Sunday, 25 September 2016

एहसास



आज करीब बत्तीस साल बाद वैसा अनुभव हुआ। इतने साल पहले मैं भी तकरीबन इतनी ही उम्र का था जब मेरी पत्नी ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ अपने उभरे हुए पेट पर रख दिया था। शायद सातवां या आठवां महीना था, पत्नी से विरक्ति सी हो रही थी, बेडौल शरीर, वाहियात चाल और अंग प्रत्यंगों पर काली भूरी रेखाएं और धब्बे। पर जब उसने अंदर से हल्की सी सरसराहट की तो ना जाने कैसा तो अहसास हुआ।
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हालाँकि मनौती मैंने लड़की की मांगी थी पर जब ये हाथ में आया तो लगा कि ये दुनियां की सबसे अनमोल नेमत है जो ऊपर वाले ने मुझे दी है। इतने नन्हें हाथ पैर, इतना कोमल, इतना मुलायम।

हाइजीन का कीड़ा है मुझे पर इस बच्चे के सामने जैसे कुछ पता ही ना चलता। परिवार के नाम पर हम पति पत्नी बस दो ही लोग थे, बहुत रोता था ये और जितना रोता उससे ज्यादा इसके कच्छे बदलने पड़ते, दिन रात सुबह शाम बस एक ही काम, ये निकालें और हम साफ करें।

जब पहली बार घुटनों पर चला और फिर जब खुद अपने पैरों पर, आहा, ऐसी खुशी का पल पहले कभी नहीं आया था जीवन में। कुछ कुछ बोलने भी लगा था और पहला शब्द इसने 'माँ' नहीं 'पा' कहा था।

ऑफिस से थक हार जब घर पहुंचो तो ये साहब हमेशा बाहर सड़क पर अपनी माँ की ऊँगली पकड़े मेरा इंतिजार करते हुए दिखते, और फिर जब तक इन्हें गाड़ी पर बिठा दो तीन चक्कर ना लगवा दो, घर जाने की आज्ञा नहीं मिलती।

स्कूल में सबसे अच्छे विद्यार्थियों में गिने जाते, इनकी माँ जो इनपर खूब मेहनत करती। आठवीं तक तो वे इनकी मदद करती रही फिर नवीं से मेरे हवाले हो गए। इनको पढ़ाने के लिए ऑफिस में दिन भर खुद पढ़ा करता और फिर शाम को इन्हें पढ़ाता।

शायद परवरिश में कोई कमी रह गई जो बुरी संगत में पड़ गए, गुटका और सिगरेट, ना जाने कैसा साहित्य। उसे दो तीन थप्पड़ मारने के बाद खुद कितना मानसिक आघात पहुंचता था, कैसे बताऊँ।

यहां वहां कई जगह पढ़ता कि एक उम्र के बाद पिता को पुत्र का मित्र बन जाना चाहिए। कई बार कोशिश की, पर जब भी ये सामने आता तो अंदर का पिता इस मित्रता को कुचल डालता, कैसे कोई पिता दोस्त बन सकता है। धीरे धीरे ना जाने कैसे एक गैप सा आता जा रहा था हम दोनों के बीच, कितनी कोशिश करता था इसे कैसे भी तो भर दूं पर होता ही नहीं था। बचपन में बोलना शुरू करता तो चुप ही नहीं होता था, पा ये क्या, पा ये क्यों, पा ये कैसे, और अब कुछ बोलता ही नहीं । मैं ही कुछ बोल दूं, कुछ पूछ दूं तो बस हां हूं ठीक है।

जीवन भर की कमाई इनकी पढ़ाई में होम कर दी, अच्छे से अच्छे कॉलेज में दाखिला करवाया, कॉलेज से निकलते ही अच्छी सी नौकरी मिल गई इन्हें। शायद नौकरी का ही इंतिजार कर रहे थे बरखुर्दार, देश के दूसरे कोने में पोस्टिंग ली और भूल गए कि कोई बाप भी है इनका। हद्द तो तब जब एक दिन फोन से बताया कि शादी कर ली किसी तमिल लड़की से। अगर मुझसे पूछा होता तो यकीनन मना ही करता पर ये तसल्ली तो रहती कि पूछा तो, और क्या पता मान ही जाता जिद्द करता तो।

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आज फोन किया और बताया कि पा, मैं पा बनने वाला हूं और आप दादा, लात मारी इसने आज, और हां, मुझे कुछ नहीं पता हां, इसकी परवरिश आप ही करोगे बस बता दे रहा हूं, कल की टिकट भेज रहा हूं.....

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अजीत
25 सितंबर 16

Tuesday, 13 September 2016

धार्मिकता


किसी प्रगतिशील मुल्क के किसी प्रगतिशील शहर की किसी बहुमंजिला इमारत में सरकारी बाबू श्री नरेंद्र जी रहते हैं। श्वेत सम्प्रदाय के थे, ये उस मुल्क में अल्पसंख्यक समुदाय है पर चूँकि बहुसंख्यक समुदाय से ही निकला है तो बहुसंख्यक इसे अपना ही हिस्सा मानते हैं। उस मुल्क में पंथनिरपेक्षता का जोर है, पड़ोसी ड्रैगन की तरह धर्म पर कोई रोक टोक नहीं तो पूरे मुल्क के साथ साथ ये भी बड़े वाले धार्मिक। इनके यहां बीस के ऊपर पैगम्बर हुए, सारे राजा राजकुमार थे फिर साधू हो गए थे। अंतिम वाले तो इतने बड़े तपस्वी कि तपस्या में ही कपड़े लत्ते गल गये। अहिंसा पर बड़ा जोर है इनके यहां। जमीन के नीचे उगी सब्जी तक नहीं खाते, और तो और अपने यहां पेस्ट कंट्रोल तक नहीं होने देते। वैसे भले आदमी हैं, धार्मिक आदमी भला ही होता है।

बाकी बिल्डिंग और आस पास के मोहल्ले में भगवा सम्प्रदाय के लोग रहते हैं। ये वो सम्प्रदाय है जो आजकल असहिष्णु सा हो गया है, लोग तो यही बोलते हैं टीवी पर। पचास तरह के देवता और 100 तरह की रवायतें। गाय बैल सूवर पीपल बरगद, मतलब लगभग हर चीज की पूजा करते हैं। इन लोगों के यहां पैगम्बर तो ना जाने कितने आये, खुद ऊपर वाला भी कई बार आया। इज्जत तो इतनी देते हैं अपनी मान्यताओं को कि घर की छत पर पीपल उग जाए तो खुद नहीं उखाड़ते, दूसरे सम्प्रदाय के लोगों को बुलाते हैं। धार्मिक लोग हैं, धार्मिक लोग भले ही होते हैं।

थोड़ी ही दूर पर हरे सम्प्रदाय के आठ दस घर भी हैं। ये सम्प्रदाय सुना कि बाहर से उस मुल्क में आया था। बड़ा शांतिप्रिय समुदाय है। धार्मिक तो इतना कि दिन में कई-कई बार चिल्ला-चिल्ला के पूरे शहर को अपने पूजा पाठ का टाइम बताता है। इनके यहाँ भी कई देवदूत आये गये, कितनी बार आते जाते तो अंतिम वाले ने ऊपर वाले से अंतिम तौर पर उसकी सारी हिदायतें मांग कर नोट कर ली। अब यही किताब इनके लिए जो है सो है। धार्मिक हैं तो बिलाशक भले भी होते हैं।

हुआ कुछ यूं कि किसी दूर देश में, कई शतक पहले 'हरों' ने 'भगवों' की इबादतगाह उजाड़ अपना पूजास्थल बना लिया था, इतने साल सहने के बाद 'भगवों' का खून खौला और उन्होंने अपनी इबादतगाह पर क्लेम कर लिया, मतलब तोड़ ताड़ दिया। तो 'हरों' का खून भी कौन सा हरा था, इन्होंने जगह जगह 'भगवों' के इबादतगाहों की मूर्तियों को तोड़ना चालू किया। इस खून की खौला खौली में बहुत खून बहा। ये बिमारी उस प्रगतिशील मुल्क तक भी पहुंची। अब पता नहीं यहाँ के 'हरों' ने पहले बुत तोड़े या 'भगवों' ने रंग फेंका, जो भी हुआ यहां भी कांड शुरू हो गए।

शहर में कर्फ्यू लगा था, रह रह कर शोर और चीख पुकार की आवाजें सुनाई देना जैसे आम बात हो गई। नरेंद्र बाबू ना तीन में ना तेरह में, चुपचाप अपने घर में बैठे चाय पी रहे थे कि किसी ने दरवाजा भड़भड़ाया, इनकी सिट्टी पिट्टी गुम। शोर की आवाजें पास आ रही थी और इधर दरवाजे के बाहर से दयनीय भीख सी मांगती पुकार, भाई बचा लो, दरवाजा खोल दो, अंदर आने दो, मैं और मेरा छोटा बच्चा, ऊपर वाले के लिए हमें बचा लो। ऊपर वाले के नाम पर, ऊपर वाले को याद कर बाबू साहब ने जैसे तैसे उन दोनों को अंदर ले तो लिया, पर फिर उन्हें याद सा आया कि अरे ये तो 'हरे' वाले हैं। कितना नापसंद करते हैं ये इन्हें। बड़ी कशमकश, क्या करें, बीवी से भी सलाह ली। फिर उन्हें 'भगवों' का पीपल वाला तरीका याद आ गया।
धार्मिक जो थे....


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अजीत
13 सितम्बर 16

Sunday, 11 September 2016

बुद्धिजीविता


जिस तरह आवश्यकता आविष्कार की जननी है वैसे ही अपने लिए अतिआवश्यकता ही कुछ सीखने की मजबूरी। कुछ मामलों में सम्पन्न थे हम, जैसे की दोपहिया। बचपन से ही देखते आये थे पर कभी सीखने का मन नहीं हुआ, वो तो कहो की एग्जाम सेंटर काफी दूर पड़ा तो सिर्फ एग्जाम देने के लिए लगे हाथ बाइक चलाना भी आ ही गया। ऐसे ही पड़ी रहती थी घर में रिटायर्ड बुजुर्गों की तरह, पिताजी पहाड़ पर थे और बड़े भाई की अपनी बाइक, तो अलिखित समझौते की तरह ये तिरासी मॉडल सीडी 100 हमारी सम्पत्ति मान ली गई। पिता कठोर अनुशासन प्रिय थे पर रूपये पैसे दे देते थे, भाई लिबरल थे पर पैसे नहीं देते थे, दोनों का ही उद्देश्य बच्चे को बुराई की तरफ जाने से रोकना ही था पर 'जाको बिगड़ना ही होय, का करी सके कोय'। इस समय हम भाई की छत्रछाया में थे, बाइक तो मिल गई पर चले कैसे, इस मामले में हमारे मित्रगण काम आये। खुद के आने जाने या गर्लफ़्रेंड को घुमाने के लिए बाइक मांगते तो भलमनसाहत से या शायद शुद्ध व्यापारिक रीत से 20 रूपये का तेल डलवा देते। उस समय WTC वाला काण्ड हुआ था फिर भी तेल 25-30 के रेंज में था, अपना काम चल जाता।

सर्वीसिंग जैसी चीज भी होती है पता नहीं था, घिसे जा रहे थे कि एक दिन बड़े भाई ने कान पकड़ 500 रूपये थमाये और बोले, घोड़े हो गए हो तो का हमसे भी बड़े हो गए, मांगने में शर्म आती है, गाभिन भैस की तरह चिचिया रही है गाड़ी और तुम इसे ठेले जा रहे हो।

बनारस में दो ही जगह है जो थोड़ी ठीकठाक है, जहां ठेठ बनारसी अपनी टुच्चई नहीं दिखा पाता, फलस्वरूप ये दो जगह बनिस्पत थोड़े साफ़ हैं, एक बीएचयू दूसरा कैंटोमेंट एरिया। इसी एरिया में बड़े बड़े होटल हैं, बनारस की शान ताजगंगे के सामने, मखमल के कपड़े में पैबंद की तरह, बाइक मिस्त्री की दुकान वर्तमान थी। एक नंबर का मिस्त्री और दो कौड़ी का आदमी। सुबह 8 बजे गाड़ी दो तो 12 बजे का टाइम देता और सच में 3 बजे तक ही दे पाता। ये सारा हिसाब लगा हम 4 बजे इसकी दुकान पहुँचे, हमारी प्रियतमा बाइक 36 टुकड़ो में बिखरी पड़ी थी, आंतरिक हिस्से तेल ग्रीस में लटपटाये बिखरे पड़े थे और मिस्त्री साब रंगीन दांत लिए हमारे सामने बिखर गए, हमें सांत्वना सी देते बोले, बाबूसाब बस 10 मिनट, होई गयल बस।

एक कुर्सी रख दी गई हमारे लिए सड़क से लगी हुई, आधी डब्बी सिगरेट बमय माचिस पेश कर दी गई। हम भी इतनी आवभगत देख, अनुप्रास के तहत, भले आदमियों की तरह भोलेनाथ के भगत बन मुँह से भकाभक धुँआ भकोसने उगलने लगे। सड़क पार थोड़ी दूर स्थित टी हॉउस से, जिसकी इमारत चार पहियों पर चलने वाले ठेले पर बनी थीे, छोटू को आवाज लगा चाय मंगवा ली। किसी भी ट्रक या कार के गुजरने पर होने वाली दहशत के अलावा राजाओं वाली फीलिंग थी ये। सामने के नजारे भी मनभावन थे, हर पांच मिनट बाद गोरे काले विदेशी दिख जाते, ये वो विदेशी थे जो केवल पर्यटन के लिए आते थे, उन गंगा किनारे वाले विदेशियों से रंग वर्ण छोड़ बिलकुल अलग। वो तो हम बनारसियों से बड़े बनारसी लगते हैं अब।

माबदौलत अपनी रियासत की रियाया को साथ में इन विदेशियों की ओर गर्व से देख रहे थे कि ना जाने कहां से एक 10-11 साल का बालक सामने खड़ा हो गया हाथ फैलाये। आम लड़कों जैसा ही लड़का था, बस अपनी दिगम्बरता छुपाने के लिए एक कच्छा टाइप कुछ पहने था। आँख से अनवरत बहते आंसू जो आँखों की गंगोत्री से बहते बहते गालों से होते हुए गले को पार कर, मैदानी क्षेत्रों से गुजरते हुए कच्छे की खाड़ी में लुप्त हो रहे थे। वैसे बालक इतना सुदर्शन था कि रामानंद सागर का बाल बलराम या बी. आर. चोपड़ा का बालक भीम बन सकता था। आँखे बिलकुल बैल जैसी बड़ी बड़ी। बैल हमारे सांस्कृतिक पशु गाय जिसे हम श्रद्धावश माँ कहते है का पुत्र होता है और कुछ सालों पहले तक शहरों में कम और गाँवों में बहुतायत में पाया जाता था पर अब इसका उल्टा है, प्रकृति के अपने नियमों से जैसे हिरण शेरों के बावजूद जंगल में बचे हुए हैं, बैल भी कसाइयों और ट्रकों से बचकर बहुतायत में सड़कों पर स्वच्छंद घूमते और सफाई अभियान में अपना अमूल्य योगदान देते दिख जाते हैं।
अमूमन भिखारियों को देख दिल नहीं पसीजता, पर पता नहीं क्या था इस बच्चे में, इसे देख खुद भिखारी होने की अनुभूति हुई। इस और इस जैसे बच्चों को भीख मांगने पर क्यों मजबूर होना पड़ता है, क्या एक संप्रभु राष्ट्र की नाकामयाबी नहीं ये। बरसों से सुनते आ रहे साम्यवाद और राज करते आ रहे समाजवाद का मजाक सा उड़ाता ये बालक हाथ फैलाये एक रुपया नहीं, जवाब मांग रहा था। राष्ट्रवाद की परिभाषा के अंतर्गत क्या ये लज्जा का विषय नहीं कि भाषणों में जिन बच्चों से उम्मीद की जाती है कि वे आगे चलकर गांधी पटेल अम्बेडकर कलाम रमन बनेंगे वे आज भीख मांग रहे हैं।

इतना कुछ सोचकर लगा कि हल्का हो गया हूं, बुद्धिजीवी यही तो करते हैं ना, पर वो बालक तो अब भी खड़ा था, क्या देता, जेब में सिर्फ पांच सौ थे जो मिस्त्री को देने थे, फुटकर था नहीं, झिड़क दिया उसे। वो भी ढींठ, जाए ही ना, मांगता रहा और मुझे शर्मशार करता रहा। कभी तो उम्मीद टूटनी थी उसकी, आखिरकार कोई और आसामी दिखा तो उधर लपक लिया।

अगले 60-70 मिनट में मुझे वो कई बार दिखा, मेरी तरफ देख मुझे अनदेखा कर किसी और के आगे हाथ फैलाता, जब जब मेरी तरफ आशा से देखता, मैं और संकुचित हो जाता। उसके बहते आंसू मुझे परेशान कर रहे थे। कई बार तो मन आया कि फुटकर करा उसे बुला कर कुछ दे दूँ, पर फिर ना जाने क्या सोच ऐसा किया नहीं। शायद उसे देने वालों की कमी नहीं थी। सामने विदेशियों से भी कुछ ले ही ले रहा था।

आखिरकार मेरी प्रियतमा बाइक तैयार हो गई, पैसे वैसे दे किक मारते समय आज का सबसे बड़ा अजूबा देखा। सामने खोखे पर वही लड़का 7 रूपये वाली सिगरेट पी रहा था (मेरी वाली उस समय ढाई की आती थी), उसने मेरी तरफ देखते हुए धुँआ छोड़ना शुरू किया, लगा कि अनंत काल तक छोड़ता ही रहेगा, कुटिल मुस्कान से मुझे नवाजने के बाद, ठाठ से टैम्पो रुकवाया, हाथ में थामी हुई रेजगारी से भरी पारदर्शी थैली अंदर सीट पर फेंकी, टैम्पो के आगे बढ़ने से तुरंत पहले आधा बाहर लटक कर मुझे बनारस की प्रसिद्ध 'ब' शब्द 'भ' शब्द, जिनके बाद 'के' लगाते हैं और साथ ही भारत भर में प्रसिद्ध 'च' शब्द बोलता, ये जा वो जा।


भरे बाजार वो नंगा, मुझे नंगा कर गया।
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अजीत
11 सितंबर 16

Monday, 29 August 2016

प्रतिशोध



सौरभ:


आज फिर से ये दिन आ गया, पूरे साल में एक यही दिन है जो मुझे हमेशा दुविधा में डाल देता है। इण्डिया से भेजी गई अपनी राखी बांधू या नहीं, शिल्पी हर साल भेजती है और हर साल ही मुझे इस कशमकश के गुजरना पड़ता है। ना पहनूं तो शिल्पी के साथ नाइंसाफी, उस बेचारी का क्या दोष और अगर पहन लूं तो जाने अनजाने प्रिया का दिल जरूर ही दुखा जाऊँगा। हालांकि प्रिया भरपूर कोशिश करती है कि आज के दिन वो नार्मल दिखे पर मैं आखिर पति हूँ उसका, जानता हूं कि वो मन ही मन खूब रोती है, क्या जाने छुप के भी रोती हों। मैं कुछ कर भी तो नहीं पाता, उसको उसके भाई से यूँ जुदा करने वाला भी तो मैं ही हूँ, किस मुँह से उसे समझाऊं और समझाने को है भी क्या। जब मैं खुद राखी टाइम पर ना पहुंचे तो इतना उतावला हो जाता हूँ और ये बेचारी तो कभी भेज ही नहीं सकती।

कुंदन और मैं बहुत अच्छे दोस्त थे, लोग तो हमें सगा भाई ही समझते। ग्रेजुएशन में मिला था ये, ट्रांसफर ले कर जब पहली बार उस कॉलेज में एडमिशन लिया तो नया होने के कारण बाकी लड़के थोड़ा मजा लेने के मूड में रहते पर ये बन्दा बिलकुल अलग ही था, पढ़ाई लिखाई में तो बस पास भर हो लेता पर बाकी चीजों में नम्बर वन था। थोड़ा गुंडा टाइप था, इसे पता नहीं क्या पसन्द आया मुझमे कि दोस्त बन गया मेरा। हम उत्तर दख्खिन थे एक दूसरे के, फिर भी, वो कहते हैं न ऑपोज़िट एट्रैक्ट्स।

मेरे घर का दुलारा था ये और मैं इसके घर का। मेरे पापा मम्मी को तो जैसे इसने गोद ले लिया हो, साले तो ना तो कहना ही नहीं आता था, वो लोग जो भी कह दे, बस हुक्म की देर और ये जिन्न की तरह उसे पूरा करने में लग जाता। शिल्पी भी मुझसे ज्यादा इसी को भैया भैया बोल सारे काम निकलवा लेती। ये तो चोट्टी थी ही शुरू से, मैं इसके झांसे में नही आता पर कुंदन तो भोला शंकर, जो कह दो, नो इफ नो बट, काम हो जाना है चाहे जैसे भी हो।

इसके घर में मेरी इज्जत होने का सिर्फ एक कारण था कि मैं टॉपर था, पढ़ाई में सबसे आगे। मेरी वजह से बेचारे को रोज ताने मिलते, साला पढ़ता भी तो नहीं था कभी। बस एग्जाम से पहले मेरे घर में डेरा डाल लेता या मुझे अपने घर बिठा लेता, इसके लिए रात भर की पढाई काफी होती सेमेस्टर क्लियर करने के लिए। दिमाग तो था बन्दे में, पर खुराफात से बचे तो पढ़ाई में लगाए न। कभी किसी का सर फोड़ रहा होता या कहीं कोई समझौता, कभी इस यूनिवर्सिटी में तो कभी उस डिग्री कॉलेज में चुनाव लड़वा रहा होता, ना जाने किन किन फंदों में उलझा ही रहता हमेशा।
प्रिया इसकी सगी जुड़वाँ बहन है। हमउम्र होने की वजह से इन दोनों के बीच भी दोस्ती वाला रिश्ता ही था, तो मेरे से भी वैसा ही रिश्ता बन गया था। मैं थोड़ा शर्मिला टाइप इंसान हूं, जब भी ये सामने आती मेरी बत्ती गोल कर जाती, शरारत में तो कुंदन का बाप थी ये। पर मुझे भी इसकी शरारतें अच्छी लगती। कितनों को नसीब होता है भई लड़कियों से छिड़ना। सच मानिए, मैंने बहुत कोशिश की कि इस चक्कर में ना पडूं पर इस क्यूपिड ने तो अपना तीर निशाने पर बैठा के मारा था, क्या करता।

पता था, जानता था, और वो भी जानती थी कि कोई भी ना तो इसे समझेगा ना स्वीकार ही करेगा। क्या करता, उसकी शादी तय हो रही थी, कैसे हो जाने देता, और वो भी तो जिद किये बैठी थी। भाग गए हम, कितना वाहियात सा शब्द है ना 'भाग गये'। अबे पागल कुत्ते ने काटा था या भागने का शौक था, करा दी होती शादी। तुम भी चैन से रहते और हम भी, पर नहीं भई, तुम्हे तो इस समाज में अपनी ये बित्ते भर नाक जो संभालनी है। देख लो इसका अंजाम, ना तुम चैन से होगे और हम तो बस जी ही रहे हैं जैसे तैसे।

साले कुंदन, माफ़ कर दे यार अपने दोस्त को...
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कुंदन:

बाई गॉड, जिंदगी में इतने धोखे खाये पर कभी इतना अफ़सोस ना हुआ, ई साला सौरभवा कमीना जो धोखा दिया है न। ई साले को हम छोड़ेंगे नहीं। मने का, समझ का लिया है उसने कि कुंदन को धोखा देना और फिर उसे पचा जाना इतना आसान है का। मिलो साले तुम बताते हैं तुम्हे।

अबे, दुनिया में सारी लड़कियां मर गई रही जो अपने दोस्त के घर में ही डाका डाल दिए। साले, एक्को बार सोचे भी नहीं कि कर का रहे हो, किसके साथ कर रहे हो। कमीने, भाई मानते थे हम तुम्हें, का नहीं किये बे हम तुम्हारे लिए। तुम्हरे बाउजी बीमार थे तो हर पल तुम्हारे साथ खड़े रहे एक टांग पर, तुमरी माइ को अपनी गाड़ी में बैठा के चन्दौली ले जाते थे वैद्य जी के यहां गठिया के इलाज के लिए, काहे से कि तुम साले इंटरव्यू की तैयारी कर सको। और प्रियवा से जियादा तुमरी शिल्पीया को अपनी बहन माने थे बे, और तुम साले बेगैरत इंसान, हमरी बहन से ही फ्लर्ट किये। हमारी नाक के नीचे तुम ये गुल खिलाये और हमको अपना दोस्त भी बोलते रहे। का सच में तुम्हारे मन में एक्को बार ख्याल नहीं आया कि तुम कर क्या रहे हो।

आज भी वो दिन याद है जब तुम आये थे हमे बताने कि तुम प्रिया से शादी करना चाहते हो, हम समझाए थे ना तुम्हे कि संभव ही नहीं है ये, और तुम भी तो चले गए थे, और वादा भी कर गए थे कि कोई गलत काम नहीं करोगे, फिर साले मक्कार, चार ही दिन बाद तुम अपने घर ले गए हमारी बहन को भगा के। अरे शुक्र मनाओ कि शिल्पी आ गई थी बीच में, वरना महादेव की सौगंध, तुमरा तो उसी दिन राम नाम सत कर दिये थे हम।

तुम भाग के यहां अमरीका आ गए, का सोचे थे बे कि अमरीका मंगल पर हैं, और कुंदन इतना गवाँर है कि यहां आ ही नहीं सकता। देखो बे, आ गए है हम, और बेटा थोड़ी ही देर में तुमरे दरवाजे पे होंगे, इस बार कोई शिल्पी फिल्पी नहीं आएगी तुम्हे बचाने, इस बार का करोगे मुन्ना। आ रहे हैं बे, आ रहे हैं....
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प्रिया:

कोई ना कोई बहाना बना कर ये आज के दिन छुट्टी ले ही लेते हैं। सोचते हैं कि कैसे भी प्रिया को खुश रखूं आज के दिन। सोचते हैं कि मुझे आज के दिन अपने घर परिवार की याद आती है। मेरे क्यूट हबि, मुझे सिर्फ आज नहीं, रोज ही याद आती हैं उन सबकी। पर रोज रोज तो रो नहीं सकती न, और तुम्हारा क्या हाल हो जाता है मुझे परेशान देखकर। तुम भरपूर कोशिश करते हो मुझे खुश रखने की, अपनी राखी भी नहीं बाँधना चाहते कि कहीं मुझे बुरा ना लगे। पगलू, मुझे क्यों लगेगा बुरा, हाँ पर याद तो आती है ना। क्या करूँ, कैसे भूल जाऊं उन्हें।
कुंदन बस मुझसे 2 मिनट ही तो छोटा है। उसका मुझे चुड़ैल और चोट्टी कहना कितना बुरा लगता था मुझे, पर जब भी कोई बड़ा काण्ड करता माँ पा की डांट से बचने के लिए दीदी दीदी बोल मुझसे मदद मांगता। कितना भोला कितना प्यारा लगता उस समय।

भाई, फिर ना जाने कहां से तुम्हारा एक दोस्त आ गया हमारी जिंदगी में। तुमने ही तो मिलवाया था उससे, कितना भोंदू टाइप था तुम्हारा दोस्त। तुम्हारे बाकी दोस्तों से बिलकुल अलग, चुप शर्मीला और शरीफ। शराफत पहचानने का खास सिस्टम लगा होता है हम लड़कियों में। 

तुम्हे शायद लगता हो भाई कि तुम्हारे दोस्त ने धोखा दिया और तुम्हारी बहन तुमसे छीन ले गया, पर सच तो ये है भाई कि तुम्हारी बहन ने तुम्हारे दोस्त को तुमसे छीन लिया। पहल तो मैंने की थी भाई, तुम्हें समझाना भी चाहा था पर तुम बैल बुध्दि जो हो, कहां समझे।

सुकून तलाशते हम यहां आ गए पर आज इतने सालों बाद भी हम तुम्हें याद करते हैं कुंदन। हमें माफ़ कर दो भाई...
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ओफ्फो, अरे कभी इस फोन को छोड़ भी दिया करो, कब से तो डोरबेल बजी जा रही है, ये नहीं कि उठ के देख ही लूँ... अब क्या आ रहे हो, जाओ पसरो अपनी मुई चेयर पे, अब तो आ ही गई मैं। ये भी पता नहीं कौन आ गया दोपहर के समय, आ गई बबा....
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कौन है प्रिया.... कुंदन तू....


हाँ कमीने मैं, अंदर नहीं बुलाएगी दी।
हूं, घर तो बड़ा अच्छा बना रखा है यार,........ अरे तुम दोनों ऐसे क्या देख रहे हो, शॉक लगा क्या, आओ आओ, बैठो ना, तुम्हारा ही तो घर है।...........
यार बड़ी प्यास लगी है, पानी वाली पिलाने का रिवाज है तुम्हारे अमरिक्का में। और हां चोट्टी सुन, आज शाम को ही वापस जाना है मुझे, जो करना वरना है जल्दी कर लियो .................
अबे घूर क्यों रहे हो तुम दोनों, राखी नहीं मिलती क्या तुम्हारे अमरीका में.....



अजीत
29 अगस्त 16

Tuesday, 23 August 2016

पहला प्यार


आप में से कितने लोगों को अपना पहला प्यार याद है? सच में सोच के बताइयेगा, पहला प्यार हाँ, पहला कामयाब प्यार नहीं।

जहां तक मुझे याद है मेरा वास्तविक वाला बिलकुल जेनुइन, दिल की धड़कन बढ़ा देने वाला पहला प्यार कक्षा चार (हमारे यहां वैसे बोलते समय मुँह से कच्छा ही निकलता है) में हुआ था। ... अरे नहीं, मैडम से नहीं, हिंदी मीडियम विद्यालय वाले हैं भई, पब्लिक स्कूल वाले नहीं जो 'मैम' से प्यार हो जाए, हिंदी वाले विद्यालयों में 'बहिन जी' होती हैं। वैसा फील नहीं आ पाता। तो वो जो थी ना, हमारे ही कक्षा में पढ़ती थी, हम लड़कों वाली रो के साइड वाले फ्रंट बेंचर और वो लड़कियों वाली रो की।

नये नये आये थे हम मथुरा से, उस प्रेम नगरी का ही कुछ प्रभाव रहा होगा शायद। पिता जी जब हेड मासाब के ऑफिस से एक शक्ल से ही लगने वाले घनघोर जालिम माट साब के हवाले किये तो गंगा मैया की कसम पैन्ट गीली होते होते रही थी, जाने कहां फँस गये, पर जब क्लास में प्रवेश किये तो दो में से एक चुटिया के अंतिम छोरों के बालों के बीच से झांकते उन बिलकुल काली आँखों को देखते ही दिल जो धड़का कि लगा, ओ बेट्टा जी, जे का भवा।

पढ़ने लिखने में हम तो बचपन से ही 'तुषार कपूर' थे, स्कूल जाना तो जैसे रोज का 'काला पानी', पर अब उस लड़की को देखने के बाद स्कूल से आते ही अगले दिन स्कूल जाने का इंतज़ार रहता। इक बार अंग्रेजी वाले माट साब सनक गये, एक एक कर सारे बच्चों से एप्पल की स्पेलिंग पूछने लगे, इतना खूंखार चेहरा था उनका बच्चे डर के मारे सब उल्टा पुल्टा बोल दें, और फिर डस्टर से दो डस्टर उलटे हाथ पर। मेरी बारी आई तो डर के मारे कुछ भी मुँह से निकाल दिया, आती नहीं थी स्पेलिंग, जो भी बोलते गलत ही बोलते पर वो कहते हैं ना कि 'जिसके ऊपर हो तुम स्वामी...' तुक्का लग गया। पूरी छियालीस बच्चों की क्लास में एक मैं और दूसरी वो मार खाने से बचे, हम दोनों को ही खड़ा कर हमारी तारीफ़ हुई।

अब तो भई, हम दो ब्रिलिएंट, नोट्स एक्सचेंज होने लगे, एक दूसरे के टिफिन शेयर, पता नहीं ब्रेड के साथ कोई वो लिसलिसा जैम कैसे खा सकता है। ओहो भाई साब, क्या दिन थे, केवल उसको इम्प्रेस करने के लिए तेरह का पहाड़ा पूरा याद कर लिया था।

हमारी ये दोस्ती धुँवाधार चल रही थी और मैं अपने अंदर हिम्मत जगा रहा था कि जैसे भी हो इस दोस्ती को रिश्तेदारी में... नहीं नहीं ये तो बड़े लोग करते हैं... दोस्ती तो 'मोहोब्बत' में बदल दूँ। बड़ी रिसर्च के बाद पक्का किया कि अपने जन्मदिन के दिन क्लास में टॉफी बांटने के बाद उसे इंटरवल में अपने दिल की बात बताई जाये।

बड़े मन से उस दिन उसे चापाकल के पास वाले पेड़ के नीचे ले आये और बोले, ए हमको तुमसे कुछ कहना है, वो क्या है न कि हम... इतना ही अभी बोल पाये थे कि उसे जोर की आक-छिं आ गई, नाक से निकला इतना बड़ा गुब्बारा पहली बार ही देखा था मैंने, हालाँकि थूक से तो हम लड़के गुब्बारे बनाते ही रहते थे, आप भी ट्राई करना, पर नाक से निकला गुब्बारा, फिर वो फट्ट की आवाज से उसका फूट जाना और होंठों से होता हुआ ठुड्डी तक पहुंचना...। एक जोर की उलटी के साथ अंदर भरा सारा प्यार बाहर।

जी यही था मेरा पहला प्यार...
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अजीत
24 अगस्त 16

Monday, 22 August 2016

राम मिलाये जोड़ी


राम मिलाये जोड़ी...
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एक रहें जी पी सिंह। गजबे किरान्तिकारी, ना ना, आप गलत मत बूझिये, सब जेएनयू टाइप ही नहीं होते, ई थोड़े अलग टाइप के थे। क्रांति की शुरुआत अपने नाम से ही किये। दरअसल हुआ ये कि इनके चार अग्रज शैशवावस्था में ही कालकलवित हो गए तो पूर्वांचल बिहार की परम्परानुसार इनका अटपटा नाम रखा गया, घुस्सु परसाद। भले ही शुभ कामना से रखा गया हो, पर बताइये, जे भी कोई नाम हुआ, तो पहली फुर्सत में इन्होंने स्वयं का नामकरण किया ग्रिजेश प्रताप।

इतने किरान्तिकारी थे बचपन से कि जो कहा जाए उसका उल्टा ही करते। सब्जी मंडी जाते तो छाँट के रूढ़ भिन्डी और पिलपिले टमाटर लाते। पढ़ाई से इतना प्यार करते कि किताबों के अंदर पहिले कॉमिक्स फिर बड़े होने पर 'वेद प्रकाश शर्मा' या 'पाठक' डाल कर पढ़ते। माँ बाप की उम्मीदों का सफलतापूर्वक चूरा बनाते हुए कुल मिलाकर डेढ़ पंचवर्षीय योजना में 10वीं और 12वीं निपटाया। डॉक्टर इंजिनियर तो अब किस बूते बनते तो यूपी कॉलेज से बीए शुरू। अब ई उमर में प्रेम ना हो तो जिनगी बेकार है रे साथी। भरकस परयास चालू किये और कहते हैं न कि करत करत अभ्यास से... तो एक सावली सलोनी को अपने इशक में गिरफ्तार करा ही लिए। ओहो, फिर तो जो आनंद मिला जीवन का, बनारस कोई मुम्बई तो है नहीं तो गुपचुप इशारे होते, संकेतों से ही रूठना मनाना। नया नया मोबाइल चला तो अम्बानी को धनबाद देते हुए लंबी लंबी बातों के दौर चलने लगे। बड़ी हिम्मत से एक बार मिलने का प्रोग्राम बनाया भारत माता मंदिर में। विद्यापीठ के पास इस मंदिर और साथ लगे पार्क में ज्यादा भीड़ नहीं होती, वो क्या हैं ना कि ई SM में ही सारी भक्ति उड़ेल देने के बाद कुछ बचता जो नहीं है। आहा, इतने एकांत की पहली मुलाकात, तनी मनी प्रैक्टिकल करने का मौका, गंगा सिनेमा की मूवी याद आने लगी। वापस आते समय चेहरा अइसे जइसे... अब खुदे बूझ जाइये। फिर तो बनारस का कोई पार्क नहीं बचा जहां ये दो फूल आपस में लड़ ना जाते हों।
अब तो भाई किरान्तिकारी दिल ने प्रेम विवाह की ठान ली, मुहूर्त वगैरह निकाल लिए भगने का, और पीछे एक चिट्ठी छोड़ पहुंच गए कैंट स्टेशन। बेचारे फोन पर फोन किये जा रहे अपनी माशूका को और उधर से कोई जवाब नहीं। लौट के बुद्धू घर को आये। पर तब तक बाबूजी पढ़ चुके थे क्रांति का घोषणापत्र, फिर तो गालों पर आधा दिन और पीठ पर एक महीना क्रांति के लाल काले नीले निशान पड़े रहे। रे साथी, प्रेम बड़ा दर्द देता है रे।
सामन्तशाही ने कभी भी क्रांति को स्वीकार नहीं किया, संधि और शांति के सारे परयासों को कुचलते हुए सामन्त बाप ने बियाह तय कर दिया लड़के का, और जुलम ये कि लड़की की तस्वीर तक ना दिखाई। दिन नजदीक आते जाते, हल्दी के पीले रंग से खून और खौलता, पर उस लउर व उससे पड़े लाल काले नीले निशान याद आते ही खौलता खून झाग की तरह बैठ जाता। आखिर शादी हो ही गई, अब जब हो ही गई तो का कर सकत हैं। अपरम्परागत शराब पीकर और परंपरागत पान चुभलाते पहुँचे अपने कमरे में, देखा, दुल्हिन बैठी है अवगुंठन डाले। गला खखार के नजदीक बैठे, पान का आधा रस उदरस्थ और आधा बचाये रख ऊपर मुँह कर भरकस रोबीली आवाज में बोले,
सुनिए, देखिये हम लोग नई जिनगी शुरू करे जा रहे है तो अदरवाइज मत लीजियेगा, वो क्या है कि आई मीन टु से, हम लोगों को न एकदूसरे को अपनी पुरानी जिनगी के बारे में ना सबकुछ सच सच बात देना चाहिए, दैट्स भाई कि आगे कोनो कनफूजन ना रहे। एक्चुली हम ओपन माइंड हैं, तो बताइए अपने बारे में। (कॉकटेल पी लिए थे तो भाषा भी कॉकटेल ही न निकलेगी)

ल, चुप काहे हैं, अच्छा शर्मा रही हैं, तो चलिए हम ही पाहिले बताते हैं। देखिये हम बहुते शरीफ टाइप के आदमी हैं। लब वभ से कउनो प्रोबलम नहीं है पर हम कबो ना किये। बाबूजी जहां कहे हम चुप मार के मान लिए। अब कोई बुरा थोड़ी ना चाहेंगे हमरे बदे। अच्छा चलिये अब आप बताइए। अब बोलिए भी, गूंगी तो नहीं हैं न आप।
लड़की भी बेचारी कई रातों की जगी, थकी आवाज में, जी हम भी ई लब सभ नहीं मानते, छी छी, का जरूरत है ई सब का, हम भी कबो ना परे इसके फेरा में।
मन में लड्डू फोड़ते, बचा हुआ पान रस पीने के बाद, सौन्दर्यपान की अभिलाषा लिए धीरे धीरे घूंघट उठाया, अहा क्या चेहरा, ठुड्डी के नीचे उंगली लगा चेहरा उठाया और...
तुम....
लड़की भी
तुम...
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जा ए ग्रिजेश प्रताप, तू घुस्सु प्रसाद ही निकले...
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अजीत
22 अगस्त 16

Sunday, 14 August 2016

जो शहीद हुए हैं उनकी...


रमेसरा बहुते साधारण टाइप का लड़का था। साधारण जिले के साधारण गांव के साधारण किसान परिवार में जन्मा। थोड़ी सी खेती थी जो हर दूसरे साल मौसम की भेंट चढ़ जाती। इस पूत के पांव दिखने लगे थे बचपन से ही। गजब का चटोर और चोट्टा, राब गुड़ अचार इससे बचा के रखना पड़ता। कुछ नहीं पाता तो डलिया भर बाजरा या गेंहू ले पहुँच जाता बनिए के यहां, गावों में आज भी विनिमय का ये तरीका अपनाया जाता है। आलसी बड़ा वाला, एक काम टाइम पर नहीं करता, और मजबूरी में करना ही पड़े तो इतने बुरे तरीके से करता कि अगला उसे फिर कभी कोई काम बोल ही ना सके। स्कूल जाना बहुत पसंद करता, पर खाली जाना हाँ, पढ़ना नहीं, क्योंकि रास्ते में सड़क किनारे ढेरों आम बढ़हल कटहल जामुन बेर के पेड़ मिलते। उस टाइम गुरूजी लोग भी इतना पीटते कि कौन पिटने जाए, इससे तो अच्छा की बगीचे में कंचे खेल लो।
कोढ़ में खाज ये कि टीवी पुरे गाँव में सिर्फ इसके यहाँ, लाइट हो ना हो टीवी जरूर चलती, जुगाड़ में हमारे लोगों का ऐसे ही इतना नाम नहीं है, कार या ट्रक की बैटरी से आराम से चल जाते। लोग टीवी के साथ बैटरी भी याद से खरीद लेते, चार्जिंग फी यही कोई दो तीन रुपये। तो प्रोग्राम आता दिन में जो बंक मारने का बहुत बड़ा कारण था, शक्तिमान और युग बदला बदला हिन्दोस्तान।
जैसे तैसे 10वीं पास कर ली, इससे ज्यादा पढ़ने की हिम्मत ना थी छोरे में, सिर्फ आगे और ना पढ़ना पड़े, बन्दे ने सुबह सुबह भर्ती की तैयारी करते लड़कों की देखा देखी दौड़ लगानी शुरू कर दी। बैल बुद्धि तो था ही, ऊपर से लड़के ललकार भी देते, शुरू शुरू में तो सिर्फ पढ़ना ना पड़े इसके लालच में ये सब शुरू किया फिर उसका मन लग गया इसमें। दौड़ते हुए अपने शरीर से बहता पसीना और कसरत के बाद फूलते पिचकते मसल अच्छे लगने लगे। सुबह दौड़ते हुए गंगा तक जाना, फिर लंबी कूद की प्रैक्टिस, फिर वहीं नहा वहा के, साथ लाये भीगे चने चबाना, दोपहर बीतते ही सड़कों पर दौड़ लगाना फिर वापस आकर दंड बैठक डिप्स जैसे पचासों कसरतें करना उसका शौक हो गया।
पहली भर्ती बनारस देने गया, लंबाई थोड़ी कम रह गई, गुस्से में भुनभुनाता वापस आया और रोज घंटों पुल अप करने लगा, अगली भर्ती में फिजिकल स्टैण्डर्ड टेस्ट पास कर गया पर फिजिकल एफिशिएंसी टेस्ट में भरी दोपहरिया में थकान और डिहाइड्रेशन की वजह से दौड़ में रह गया। अब उसने गर्मियों की दोपहर में भी दौड़ना शुरू किया।
इलाहाबाद वाली भर्ती में उसकी मेहनत रंग लाई, रिटेन और मेडिकल भी निकल गए। सेलेक्ट हो गया सीआरपीएफ में। ट्रेनिंग के बाद पहली पोस्टिंग काश्मीर मिली। कंपनी में अलग अलग राज्यों के बन्दे, सहज होने में थोड़ा समय लगा फिर सब ठीक हो गया। एक बार यूनिफॉर्म के कंधे की स्ट्रिप नहीं लगी थी तो साथियों ने मजाक बनाया कि क्यों बे तेरे दिन चल रहे हैं क्या। महिला सिपाही 'उन दिनों' में अपने कंधे की स्ट्रिप के बटन नहीं लगाती, ताकि कमांडर समझ जाए और ज्यादा भारी ड्यूटी ना लगाये। वैसे इन लड़कियों को देखकर बड़ा ताज्जुब होता, फिजिकल में भले ही मापदंड कम हों पर यहां मेहनत तो वो भी बराबर ही करती थी।
पहली बार जब दो महीने की छुट्टी में घर जाने का मौका मिला तो किसी आर्मी वाले की हेल्प से आर्मी कैंटीन से ढेर सारे डव लाइफबॉय आंवला तेल और ना जाने क्या क्या ले गया। दूसरे दिन ही पिता ने बरक्षा तय कर दिया था, लड़का नौकरी में है तो दाम भी अच्छे लगे थे। अगले साल शादी भी हो गई और कुछ ही दिनों में साहबेऔलाद भी हो गया।
काश्मीर यूनिवर्सिटी के गेट पर ड्यूटी थी तो वहाँ के लड़के लड़कियां मुस्कुराते हिकारत की नजर से देख आगे बढ़ जाते। एक बार एक लड़की ने तंज कसा, तुम लोगों की जरूरत नहीं यहां, गो बैक। इसने जवाब दिया, मैडम तुम पढ़ा लिखा है, मुझसे क्यों बोलता है, तुम वोट डालता है ना, अपने नेता से बोलो, मैं तो अपना ड्यूटी देता है।
खबर मिली कि कुछ आतंकी एक घर में छुपे बैठे हैं। मोर्चा लेने इसकी कंपनी गई। घंटो फायरिंग के बाद जब उधर से आवाजे आनी बन्द हुई तो कमांडर ने इसे आगे बढ़ कर खिड़की में से घर के अंदर बम फेंकने को कहा, कोहनी और घुटनों के बल बहुत तेज चलता था ये, छिपकली की तरह सरपट भाग बम फेंक आया, फिर हुक्म मिला, फिर गया, ऐसे ही सात बम फेंक आया। आंठवी बार भी यही हुक्म मिला तो बैल बुद्धि, सीना तान आगे बढ़ा, जब सात बार में कुछ नहीं हुआ, जो अंदर होगा वो तो मर ही गया होगा न, खिड़की पर पहुंच बम फेंकने की जगह अंदर झाँकने लगा, अंदर देखा कि जमीन से लगी लकड़ी के फट्टे से एक नाल झांक रही है और फिर रेट रेट...
साधारण किसान का बेटा बाकियों के लिए साधारण मौत मर गया। रमेश चंद्र का शरीर घर पहुंचा दिया गया, शहीद के तमगे के बिना, इस फोर्स के लोगों को सिर्फ अखबार के एक छोटे से टुकड़े में ही शहीद कहा जाता है।
अजीत
15 अगस्त 16