भाई मानते थे हम तुम्हें, का नहीं किये बे हम तुम्हारे लिए। तुम्हरे बाउजी बीमार थे तो हर पल तुम्हारे साथ खड़े रहे एक टांग पर, तुमरी माइ को अपनी गाड़ी में बैठा के चन्दौली ले जाते थे वैद्य जी के यहां गठिया के इलाज के लिए, काहे से कि तुम साले इंटरव्यू की तैयारी कर सको। और प्रियवा से जियादा तुमरी शिल्पीया को अपनी बहन माने थे बे, और तुम साले बेगैरत इंसान, हमरी बहन से ही फ्लर्ट किये। हमारी नाक के नीचे तुम ये गुल खिलाये और हमको अपना दोस्त भी बोलते रहे। का सच में तुम्हारे मन में एक्को बार ख्याल नहीं आया कि तुम कर क्या रहे हो।

आज भी वो दिन याद है जब तुम आये थे हमे बताने कि तुम प्रिया से शादी करना चाहते हो, हम समझाए थे ना तुम्हे कि संभव ही नहीं है ये, और तुम भी तो चले गए थे, और वादा भी कर गए थे कि कोई गलत काम नहीं करोगे, फिर साले मक्कार, चार ही दिन बाद तुम अपने घर ले गए हमारी बहन को भगा के। अरे शुक्र मनाओ कि शिल्पी आ गई थी बीच में, वरना महादेव की सौगंध, तुमरा तो उसी दिन राम नाम सत कर दिये थे हम।

तुम भाग के यहां अमरीका आ गए, का सोचे थे बे कि अमरीका मंगल पर हैं, और कुंदन इतना गवाँर है कि यहां आ ही नहीं सकता। देखो बे, आ गए है हम, और बेटा थोड़ी ही देर में तुमरे दरवाजे पे होंगे, इस बार कोई शिल्पी फिल्पी नहीं आएगी तुम्हे बचाने, इस बार का करोगे मुन्ना। आ रहे हैं बे, आ रहे हैं....
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प्रिया:

कोई ना कोई बहाना बना कर ये आज के दिन छुट्टी ले ही लेते हैं। सोचते हैं कि कैसे भी प्रिया को खुश रखूं आज के दिन। सोचते हैं कि मुझे आज के दिन अपने घर परिवार की याद आती है। मेरे क्यूट हबि, मुझे सिर्फ आज नहीं, रोज ही याद आती हैं उन सबकी। पर रोज रोज तो रो नहीं सकती न, और तुम्हारा क्या हाल हो जाता है मुझे परेशान देखकर। तुम भरपूर कोशिश करते हो मुझे खुश रखने की, अपनी राखी भी नहीं बाँधना चाहते कि कहीं मुझे बुरा ना लगे। पगलू, मुझे क्यों लगेगा बुरा, हाँ पर याद तो आती है ना। क्या करूँ, कैसे भूल जाऊं उन्हें।
कुंदन बस मुझसे 2 मिनट ही तो छोटा है। उसका मुझे चुड़ैल और चोट्टी कहना कितना बुरा लगता था मुझे, पर जब भी कोई बड़ा काण्ड करता माँ पा की डांट से बचने के लिए दीदी दीदी बोल मुझसे मदद मांगता। कितना भोला कितना प्यारा लगता उस समय।

भाई, फिर ना जाने कहां से तुम्हारा एक दोस्त आ गया हमारी जिंदगी में। तुमने ही तो मिलवाया था उससे, कितना भोंदू टाइप था तुम्हारा दोस्त। तुम्हारे बाकी दोस्तों से बिलकुल अलग, चुप शर्मीला और शरीफ। शराफत पहचानने का खास सिस्टम लगा होता है हम लड़कियों में। 

तुम्हे शायद लगता हो भाई कि तुम्हारे दोस्त ने धोखा दिया और तुम्हारी बहन तुमसे छीन ले गया, पर सच तो ये है भाई कि तुम्हारी बहन ने तुम्हारे दोस्त को तुमसे छीन लिया। पहल तो मैंने की थी भाई, तुम्हें समझाना भी चाहा था पर तुम बैल बुध्दि जो हो, कहां समझे।

सुकून तलाशते हम यहां आ गए पर आज इतने सालों बाद भी हम तुम्हें याद करते हैं कुंदन। हमें माफ़ कर दो भाई...
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ओफ्फो, अरे कभी इस फोन को छोड़ भी दिया करो, कब से तो डोरबेल बजी जा रही है, ये नहीं कि उठ के देख ही लूँ... अब क्या आ रहे हो, जाओ पसरो अपनी मुई चेयर पे, अब तो आ ही गई मैं। ये भी पता नहीं कौन आ गया दोपहर के समय, आ गई बबा....
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कौन है प्रिया.... कुंदन तू....


हाँ कमीने मैं, अंदर नहीं बुलाएगी दी।
हूं, घर तो बड़ा अच्छा बना रखा है यार,........ अरे तुम दोनों ऐसे क्या देख रहे हो, शॉक लगा क्या, आओ आओ, बैठो ना, तुम्हारा ही तो घर है।...........
यार बड़ी प्यास लगी है, पानी वाली पिलाने का रिवाज है तुम्हारे अमरिक्का में। और हां चोट्टी सुन, आज शाम को ही वापस जाना है मुझे, जो करना वरना है जल्दी कर लियो .................
अबे घूर क्यों रहे हो तुम दोनों, राखी नहीं मिलती क्या तुम्हारे अमरीका में.....



अजीत
29 अगस्त 16