Monday, 29 August 2016

प्रतिशोध



सौरभ:


आज फिर से ये दिन आ गया, पूरे साल में एक यही दिन है जो मुझे हमेशा दुविधा में डाल देता है। इण्डिया से भेजी गई अपनी राखी बांधू या नहीं, शिल्पी हर साल भेजती है और हर साल ही मुझे इस कशमकश के गुजरना पड़ता है। ना पहनूं तो शिल्पी के साथ नाइंसाफी, उस बेचारी का क्या दोष और अगर पहन लूं तो जाने अनजाने प्रिया का दिल जरूर ही दुखा जाऊँगा। हालांकि प्रिया भरपूर कोशिश करती है कि आज के दिन वो नार्मल दिखे पर मैं आखिर पति हूँ उसका, जानता हूं कि वो मन ही मन खूब रोती है, क्या जाने छुप के भी रोती हों। मैं कुछ कर भी तो नहीं पाता, उसको उसके भाई से यूँ जुदा करने वाला भी तो मैं ही हूँ, किस मुँह से उसे समझाऊं और समझाने को है भी क्या। जब मैं खुद राखी टाइम पर ना पहुंचे तो इतना उतावला हो जाता हूँ और ये बेचारी तो कभी भेज ही नहीं सकती।

कुंदन और मैं बहुत अच्छे दोस्त थे, लोग तो हमें सगा भाई ही समझते। ग्रेजुएशन में मिला था ये, ट्रांसफर ले कर जब पहली बार उस कॉलेज में एडमिशन लिया तो नया होने के कारण बाकी लड़के थोड़ा मजा लेने के मूड में रहते पर ये बन्दा बिलकुल अलग ही था, पढ़ाई लिखाई में तो बस पास भर हो लेता पर बाकी चीजों में नम्बर वन था। थोड़ा गुंडा टाइप था, इसे पता नहीं क्या पसन्द आया मुझमे कि दोस्त बन गया मेरा। हम उत्तर दख्खिन थे एक दूसरे के, फिर भी, वो कहते हैं न ऑपोज़िट एट्रैक्ट्स।

मेरे घर का दुलारा था ये और मैं इसके घर का। मेरे पापा मम्मी को तो जैसे इसने गोद ले लिया हो, साले तो ना तो कहना ही नहीं आता था, वो लोग जो भी कह दे, बस हुक्म की देर और ये जिन्न की तरह उसे पूरा करने में लग जाता। शिल्पी भी मुझसे ज्यादा इसी को भैया भैया बोल सारे काम निकलवा लेती। ये तो चोट्टी थी ही शुरू से, मैं इसके झांसे में नही आता पर कुंदन तो भोला शंकर, जो कह दो, नो इफ नो बट, काम हो जाना है चाहे जैसे भी हो।

इसके घर में मेरी इज्जत होने का सिर्फ एक कारण था कि मैं टॉपर था, पढ़ाई में सबसे आगे। मेरी वजह से बेचारे को रोज ताने मिलते, साला पढ़ता भी तो नहीं था कभी। बस एग्जाम से पहले मेरे घर में डेरा डाल लेता या मुझे अपने घर बिठा लेता, इसके लिए रात भर की पढाई काफी होती सेमेस्टर क्लियर करने के लिए। दिमाग तो था बन्दे में, पर खुराफात से बचे तो पढ़ाई में लगाए न। कभी किसी का सर फोड़ रहा होता या कहीं कोई समझौता, कभी इस यूनिवर्सिटी में तो कभी उस डिग्री कॉलेज में चुनाव लड़वा रहा होता, ना जाने किन किन फंदों में उलझा ही रहता हमेशा।
प्रिया इसकी सगी जुड़वाँ बहन है। हमउम्र होने की वजह से इन दोनों के बीच भी दोस्ती वाला रिश्ता ही था, तो मेरे से भी वैसा ही रिश्ता बन गया था। मैं थोड़ा शर्मिला टाइप इंसान हूं, जब भी ये सामने आती मेरी बत्ती गोल कर जाती, शरारत में तो कुंदन का बाप थी ये। पर मुझे भी इसकी शरारतें अच्छी लगती। कितनों को नसीब होता है भई लड़कियों से छिड़ना। सच मानिए, मैंने बहुत कोशिश की कि इस चक्कर में ना पडूं पर इस क्यूपिड ने तो अपना तीर निशाने पर बैठा के मारा था, क्या करता।

पता था, जानता था, और वो भी जानती थी कि कोई भी ना तो इसे समझेगा ना स्वीकार ही करेगा। क्या करता, उसकी शादी तय हो रही थी, कैसे हो जाने देता, और वो भी तो जिद किये बैठी थी। भाग गए हम, कितना वाहियात सा शब्द है ना 'भाग गये'। अबे पागल कुत्ते ने काटा था या भागने का शौक था, करा दी होती शादी। तुम भी चैन से रहते और हम भी, पर नहीं भई, तुम्हे तो इस समाज में अपनी ये बित्ते भर नाक जो संभालनी है। देख लो इसका अंजाम, ना तुम चैन से होगे और हम तो बस जी ही रहे हैं जैसे तैसे।

साले कुंदन, माफ़ कर दे यार अपने दोस्त को...
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कुंदन:

बाई गॉड, जिंदगी में इतने धोखे खाये पर कभी इतना अफ़सोस ना हुआ, ई साला सौरभवा कमीना जो धोखा दिया है न। ई साले को हम छोड़ेंगे नहीं। मने का, समझ का लिया है उसने कि कुंदन को धोखा देना और फिर उसे पचा जाना इतना आसान है का। मिलो साले तुम बताते हैं तुम्हे।

अबे, दुनिया में सारी लड़कियां मर गई रही जो अपने दोस्त के घर में ही डाका डाल दिए। साले, एक्को बार सोचे भी नहीं कि कर का रहे हो, किसके साथ कर रहे हो। कमीने, भाई मानते थे हम तुम्हें, का नहीं किये बे हम तुम्हारे लिए। तुम्हरे बाउजी बीमार थे तो हर पल तुम्हारे साथ खड़े रहे एक टांग पर, तुमरी माइ को अपनी गाड़ी में बैठा के चन्दौली ले जाते थे वैद्य जी के यहां गठिया के इलाज के लिए, काहे से कि तुम साले इंटरव्यू की तैयारी कर सको। और प्रियवा से जियादा तुमरी शिल्पीया को अपनी बहन माने थे बे, और तुम साले बेगैरत इंसान, हमरी बहन से ही फ्लर्ट किये। हमारी नाक के नीचे तुम ये गुल खिलाये और हमको अपना दोस्त भी बोलते रहे। का सच में तुम्हारे मन में एक्को बार ख्याल नहीं आया कि तुम कर क्या रहे हो।

आज भी वो दिन याद है जब तुम आये थे हमे बताने कि तुम प्रिया से शादी करना चाहते हो, हम समझाए थे ना तुम्हे कि संभव ही नहीं है ये, और तुम भी तो चले गए थे, और वादा भी कर गए थे कि कोई गलत काम नहीं करोगे, फिर साले मक्कार, चार ही दिन बाद तुम अपने घर ले गए हमारी बहन को भगा के। अरे शुक्र मनाओ कि शिल्पी आ गई थी बीच में, वरना महादेव की सौगंध, तुमरा तो उसी दिन राम नाम सत कर दिये थे हम।

तुम भाग के यहां अमरीका आ गए, का सोचे थे बे कि अमरीका मंगल पर हैं, और कुंदन इतना गवाँर है कि यहां आ ही नहीं सकता। देखो बे, आ गए है हम, और बेटा थोड़ी ही देर में तुमरे दरवाजे पे होंगे, इस बार कोई शिल्पी फिल्पी नहीं आएगी तुम्हे बचाने, इस बार का करोगे मुन्ना। आ रहे हैं बे, आ रहे हैं....
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प्रिया:

कोई ना कोई बहाना बना कर ये आज के दिन छुट्टी ले ही लेते हैं। सोचते हैं कि कैसे भी प्रिया को खुश रखूं आज के दिन। सोचते हैं कि मुझे आज के दिन अपने घर परिवार की याद आती है। मेरे क्यूट हबि, मुझे सिर्फ आज नहीं, रोज ही याद आती हैं उन सबकी। पर रोज रोज तो रो नहीं सकती न, और तुम्हारा क्या हाल हो जाता है मुझे परेशान देखकर। तुम भरपूर कोशिश करते हो मुझे खुश रखने की, अपनी राखी भी नहीं बाँधना चाहते कि कहीं मुझे बुरा ना लगे। पगलू, मुझे क्यों लगेगा बुरा, हाँ पर याद तो आती है ना। क्या करूँ, कैसे भूल जाऊं उन्हें।
कुंदन बस मुझसे 2 मिनट ही तो छोटा है। उसका मुझे चुड़ैल और चोट्टी कहना कितना बुरा लगता था मुझे, पर जब भी कोई बड़ा काण्ड करता माँ पा की डांट से बचने के लिए दीदी दीदी बोल मुझसे मदद मांगता। कितना भोला कितना प्यारा लगता उस समय।

भाई, फिर ना जाने कहां से तुम्हारा एक दोस्त आ गया हमारी जिंदगी में। तुमने ही तो मिलवाया था उससे, कितना भोंदू टाइप था तुम्हारा दोस्त। तुम्हारे बाकी दोस्तों से बिलकुल अलग, चुप शर्मीला और शरीफ। शराफत पहचानने का खास सिस्टम लगा होता है हम लड़कियों में। 

तुम्हे शायद लगता हो भाई कि तुम्हारे दोस्त ने धोखा दिया और तुम्हारी बहन तुमसे छीन ले गया, पर सच तो ये है भाई कि तुम्हारी बहन ने तुम्हारे दोस्त को तुमसे छीन लिया। पहल तो मैंने की थी भाई, तुम्हें समझाना भी चाहा था पर तुम बैल बुध्दि जो हो, कहां समझे।

सुकून तलाशते हम यहां आ गए पर आज इतने सालों बाद भी हम तुम्हें याद करते हैं कुंदन। हमें माफ़ कर दो भाई...
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ओफ्फो, अरे कभी इस फोन को छोड़ भी दिया करो, कब से तो डोरबेल बजी जा रही है, ये नहीं कि उठ के देख ही लूँ... अब क्या आ रहे हो, जाओ पसरो अपनी मुई चेयर पे, अब तो आ ही गई मैं। ये भी पता नहीं कौन आ गया दोपहर के समय, आ गई बबा....
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कौन है प्रिया.... कुंदन तू....


हाँ कमीने मैं, अंदर नहीं बुलाएगी दी।
हूं, घर तो बड़ा अच्छा बना रखा है यार,........ अरे तुम दोनों ऐसे क्या देख रहे हो, शॉक लगा क्या, आओ आओ, बैठो ना, तुम्हारा ही तो घर है।...........
यार बड़ी प्यास लगी है, पानी वाली पिलाने का रिवाज है तुम्हारे अमरिक्का में। और हां चोट्टी सुन, आज शाम को ही वापस जाना है मुझे, जो करना वरना है जल्दी कर लियो .................
अबे घूर क्यों रहे हो तुम दोनों, राखी नहीं मिलती क्या तुम्हारे अमरीका में.....



अजीत
29 अगस्त 16

Tuesday, 23 August 2016

पहला प्यार


आप में से कितने लोगों को अपना पहला प्यार याद है? सच में सोच के बताइयेगा, पहला प्यार हाँ, पहला कामयाब प्यार नहीं।

जहां तक मुझे याद है मेरा वास्तविक वाला बिलकुल जेनुइन, दिल की धड़कन बढ़ा देने वाला पहला प्यार कक्षा चार (हमारे यहां वैसे बोलते समय मुँह से कच्छा ही निकलता है) में हुआ था। ... अरे नहीं, मैडम से नहीं, हिंदी मीडियम विद्यालय वाले हैं भई, पब्लिक स्कूल वाले नहीं जो 'मैम' से प्यार हो जाए, हिंदी वाले विद्यालयों में 'बहिन जी' होती हैं। वैसा फील नहीं आ पाता। तो वो जो थी ना, हमारे ही कक्षा में पढ़ती थी, हम लड़कों वाली रो के साइड वाले फ्रंट बेंचर और वो लड़कियों वाली रो की।

नये नये आये थे हम मथुरा से, उस प्रेम नगरी का ही कुछ प्रभाव रहा होगा शायद। पिता जी जब हेड मासाब के ऑफिस से एक शक्ल से ही लगने वाले घनघोर जालिम माट साब के हवाले किये तो गंगा मैया की कसम पैन्ट गीली होते होते रही थी, जाने कहां फँस गये, पर जब क्लास में प्रवेश किये तो दो में से एक चुटिया के अंतिम छोरों के बालों के बीच से झांकते उन बिलकुल काली आँखों को देखते ही दिल जो धड़का कि लगा, ओ बेट्टा जी, जे का भवा।

पढ़ने लिखने में हम तो बचपन से ही 'तुषार कपूर' थे, स्कूल जाना तो जैसे रोज का 'काला पानी', पर अब उस लड़की को देखने के बाद स्कूल से आते ही अगले दिन स्कूल जाने का इंतज़ार रहता। इक बार अंग्रेजी वाले माट साब सनक गये, एक एक कर सारे बच्चों से एप्पल की स्पेलिंग पूछने लगे, इतना खूंखार चेहरा था उनका बच्चे डर के मारे सब उल्टा पुल्टा बोल दें, और फिर डस्टर से दो डस्टर उलटे हाथ पर। मेरी बारी आई तो डर के मारे कुछ भी मुँह से निकाल दिया, आती नहीं थी स्पेलिंग, जो भी बोलते गलत ही बोलते पर वो कहते हैं ना कि 'जिसके ऊपर हो तुम स्वामी...' तुक्का लग गया। पूरी छियालीस बच्चों की क्लास में एक मैं और दूसरी वो मार खाने से बचे, हम दोनों को ही खड़ा कर हमारी तारीफ़ हुई।

अब तो भई, हम दो ब्रिलिएंट, नोट्स एक्सचेंज होने लगे, एक दूसरे के टिफिन शेयर, पता नहीं ब्रेड के साथ कोई वो लिसलिसा जैम कैसे खा सकता है। ओहो भाई साब, क्या दिन थे, केवल उसको इम्प्रेस करने के लिए तेरह का पहाड़ा पूरा याद कर लिया था।

हमारी ये दोस्ती धुँवाधार चल रही थी और मैं अपने अंदर हिम्मत जगा रहा था कि जैसे भी हो इस दोस्ती को रिश्तेदारी में... नहीं नहीं ये तो बड़े लोग करते हैं... दोस्ती तो 'मोहोब्बत' में बदल दूँ। बड़ी रिसर्च के बाद पक्का किया कि अपने जन्मदिन के दिन क्लास में टॉफी बांटने के बाद उसे इंटरवल में अपने दिल की बात बताई जाये।

बड़े मन से उस दिन उसे चापाकल के पास वाले पेड़ के नीचे ले आये और बोले, ए हमको तुमसे कुछ कहना है, वो क्या है न कि हम... इतना ही अभी बोल पाये थे कि उसे जोर की आक-छिं आ गई, नाक से निकला इतना बड़ा गुब्बारा पहली बार ही देखा था मैंने, हालाँकि थूक से तो हम लड़के गुब्बारे बनाते ही रहते थे, आप भी ट्राई करना, पर नाक से निकला गुब्बारा, फिर वो फट्ट की आवाज से उसका फूट जाना और होंठों से होता हुआ ठुड्डी तक पहुंचना...। एक जोर की उलटी के साथ अंदर भरा सारा प्यार बाहर।

जी यही था मेरा पहला प्यार...
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अजीत
24 अगस्त 16

Monday, 22 August 2016

राम मिलाये जोड़ी


राम मिलाये जोड़ी...
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एक रहें जी पी सिंह। गजबे किरान्तिकारी, ना ना, आप गलत मत बूझिये, सब जेएनयू टाइप ही नहीं होते, ई थोड़े अलग टाइप के थे। क्रांति की शुरुआत अपने नाम से ही किये। दरअसल हुआ ये कि इनके चार अग्रज शैशवावस्था में ही कालकलवित हो गए तो पूर्वांचल बिहार की परम्परानुसार इनका अटपटा नाम रखा गया, घुस्सु परसाद। भले ही शुभ कामना से रखा गया हो, पर बताइये, जे भी कोई नाम हुआ, तो पहली फुर्सत में इन्होंने स्वयं का नामकरण किया ग्रिजेश प्रताप।

इतने किरान्तिकारी थे बचपन से कि जो कहा जाए उसका उल्टा ही करते। सब्जी मंडी जाते तो छाँट के रूढ़ भिन्डी और पिलपिले टमाटर लाते। पढ़ाई से इतना प्यार करते कि किताबों के अंदर पहिले कॉमिक्स फिर बड़े होने पर 'वेद प्रकाश शर्मा' या 'पाठक' डाल कर पढ़ते। माँ बाप की उम्मीदों का सफलतापूर्वक चूरा बनाते हुए कुल मिलाकर डेढ़ पंचवर्षीय योजना में 10वीं और 12वीं निपटाया। डॉक्टर इंजिनियर तो अब किस बूते बनते तो यूपी कॉलेज से बीए शुरू। अब ई उमर में प्रेम ना हो तो जिनगी बेकार है रे साथी। भरकस परयास चालू किये और कहते हैं न कि करत करत अभ्यास से... तो एक सावली सलोनी को अपने इशक में गिरफ्तार करा ही लिए। ओहो, फिर तो जो आनंद मिला जीवन का, बनारस कोई मुम्बई तो है नहीं तो गुपचुप इशारे होते, संकेतों से ही रूठना मनाना। नया नया मोबाइल चला तो अम्बानी को धनबाद देते हुए लंबी लंबी बातों के दौर चलने लगे। बड़ी हिम्मत से एक बार मिलने का प्रोग्राम बनाया भारत माता मंदिर में। विद्यापीठ के पास इस मंदिर और साथ लगे पार्क में ज्यादा भीड़ नहीं होती, वो क्या हैं ना कि ई SM में ही सारी भक्ति उड़ेल देने के बाद कुछ बचता जो नहीं है। आहा, इतने एकांत की पहली मुलाकात, तनी मनी प्रैक्टिकल करने का मौका, गंगा सिनेमा की मूवी याद आने लगी। वापस आते समय चेहरा अइसे जइसे... अब खुदे बूझ जाइये। फिर तो बनारस का कोई पार्क नहीं बचा जहां ये दो फूल आपस में लड़ ना जाते हों।
अब तो भाई किरान्तिकारी दिल ने प्रेम विवाह की ठान ली, मुहूर्त वगैरह निकाल लिए भगने का, और पीछे एक चिट्ठी छोड़ पहुंच गए कैंट स्टेशन। बेचारे फोन पर फोन किये जा रहे अपनी माशूका को और उधर से कोई जवाब नहीं। लौट के बुद्धू घर को आये। पर तब तक बाबूजी पढ़ चुके थे क्रांति का घोषणापत्र, फिर तो गालों पर आधा दिन और पीठ पर एक महीना क्रांति के लाल काले नीले निशान पड़े रहे। रे साथी, प्रेम बड़ा दर्द देता है रे।
सामन्तशाही ने कभी भी क्रांति को स्वीकार नहीं किया, संधि और शांति के सारे परयासों को कुचलते हुए सामन्त बाप ने बियाह तय कर दिया लड़के का, और जुलम ये कि लड़की की तस्वीर तक ना दिखाई। दिन नजदीक आते जाते, हल्दी के पीले रंग से खून और खौलता, पर उस लउर व उससे पड़े लाल काले नीले निशान याद आते ही खौलता खून झाग की तरह बैठ जाता। आखिर शादी हो ही गई, अब जब हो ही गई तो का कर सकत हैं। अपरम्परागत शराब पीकर और परंपरागत पान चुभलाते पहुँचे अपने कमरे में, देखा, दुल्हिन बैठी है अवगुंठन डाले। गला खखार के नजदीक बैठे, पान का आधा रस उदरस्थ और आधा बचाये रख ऊपर मुँह कर भरकस रोबीली आवाज में बोले,
सुनिए, देखिये हम लोग नई जिनगी शुरू करे जा रहे है तो अदरवाइज मत लीजियेगा, वो क्या है कि आई मीन टु से, हम लोगों को न एकदूसरे को अपनी पुरानी जिनगी के बारे में ना सबकुछ सच सच बात देना चाहिए, दैट्स भाई कि आगे कोनो कनफूजन ना रहे। एक्चुली हम ओपन माइंड हैं, तो बताइए अपने बारे में। (कॉकटेल पी लिए थे तो भाषा भी कॉकटेल ही न निकलेगी)

ल, चुप काहे हैं, अच्छा शर्मा रही हैं, तो चलिए हम ही पाहिले बताते हैं। देखिये हम बहुते शरीफ टाइप के आदमी हैं। लब वभ से कउनो प्रोबलम नहीं है पर हम कबो ना किये। बाबूजी जहां कहे हम चुप मार के मान लिए। अब कोई बुरा थोड़ी ना चाहेंगे हमरे बदे। अच्छा चलिये अब आप बताइए। अब बोलिए भी, गूंगी तो नहीं हैं न आप।
लड़की भी बेचारी कई रातों की जगी, थकी आवाज में, जी हम भी ई लब सभ नहीं मानते, छी छी, का जरूरत है ई सब का, हम भी कबो ना परे इसके फेरा में।
मन में लड्डू फोड़ते, बचा हुआ पान रस पीने के बाद, सौन्दर्यपान की अभिलाषा लिए धीरे धीरे घूंघट उठाया, अहा क्या चेहरा, ठुड्डी के नीचे उंगली लगा चेहरा उठाया और...
तुम....
लड़की भी
तुम...
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जा ए ग्रिजेश प्रताप, तू घुस्सु प्रसाद ही निकले...
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अजीत
22 अगस्त 16

Sunday, 14 August 2016

जो शहीद हुए हैं उनकी...


रमेसरा बहुते साधारण टाइप का लड़का था। साधारण जिले के साधारण गांव के साधारण किसान परिवार में जन्मा। थोड़ी सी खेती थी जो हर दूसरे साल मौसम की भेंट चढ़ जाती। इस पूत के पांव दिखने लगे थे बचपन से ही। गजब का चटोर और चोट्टा, राब गुड़ अचार इससे बचा के रखना पड़ता। कुछ नहीं पाता तो डलिया भर बाजरा या गेंहू ले पहुँच जाता बनिए के यहां, गावों में आज भी विनिमय का ये तरीका अपनाया जाता है। आलसी बड़ा वाला, एक काम टाइम पर नहीं करता, और मजबूरी में करना ही पड़े तो इतने बुरे तरीके से करता कि अगला उसे फिर कभी कोई काम बोल ही ना सके। स्कूल जाना बहुत पसंद करता, पर खाली जाना हाँ, पढ़ना नहीं, क्योंकि रास्ते में सड़क किनारे ढेरों आम बढ़हल कटहल जामुन बेर के पेड़ मिलते। उस टाइम गुरूजी लोग भी इतना पीटते कि कौन पिटने जाए, इससे तो अच्छा की बगीचे में कंचे खेल लो।
कोढ़ में खाज ये कि टीवी पुरे गाँव में सिर्फ इसके यहाँ, लाइट हो ना हो टीवी जरूर चलती, जुगाड़ में हमारे लोगों का ऐसे ही इतना नाम नहीं है, कार या ट्रक की बैटरी से आराम से चल जाते। लोग टीवी के साथ बैटरी भी याद से खरीद लेते, चार्जिंग फी यही कोई दो तीन रुपये। तो प्रोग्राम आता दिन में जो बंक मारने का बहुत बड़ा कारण था, शक्तिमान और युग बदला बदला हिन्दोस्तान।
जैसे तैसे 10वीं पास कर ली, इससे ज्यादा पढ़ने की हिम्मत ना थी छोरे में, सिर्फ आगे और ना पढ़ना पड़े, बन्दे ने सुबह सुबह भर्ती की तैयारी करते लड़कों की देखा देखी दौड़ लगानी शुरू कर दी। बैल बुद्धि तो था ही, ऊपर से लड़के ललकार भी देते, शुरू शुरू में तो सिर्फ पढ़ना ना पड़े इसके लालच में ये सब शुरू किया फिर उसका मन लग गया इसमें। दौड़ते हुए अपने शरीर से बहता पसीना और कसरत के बाद फूलते पिचकते मसल अच्छे लगने लगे। सुबह दौड़ते हुए गंगा तक जाना, फिर लंबी कूद की प्रैक्टिस, फिर वहीं नहा वहा के, साथ लाये भीगे चने चबाना, दोपहर बीतते ही सड़कों पर दौड़ लगाना फिर वापस आकर दंड बैठक डिप्स जैसे पचासों कसरतें करना उसका शौक हो गया।
पहली भर्ती बनारस देने गया, लंबाई थोड़ी कम रह गई, गुस्से में भुनभुनाता वापस आया और रोज घंटों पुल अप करने लगा, अगली भर्ती में फिजिकल स्टैण्डर्ड टेस्ट पास कर गया पर फिजिकल एफिशिएंसी टेस्ट में भरी दोपहरिया में थकान और डिहाइड्रेशन की वजह से दौड़ में रह गया। अब उसने गर्मियों की दोपहर में भी दौड़ना शुरू किया।
इलाहाबाद वाली भर्ती में उसकी मेहनत रंग लाई, रिटेन और मेडिकल भी निकल गए। सेलेक्ट हो गया सीआरपीएफ में। ट्रेनिंग के बाद पहली पोस्टिंग काश्मीर मिली। कंपनी में अलग अलग राज्यों के बन्दे, सहज होने में थोड़ा समय लगा फिर सब ठीक हो गया। एक बार यूनिफॉर्म के कंधे की स्ट्रिप नहीं लगी थी तो साथियों ने मजाक बनाया कि क्यों बे तेरे दिन चल रहे हैं क्या। महिला सिपाही 'उन दिनों' में अपने कंधे की स्ट्रिप के बटन नहीं लगाती, ताकि कमांडर समझ जाए और ज्यादा भारी ड्यूटी ना लगाये। वैसे इन लड़कियों को देखकर बड़ा ताज्जुब होता, फिजिकल में भले ही मापदंड कम हों पर यहां मेहनत तो वो भी बराबर ही करती थी।
पहली बार जब दो महीने की छुट्टी में घर जाने का मौका मिला तो किसी आर्मी वाले की हेल्प से आर्मी कैंटीन से ढेर सारे डव लाइफबॉय आंवला तेल और ना जाने क्या क्या ले गया। दूसरे दिन ही पिता ने बरक्षा तय कर दिया था, लड़का नौकरी में है तो दाम भी अच्छे लगे थे। अगले साल शादी भी हो गई और कुछ ही दिनों में साहबेऔलाद भी हो गया।
काश्मीर यूनिवर्सिटी के गेट पर ड्यूटी थी तो वहाँ के लड़के लड़कियां मुस्कुराते हिकारत की नजर से देख आगे बढ़ जाते। एक बार एक लड़की ने तंज कसा, तुम लोगों की जरूरत नहीं यहां, गो बैक। इसने जवाब दिया, मैडम तुम पढ़ा लिखा है, मुझसे क्यों बोलता है, तुम वोट डालता है ना, अपने नेता से बोलो, मैं तो अपना ड्यूटी देता है।
खबर मिली कि कुछ आतंकी एक घर में छुपे बैठे हैं। मोर्चा लेने इसकी कंपनी गई। घंटो फायरिंग के बाद जब उधर से आवाजे आनी बन्द हुई तो कमांडर ने इसे आगे बढ़ कर खिड़की में से घर के अंदर बम फेंकने को कहा, कोहनी और घुटनों के बल बहुत तेज चलता था ये, छिपकली की तरह सरपट भाग बम फेंक आया, फिर हुक्म मिला, फिर गया, ऐसे ही सात बम फेंक आया। आंठवी बार भी यही हुक्म मिला तो बैल बुद्धि, सीना तान आगे बढ़ा, जब सात बार में कुछ नहीं हुआ, जो अंदर होगा वो तो मर ही गया होगा न, खिड़की पर पहुंच बम फेंकने की जगह अंदर झाँकने लगा, अंदर देखा कि जमीन से लगी लकड़ी के फट्टे से एक नाल झांक रही है और फिर रेट रेट...
साधारण किसान का बेटा बाकियों के लिए साधारण मौत मर गया। रमेश चंद्र का शरीर घर पहुंचा दिया गया, शहीद के तमगे के बिना, इस फोर्स के लोगों को सिर्फ अखबार के एक छोटे से टुकड़े में ही शहीद कहा जाता है।
अजीत
15 अगस्त 16

वंदे मातरम

पुस्तक कला नाम का एक विषय हुआ करता था, छोटी मोटी घरेलू चीजें, सजावटी सामान बनाना सिखाते थे उसमें। चिरौरी करके बीस पच्चीस रूपये निकलवा लेते मम्मी से, सुतली रस्सी और रंगीन अबरी पेपर खरीद लाते। गोंद घर में ही बना लेते आंटे का, बदबू बहुत आती थी उससे। जैसे तैसे काट कूट के बनाते ढेरों रंगीन झंडियां, पूरी छत पर कतरने उड़ा करती।
वैसे बाकी तैयारियां एक महीने पहले से ही शुरू हो जाती थी, छोटा सा स्कूल था हमारा, जैसे जैसे दिन नजदीक आते, क्लासेज कम लगती, तैयारी का समय बढ़ता जाता। कोई "सारे जहां से अच्छा..., हम होंगे कामयाब..., ऐ मेरे वतन के लोगों..." जैसे गाने गाता तो कोई लंबी लंबी स्पीचें रटता, कुछ लड़कियां डांस करती। डांस वांस तो हमें आता नहीं था, पर उस समय गला सुरीला था, तो एक गाने के ग्रुप में शामिल कर लिया गया। साथ में सुर में सुर मिला लेते, पर गाना याद नहीं हुआ, प्रिंसिपल मैडम ने पकड़ लिया कि ये तो कमजोर कड़ी है, ग्रुप से हो गए बाहर। फिर ये सोचकर कि बालक मन पर कोई बुरा प्रभाव ना पड़े तो चुटकुला सुनाने का काम दिया हमें।
गजब उन्माद सा था 14 की रात, नींद ही नहीं आ रही थी कि कब सुबह हो और कब भागें स्कूल। रात में 6-7 बार तो नींद टूटी होगी, बार बार अँधेरा देख गुस्सा आता। जैसे ही पहली किरण का आभास हुआ, फटाफट नहा वहा के तैयार, आधा अधूरा नाश्ता किया और पहुंच गए स्कूल। झंडे के अंदर डालने के लिए कितने ही घरों से मांग कर, या चोरी कर ढेर सारे फूल इकट्ठा किया गया। फिर हम दो लड़के छत पर चढ़े झंडा फिट करने, पहली दो बार तो हरा ऊपर और केसरिया नीचे हो गया था। सारे ही बच्चे छोटे मोटे काम कर रहे थे। फिर प्रभात फेरी निकालने की जल्दी मची। सबसे आगे तिरंगा लिए एक बालक, पीछे स्कूल का नाम लिखा बैनर लिए एक लड़का एक लड़की, और उनके पीछे पूरा स्कूल छोटे छोटे तिरंगों के साथ, मा साब और बहन जी लोग दाएं बाएं। बुलंद आवाज वाले लड़के नारा लगाते, पीछे वाले जय जिंदाबाद अमर रहे बोलते। ये वाला सबसे अच्छा लगता, अन्न जहां का .... वो है प्यारा....। लोग बाहर निकल निकल कर देखते। गार्जियन लोग दिख जाते जग में पानी लिए अपने अपने घर के बाहर। ऐसे ही गाते चीखते चिल्लाते यही कोई पांच सात किलोमीटर का चक्कर लगा वापस स्कूल पहुंचे, थक तो गये थे पर उत्साह कम नहीं हुआ था। लाइन लगा खड़े थे और प्रिंसिपल मैम ने रस्सी खींच दी। वो लहराता तिरंगा और उससे निकल कर हवा में तैरती हुई नीचे की ओर आती फूलों की पंखुड़ियां, आज भी याद आ जाती हैं।
जन गण मन के बाद तीन चार बोरिंग भाषण सुनने पड़े बड़े लोगों के, फिर हम बच्चों की बारी आई। नाच गाना, फिर मेरे नंबर से पहले प्रतिभा दीदी ने गाना गाया था, ऐ मेरे वतन के लोगों... गाते गाते खुद रो पड़ी, साथ मुझे भी रुला दिया (ये ताना कई बार सुन चुका हूं, 'मर्द होके रोते हो', उस समय तो निपट बालक ही था)। अब चढ़ तो गया स्टेज पर, पर चुटकुला याद आये तब ना, मन तो 'जो शहीद हुए हैं.....' पर अटका था। पीछे से किसी ने शुरू के कुछ शब्द बोले तो जैसे तैसे चुटकुला सूना दिया, कोई नहीं हँसा। फिर अंत में दोना भर बुनिया मिला था।
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अब लगता है कि शायद बच्चे ही बचे हैं जो मन से मनाते हैं 15 अगस्त। अहसास भी है किसी को कि कैसे और कितने संघर्ष से मिली हैं ये, क्या कोई वैल्यू बची है हमारी नजरों में इसकी, क्यों होगी, फ्री में जो मिल गई। अपने घर के सदस्य का बड्डे कितने जोशोखरोश से मनाते हैं पर देश के लिए इतनी लापरवाही। 4 जुलाई का अमेरिका या 14 जुलाई का फ्रांस देखिये और सोचिये कि आप कितने नाशुक्रे हैं।
हर बात में दूसरों को, सरकार को गरिया दो पर खुद को मत देखना कभी। सबसे आसान काम जो है।
देशभक्ति सिर्फ फौजियों के लिए रिजर्व नहीं है और ना ही शहीद होना जरूरी है। जो करते हो बस वही करो, पर ईमानदारी से, इतना काफी है, इससे ज्यादा की जरूरत नहीं।
वंदे मातरम

अजीत
13 अगस्त 16

पडोस

अपने मोहल्ले में, मतलब गली में, शुरू शुरू में 4 घर थे। हमारा, सामने ठाकुर साब, दाएं बगल त्रिवेदी जी और उनके सामने पांडे जी। दस बारह साल हमारे किरायेदार रहे डॉक्टर साब भी हमारे बाएं बस गए। पांडे जी से आप लोग पहले भी मिल चुके हैं। तो ये हमारा छोटा सा मोहल्ला था, सारे के सारे ही उच्च शिक्षित, घरों के मुखिया ऊँचे सरकारी पदों पर। आपस में सौहार्द उतना ही था जितना ग्रामीण परिवेश से निकले मध्यमवर्गीय परिवारों में होता है। सबकी अलग विचारधारा, इसलिए खुद को छोड़ अन्य सभी अजीब टाइप के लोग थे। सुख दुख में इतना साथ जरूर देते कि सलाह देने और फिर मीनमेख निकालने पहुंच जाते, ई कर लेना त उ हो जाएगा, अइसे नहीं भाई वइसे न करना था, हम त पहिलही कहे रहे, बात नहीं मानियेगा त यही न होगा, आदि इत्यादि।
जैसा कि सामान्यतः हर मोहल्ले में होता है, एक दूसरे से ऊंचा दिखने की कामना सबमें ही थी, अब दिखे कैसे, तो इसके निमित्त बनते घर के सामान, सुविधाएं। पांडे जी को सबसे पहले फोन लगाने का अभिमान था, फोन की वजह से रूतबे में अप्रत्याशित उछाल आ गया मानों, जिसे देखो उसी की इनकमिंग आ जाती, झल्ला जाते, रौब दिखाते। कुछ ही दिनों में हमारे यहां भी फोन लग गया और वो पटा गये। किसी के यहां फ्रीज पहले आया तो किसी के यहां मिक्सर ग्राइंडर, जिसके यहां पहले सामान आ जाता वो खुद की नजर में ही ऊपर उठ जाता।
त्रिवेदी जी से उनकी बझी रहती हमेशा, त्रिवेदी जी श्वेत वेश श्वेत केश और श्वेत दाढ़ी वाले बाबा टाइप पुरुष थे, संस्कृत हिंदी इंग्लिश के प्रकांड विद्वान, ग्रह नक्षत्र नाड़ी विज्ञान पर भी पकड़ थी। जब मैंने होश संभाला तभी से रिटायर थे नौकरी से, आज भी जीवित और पूरी तरह स्वस्थ। वन्स अपान अ टाइम, पांडे जी को कोई काम करवाते समय कुछ हजार पांच सौ ईंटों की कमी पड़ गई तो त्रिवेदी जी की काई जमी ईंटें मांग ली। जब वापस देने का समय आया तो बोले कि तुम्हारी ईंटें गन्दी थी। त्रिवेदी कहां कम, बोले लाओ तुम ईंटें तो दो, मैं मजदूर लगवाकर उन्हें गन्दा करवा लूंगा। अजीबोगरीब बात पर लड़ जाते और बारी बारी से मेरे पापा से दूसरे की शिकायत कर जाते।
डाकदर बाबू रेडियो के रसिया, ड्यूटी से वापस आकर सीलोन से लेकर नेपाल तक के स्टेशन पकड़ लेते। लाइट बहुत जाती थी, रात 11-12 बजे तक हमारे बरामदे में डटे रहते। सोचता था कि कोई इंसान का बच्चा कैसे इतनी देर तक कुर्सी पर उकड़ू बैठ सकता है। क्रिकेट के दीवाने, भारत पाक का मैच था, अंतिम ओवर और ये जनाब रेडियो छोड़ बाहर जमीन पर उकड़ू बैठ गए। थोड़ी देर बाद हम लोग मातमी मुँह बनाये बाहर निकले तो फट पड़े, जानत रहें हम, ई साला रोबिनवा कउनो काम का नहीं है, गदहा मतिन मोटा के ससुर क्रिकेट खेलिहें, हम कितना जब्त करते, हँस पड़े, बताया कि छक्का पड़ा और हम जीत गए। जब पूरी तरह विश्वास हो गया तो बोले, देखा, हम कहे रहे ना, ई रोबिनवा में कोई बात है, गजब जुझारू लड़का है।
पर मोहल्ले का नगीना थे ठाकुर साब, पापा और ये चंदौली में एक ही कॉलेज से डिप्लोमा किये, ये पहले सीनियर थे फिर साथी बन गए, फिर जमीन भी आमने सामने खरीदी, मकान बनाया लगभग एक ही डिजाइन का। महिलाओं में भी इतनी मित्रता हो गई थी कि घंटिया लगी थी दोनों घरों में, इधर बजाओ तो उनके घर में, उधर बजाओ तो हमारे घर में चिड़िया चहचहाती। थे तो थोड़े नाटे से, पर इसकी भरपाई अपनी आवाज से कर लेते। फोन पर बतियाते तो मोहल्ला जान जाता कि क्या मसला है। शुद्ध परिष्कृत और विशिष्ट गालियों के जनक थे, इनसे सीखा जा सकता था कि सामान्य बोलचाल से किसी के कानों से कैसे खून निकाल लो आप। रिटायर हो गए तो हमारे 16 घंटे मनोरंजन का जुगाड़ हो गया। सुबह दतुवन करते तो जो विचित्र आवाजें निकलती कि कोई माई का लाल उस समय नाश्ता नहीं कर सकता था। फिर निकलते बाहर एक डंडा लेकर अपनी नाली साफ़ करने, रोज का नियम था। एक बार डाक साब का छः वर्षीय सुपुत्र इनके सामने कमर पर हाथ रख खड़ा हो गया, बोला, का चचा, तोके कउनो अउर काम धाम ना हव का जवन कि रोजे नलिये साफ़ करेला। उस समय मैं और मेरे बड़े भाई छत पर चाय पी रहे थे और पापा सेविंग, इतनी कस के हँसी आई कि पापा ने अपना गाल काट लिया और हम दोनों भाइयों ने चाय का फुहारा मार अपने कपड़े गन्दे कर लिए। पड़ोसी मोहल्ले में कुछ सूवरें थी जो आ जाती हमारी नालियों में अपना नाश्ता खोजने, कितना भगाओ पर ये ढींठ, हिलती तक नहीं। एक बार इन्हें आया गुस्सा, हाथ फैला खड़े हो गए, बोले, भाग जो इहाँ से तोरी मतारी क..... और गहन आश्चर्य कि वो अपनी मतारी की इज्जत बचाते हुए पलट के भग ली। पहली बरसात के बाद निकलने वाले पीले मेंढकों के टर्राने से इतना व्यथित हो गए कि टॉर्च लेकर निकल पड़े, और एक एक मेंढक को इतना हड़काया कि पूरे पांच मिनट शांति रही।
इन सबमे पापा सबसे कम उम्र थे, फिर भी ये चारों महाशय हमारे यहाँ ही जुटते, ज्ञान विज्ञान धर्म राजनीति पर चर्चाएं होती। आपस में झगड़ा वगड़ा हो तो शिकायत भी पापा से की जाती। पांडे जी तो पहले ही निकल लिए, फिर पापा भी, उनके जाने के बाद कोई बैठकी कभी हो ना पाई। आज भी ठाकुर साब सारे ही काम करते हैं पर आवाज में वो बुलंदी नहीं दिखती, त्रिवेदी जी भी चुपचाप अपने घर में पूजा पाठ में लगे रहते है और डाक साब तो अब दिखते ही नहीं।

अजीत
9 अगस्त 16

मित्र

ट्रेन से पीलीभीत पहुँचने के बाद 1 खटारा सी रोडवेज बस में पहली बार पहाड़ की यात्रा शुरू हुई थी। 3-4 घंटे की खड़खड़ तड़तड़ से त्रस्त होने के बाद जब टनकपुर से आगे बढ़े तब पहली बार सुकून सा मिला, बस वही थी पर बाहर के नजारे बदल गए थे, अचानक ही ठण्ड बढ़ सी गई, इतनी हरियाली, पेड़ों की पत्तियां पतली होती जा रही थी, फिर वो बड़े दिन वाले पेड़ों की तरह के पेड़ दिखे, चीड़, और उनसे बहकर आती हुई अलग सी खुश्बू, एक डेढ़ घण्टे बाद बादलों से हमारी दूरी कम इतनी कम हो गई कि वो हमारे साथ ही चलने से लगे, कभी तो लगता कि वो बस के अंदर ही घुस गए हों, ये ऊँचे पहाड़, और वो गहरी खाइयां, कहीं कहीं पतली पतली पानी की धाराएं सड़क पर आती और फिर खाई में गिरती दिख जाती।रोमांच चरम पर था, मन करता कि निकल जाऊ बस से, चढ़ जाऊं पहाड़ों पर। 

तबादला हुआ था पापा का, लोहाघाट, उस समय का यूपी, आज का उत्तराखंड। शायद पहली बार थैंकफुल था पापा के लिए कि मुझे वो इतनी खूबसूरत जगह ले आये थे। लोहाघाट जैसे कटोरी में बसा कस्बा टाइप शहर, आठों तरफ विशाल पहाड़, एक मकान की छत दूसरे की दहलीज, सांप जैसी सड़कें, बड़ी बड़ी सीढ़ियों वाले रास्ते और उनकी दोनों तरफ दुकानें।

राजकीय विद्यालय में एडमिशन लिया नवीं क्लास में, ख़ुशी ख़ुशी गया कि नया दिन, नये दोस्त बनेंगे, पर अनुभव खराब रहा। कोई खुद आगे नहीं आया दोस्ती करने, 100 से ज्यादा बच्चों में दुर्भाग्यवश अकेला देशी था मैं, देशी मतलब जो पहाड़ी नहीं। कुछ ही दिन में प्रसिद्ध हो गया था, नाम तो शायद ही किसी को याद हो पर नए नामकरण हो गए, देशी, बनारसी, बिहारी। कोई दोस्त नहीं, चिढ़ाने वाले सारे, कोई कोई तो पीछे से चपत भी लगा देता, 3-4 बार धुलाई भी कर दी गई तबियत से। इंटरवल में चुपचाप जंगले पर बैठा रहता, सोचता की सामने से मेरे 8वीं के दोस्त चन्द्रिका प्रेम आ रहे हैं और मैंने उन्हें दौड़ के गले लगा लिया है। खूब रोता अकेले में, नफरत सी हो गई पहाड़ियों से, कत्ल कर देने का मन करता। बच्चे तो बच्चे, अध्यापक लोग भी कम नहीं थे, देशी अध्यापक तो पढ़ाते और निकल लेते पर कुछ पहाड़ी अध्यापक मजे लेते, हिंदी के गुरूजी बहुत चिढ़ते थेे देसियों से, पढ़ाते प्रेमचन्द और कबीर को, मजाक बनारस का उड़ाते। बैंक में गया किसी काम से तो क्लर्क ने पूछा कि बनारस बिहार में है ना। कुल मिला के गजब नफरत करते लोग देसियों से। 

अब सोचता हूँ तो समझ आता है कि कारण भी था इसका, अलग राज्य का आंदोलन जोरों पर था, सरकार सारी खटारा बसें पहाड़ों पर भेज देती, करप्ट अफसरों को दंड के तौर पर पहाड़ पर भेज दिया जाता, सबसे बेकार पुलिस अध्यापक डॉक्टर इंजीनियर अफसर मिलते पहाड़ को, लोग नफरत करते और वो उनके बच्चों में भी आ जाती।

इतना डिप्रेस हो गया कि 9वीं में फेल हो गया। 14 बच्चे फेल थे, अब मेरी नई पहचान देशी नहीं रह गई, फेलियर हो गई, उन्ही फेलियरों में 1 था प्रकाश जोशी। मेरा पहला पहाड़ी दोस्त, सुन्दर सा, गोरा, हल्के सफेदी लिए बाल। गरीब, ठेठ पहाड़ी, स को श बोलने वाला। पहली बार क्लास बंक उसके ही साथ की थी, हम दोनों ने एक साथ सिगरेट पीना शुरू किया, फेलियर थे तो दबदबा सा हो गया, डर खत्म हो गया था। रोज ही क्लास बंक कर चढ़ जाते पहाड़ों पर, जंगली मुर्गियां खोजते, बुरांश के फूल, काफल और ककड़ी तोड़ते, खाते, भवल्टा नाम की एक जगह थी एक पहाड़ी पर, अंग्रेजो की पुरानी बस्ती, थोड़ी दूर पर उनका कब्रिस्तान, अधिकतर भगोड़े लड़के वहीं आकर ताश खेलते। हम दोनों को ये लत नहीं थी, दिन भर बात करने में निकाल देते। एक दिन तो पता नहीं क्या फितूर चढ़ा कि एक कब्र खोद दी, अक्ल नहीं थी, आज अफ़सोस है। पहाड़ी लोग नाम छोटा कर देते हैं, मैं अजीत से अज्जू या अज्या बन गया था और प्रकाश पर्क्या या पारो।

पांच साल रहा पहाड़ पर, मोहब्बत सी हो गई इनसे, बहुत अच्छे दोस्त बने यहां, एक से बढ़ कर एक, दो बड़ी प्यारी लड़कियों ने भाई माना मुझे, फिर कुछ सालों बाद एक पहाड़ी लड़की से ही प्यार भी हुआ, शादी हुई। आज भी पहाड़ के नजदीक ही रहता हूँ, घर की छत से नैनीताल दिखता है जगमगाता हुआ।

अगर प्रकाश नहीं होता तो शायद आज भी नफरत करता पहाड़ियों से, प्रकाश ना होता तो अन्धेरा ही रहता सालों तक मेरे जीवन में। आखिरी दिन एक दूसरे से अलग होते समय खूब रोये थे हम गले मिलकर, बाजार के लोग रुक रुक कर देखते पर हम रोये जा रहे थे, अपना बनारस का एड्रेस दिया था उसे, पता नहीं एड्रेस गलत था या जाने क्या, आज तक कोई चिट्ठी नहीं आई उसकी।

सुबह से फेसबुक पर फ्रेंडशिप डे चल रहा था तो उसकी याद आ गई।



अजीत
7 अगस्त 16