Wednesday, 18 April 2018

जय कथा-1


जय कथा-1 (पूर्व गाथा)
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माता पृथ्वी अत्यंत कष्ट में थी। उनके संसार में उपद्रवी अधर्मियों की जैसे बाढ़ आ गई थी। कुछ ही धर्मनिष्ठ प्राणी शेष बचे थे, जो दिनोंदिन कम होते जा रहे थे। व्याकुल पृथ्वी अपनी संततियों को यूं नष्ट होते नहीं देख सकती थी। वो प्रार्थना लेकर जगतपिता ब्रह्मा के पास गई और निवेदन किया, "हे परमपिता! आपकी बनाई सृष्टि में मैं एक बहुत छोटी सी इकाई हूँ। परन्तु आपने मुझे अनगिनत जीवों की माता बनाया है। मेरे पुत्रों में से सर्वाधिक बुद्धिमान, मनुष्य आज अपने कर्मों से अपनी स्वयं की जाति एवं मेरे अन्य पुत्रों यथा चौपायों, जलचरों और वनस्पतियों का शत्रु बना बैठा है। वह स्वार्थ में इतना अंधा हो चुका है कि अपने ही घर को तहस-नहस करने में लगा हुआ है। मेरे पुत्रों की रक्षा कीजिये देव, अपनी पुत्री की रक्षा कीजिये परमपिता।"

पृथ्वी की ऐसी बातें सुन ब्रह्मा बोले, "प्रत्येक चर-अचर, सजीव-निर्जीव, काल और युग का एक निश्चित समय होता है पुत्री। तुम्हारी इन पीड़ाओं को समाप्त करने का समय निकट है। धर्मात्माओं को एक तरफ इकठ्ठा करने के लिए स्वयं नारायण पृथ्वी पर अवतरित होंगे। उनका साथ देने के लिए अन्य अनेक देवी और देवता विभिन्न अवतार लेंगे। विपक्ष को भी एक तरफ इक्कठा करने के लिए अनेक दानव मनुष्य योनि में जन्म लेंगे।

विप्रचित्ति जरासंध और हिरण्यकशिपु शिशुपाल बनेगा। संह्लाद शल्य, कालनेमि कंस और महादेव, यम, काल और क्रोध के सम्मिलित अंश से अश्वथामा जन्म लेगा। हंस नामक गन्धर्व धृतराष्ट्र और साक्षात धर्म विदुर बनेंगे। कलियुग से दुर्योधन और पुलस्त्य वंशी राक्षसों से उसके 100 भाई जन्म लेंगे। धर्म, वायु, इंद्र और अश्वनी कुमारों से युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन और नकुल, सहदेव का जन्म होगा। चंद्रमा का पुत्र वर्चा अभिमन्यु बनेगा।

जाओ पुत्री, प्रसन्न रहो। संसार को चलाने का भार भगवान विष्णु पर है। वे शेषनाग के साथ उचित समय पर अवतरित होंगे और तुम्हें निर्भय करेंगे।"
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शिवलोक में द्यो नामक वसु के नेतृत्व में आठ वसु श्रीगंगा की प्रतीक्षा कर रहे थे। माता गंगा के आने पर उन्होंने चरण स्पर्श कर अपनी व्यथा सुनाई। उन्होंने कहा, "माता हम वशिष्ठ ऋषि द्वारा श्रापित आपकी शरण में आये हैं। हमारा उद्धार करें माता।"

श्री गंगा बोली, "ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ ने तुम्हें श्राप दिया है! परंतु क्यों?"

"माता, हम आठों वसु अपनी पत्नियों के साथ विहार करने पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे। मार्ग में शांत और मनभावन स्थल देख रुक गए। वह ऋषि वशिष्ठ का आश्रम था माता। ऋषि अनुपस्थित थे, परन्तु वहाँ माता कामधेनु के गर्भ से उत्पन्न सर्वश्रेष्ठ गौ नन्दिनी थी। मेरी एक पत्नी ने उन्हें हर लेने का आग्रह किया। पत्नी प्रेम में मैंने यह कुकर्म किया और मेरे इन सात मित्रों ने मेरा साथ दिया।

आश्रम लौटने पर जब ऋषि ने अपनी प्यारी गाय को अनुपस्थित पाया और यह जाना कि उनको हरने वाले हम लोग हैं तो हमें मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दिया। गौ लौटाने और क्षमा मांगने पर उन्होंने कहा 'दिया हुआ वचन वापस नहीं ले सकता परन्तु इतना अवश्य हो सकता है कि तुम्हारे अलावा बाकी सात वसु मात्र एक वर्ष के लिए ही मनुष्य योनि भोगेंगे। तुम्हारा अपराध बड़ा है इसलिए तुम्हें वर्षों तक मनुष्य बने रहना होगा। अपने इन सम्बन्धियों के बल पर तुमने मेरे अधिकार के हनन का प्रयास किया, इसलिए तुम्हें सत्ता के शीर्ष पर होने के बाद भी कभी कोई अधिकार प्राप्त नहीं होगा, तुम्हें अपने प्रिय सम्बन्धियों का कभी साथ नहीं मिलेगा। तुमने स्त्री और उसकी वासना के वश में आकर अपहरण का प्रयास किया, तो जाओ तुम नारी अपहरण के दोषी बनोगे पर तुम्हें कभी भी स्त्री सुख नहीं मिलेगा। तुमने अपनी मनमानी की है तो जाओ, मृत्युलोक में कभी भी कोई भी बात तुम्हारे मन की नहीं होगी।'

हे माता! हमें ज्ञात हुआ है कि इक्ष्वाकुवंश के स्वर्गवासी राजा महाभिष के पुनर्जन्म पर आप उनकी पत्नी बनने के लिए मानव अवतार लेने वाली हैं। आप पापनाशिनी हैं, हमारे पापों का नाश कीजिये माता। अन्यथा अन्य कौन सी साधारण मानवी स्त्री अपने सात-सात बच्चों को जन्मते ही मुक्त कर सकेगी।"

"यदि विधाता यही चाहते हैं तो ऐसा ही हो पुत्रो। तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।"
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मांडव ऋषि हठ योग तपस्या में लीन थे। उन्होंने मौन व्रत लिया था। वन में बनी अपनी कुटिया के द्वार पर तपस्या में लीन थे कि कुछ चोर राजकीय सैनिकों से बचते हुए उनके आश्रम से होकर गुजरे। सैनिक नजदीक आ गए थे इसलिए उन्होंने चोरी का सारा सामान आश्रम में ही कहीं छुपा दिया और भाग गए। जब सैनिक आश्रम पहुँचे तो उन्होंने तपस्यारत ऋषि से चोरों की दिशा जानने हेतु प्रश्न किया। मौन व्रत धारी ऋषि चुप रहे। सैनिकों को शंका हुई तो उन्होंने आश्रम की तलाशी ली। उन्हें छुपाया हुआ धन मिल गया तो उन्होंने ऋषि को भी चोर और पाखण्डी समझ कैद कर लिया। कुछ समय पश्चात सभी चोर भी पकड़ में आ गए। सैनिकों ने सभी को न्याय हेतु राजा के समक्ष उपस्थित किया। राजा ने उन सभी को शूली पर चढ़ाने का दण्ड दे दिया।

शूली पर चढ़ाने से अन्य सभी की तत्काल मृत्यु हो गई परन्तु योगाचार्य ऋषि मांडव शूली पर अविचलित बैठे रहे। कई दिनों पश्चात राजा को यह जानकर कि ये तो कोई महान ऋषि हैं, अपनी भूल का ज्ञान हुआ और उन्होंने ऋषि को शूली से नीचे उतार कर अपने अन्याय के लिए दण्ड की मांग की। ऋषि ने उन्हें सद्बुद्धि और न्यायबुद्धि पाने की कामना की और कहा कि परम न्यायकर्ता तो धर्मराज हैं, वही तुम्हारे लिए दण्ड बताएंगे और मुझे मिले दण्ड का कारण भी उन्हें बताना होगा।

अपनी मृत्यु पश्चात धर्मराज के समक्ष उन्होंने प्रश्न किया, "हे धर्मराज! मैंने कभी भी किसी भी जीव को कष्ट नहीं पहुंचाया। अपने ज्ञान से मनुष्यों को लाभान्वित किया, अपनी शरण में आये प्रत्येक प्राणी की रक्षा की। कभी असत्य नहीं बोला, कभी अन्न अथवा धन का परिग्रह नहीं किया। अपने सभी वरिष्ठों का समुचित आदर किया और सभी कनिष्ठों से स्नेह रखा। मेरे हृदय से कभी दया, ममता का लोप नहीं हुआ, और न कभी अहंकार एवं ईर्ष्या का जन्म ही हुआ। मुझे बताइये धर्मराज कि मुझे अपने किस अपराध की सजा मिली जो मुझे शूली पर चढ़ाया गया?"

धर्मराज बोले, "हे ब्राह्मण! आपने सात वर्ष की अवस्था में खेल-खेल में ही घास काटने वाले औजार से अपने पिता के आश्रम में रहने वाले एक श्वान की पूँछ काट दी थी। यह उसी कर्म का फल था। जिस प्रकार छोटे से छोटे पुण्य के लिए महान सद्फल प्राप्त होता है, उसी प्रकार छोटे से छोटे पाप के लिए बड़े दण्ड का प्रावधान होता है। यही उचित है, यही न्याय है।"

धर्म के यह विचार सुन मांडव ऋषि क्रोधित हो उठे और बोले, "हे सर्वोच्च न्यायाधीश! क्या आपका न्याय वेदों से भी परे है? क्या वेद नहीं कहते कि बारह वर्ष तक की अवस्था के बालकों को पुण्य और पाप का भान नहीं होता? क्या सर्वोच्च पद पाकर आप अपनी स्वेच्छा से अपना विधान बनाएंगे? न्याय करने वाले न्यायाधीश! आप अपनी सत्ता के नशे में चूर हैं और अपने गलत आचरण को न्याय कह रहे हैं? सर्वोच्च पद पाकर ही आप ऐसा कर सके तो जाइये, मैं मांडव आपको मनुष्य योनि में सेवक वर्ग में जन्म लेने का श्राप देता हूँ। सत्ताधारियों के लिए सेवा से बड़ा शिक्षक कोई नहीं हो सकता। आप मछुवारी कन्या के गर्भ से उत्पन्न महान ऋषि कृष्ण द्वैपायन व्यास द्वारा एक दासी के गर्भ से जन्म लेंगे। संसार आपको विदुर के नाम से जानेगा।"
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अजीत
19 अप्रैल 18

Thursday, 22 March 2018

विरोध आवश्यक है

यहाँ कई बार आपने देखा होगा कि मुझ जैसे कुछ लोग कभी-कभी यह सवाल पूछते हैं कि "कुछ किताबों के नाम बताइये"।

इन सुझाई गई किताबों में कई किताबें आचार्य चतुरसेन की होती हैं, आनन्द नीलकण्ठन की होती हैं, राहुल सांकृत्यायन की होती हैं। मजे की बात यह भी हैं कि सलाह देने वाले अधिकांश मित्रों ने ये किताबें पढ़ी नहीं होती, बस तारीफ सुनी होती हैं और यह मानकर कि इन फेमस लेखकों की किताबें तो अच्छी होंगी ही, सुझाव दे देते हैं।

सुझाव देने वालों की गलती नहीं बता रहा। वे तो सुझाव देकर मदद ही कर रहे होते हैं। ये भी पक्का है कि यदि उन्हें इन किताबों में लिखे कंटेंट की जानकारी होती तो वे यह जानते हुए कि पूछने वाला किस विचारधारा का है, इन नामों को नहीं बताते।

कुछ प्रसिद्ध अथवा अच्छी किताबों को पढ़कर उनके बारे में यहां बताता रहा हूँ। यहीं आपको काफी लोग मिल जाएंगे जिन्होंने मेरी लिखी कुछ पोस्ट्स पढ़कर नरेंद्र कोहली की महासमर और अभ्युदय तथा कन्हैय्यालाल माणिकलाल मुंशी जी की कृष्णावतार खरीदी/पढ़ी।

कुछ ऐसी किताबों के बारे में भी लिखा जो एक धार्मिक हिन्दू होने के नाते मुझे बहुत ज्यादा बुरी लगीं। आचार्य चतुरसेन और आनन्द नीलकण्ठन की किताबें उनमें प्रमुख हैं।

मुझे यह समझ नहीं आता कि यदि कोई इन किताबों को पढ़कर उनके विरोध में कुछ लिख रहा है तो यह उन किताबों का प्रचार कैसे हो सकता है! ये किताबें तो पहले से ही बेस्ट सेलर्स हैं और पहले ही सैकड़ों लोगों द्वारा पढ़ी जा चुकी हैं। उनमें से कुछ को ये वास्तव में पसन्द आई होंगी और उन्होंने आगे उसे रेकमेंड किया होगा।

अधिकांश लोग सजते और फबते से शीर्षक देखकर या ऑनलाइन साइट्स पर इंग्लिश में लिखे ढेरों रिव्यू की संख्या देखकर किताबें खरीदते हैं। पढ़ते हैं और निराश होते हैं। इससे भी बुरा कि वे उनमें लिखी बातों को सच मानते हैं। जैसे चतुरसेन लिखते हैं कि यज्ञ के दौरान सभी ऋषि दारू पीते हैं और दासियों संग मस्ती करते हैं। यकीनन उनके शब्द आलंकारिक होते हैं पर मतलब यही है। आनन्द लिखते हैं कि ब्राह्मण अनीश्वरवादी चार्वाक को जिंदा जला देते हैं, अर्जुन के पुत्र, नागवंशी और तथाकथित शूद्र इरावान को बलि चढ़ा देते हैं और कृष्ण मौन समर्थन देते हैं, राम विद्वान शम्बूक की हत्या कर देते हैं।

ये सब बातें जिस ढंग से प्रस्तुत की जाती हैं उनसे पाठक के मस्तिष्क में बैठ जाता है कि सनातन के इतिहास में यही सब गन्दगी भरी पड़ी है। यहां गुरु के पद पर आसीन ऋषि-समाज को भ्रष्ट बताया जाता है और भगवान माने जाने वाले राम/कृष्ण अन्यायी।

शिवाजी सावंत का नाम सबने सुना होगा। इनकी प्रसिद्ध किताब को 'मूर्तिदेवी' सहित दर्जनों राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हैं। 1974 में पहले और 2017 में छियालिसवें संस्करण के साथ इस किताब को आज तक लाखों लोगों ने पढ़ा (विविध भाषाओं में)। कर्ण पर आधारित है यह उपन्यास। इसमें कर्ण की इतनी तारीफ लिखी है कि जैसे उससे बड़ा धर्मात्मा कोई हुआ ही नहीं, जबकि मूल महाभारत में यह एक विलेन ही है बस। केवल मित्रता किसी को कैसे महान बना सकती हैं? कल को हाफिज सईद किसी की मदद करें और मदद पाने वाला हमेशा हाफिज सईद का साथ दें तो वह महान हो जाएगा क्या? सावंत जी लिखते हैं कि द्रौपदी कर्ण पर मोहित है और अपनी एक सखी से कहती है कि सखी, कितना अच्छा होता जो कर्ण भी पांडवों का भाई होता, एक साल के महीनों का इवन डिस्ट्रिब्यूशन हो जाता (2-2 महीने हर पति के साथ)। क्या यह एक विवाहित नारी को चरित्रहीन चित्रित करने का प्रयास नहीं है। विवाहित का परपुरुष या परनारी की प्रशंसा करना एक बात है और उसकी पति/पत्नी के रूप में आकांक्षा; पाप।

जब यह (या कोई भी) किताब पहली बार ही छपी थी तो किसी ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? कदाचित यह सोचकर नहीं किया कि छोड़ो, इसका विरोध करने से तो इस किताब का प्रचार ही होगा। और देखिए, बिना विरोध के भी वह किताब खूब प्रचारित हुई।

होता भी है प्रचार तो होने दीजिए न। पर प्रचण्ड विरोध से यह तो होगा कि कोई अगला लेखक ऐसा कुछ अनर्गल लिखने से पहले बीस बार सोचेगा। जिन्हें गन्दगी में ही रस मिलता है वे तो जैसे-तैसे मुँह मारेंगे ही, पर जो अनजान हैं, जो कुछ अच्छा, सकारात्मक, सात्विक पढ़ना चाहते हैं उन्हें तो पता चल जाएगा कि फलां-फलां किताब में बकवास लिखा है, और वो उन किताबों से बचेंगे।

कुछ दशक पहले की फिल्मों को याद कीजिये, जिसमें ठाकुर अत्याचारी, ब्राह्मण कपटी और लाला चोर दिखाया जाता था और दर्शक वर्ग ने जो दिखाया गया उसे जस का तस मान लिया। समाज को बांटने में इन फिल्मों का बहुत बड़ा योगदान है। जब यह सब हो रहा था तो हम और आप चुप थे। आज देखिए हाल।

ऐसी किताबों ने बहुत मानसिक प्रदूषण फैलाया है। इसी वजह से कोई दुर्गा को अपशब्द बोल देता है और महिषासुर की पूजा होने लगती है। आज देश की तकरीबन आधी आबादी खुद को मूल निवासी बता कर बाकी आधों को देश से भगाने की बात करती है। क्यों? कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, पर चूंकि कुछ लेखकों ने गप्प लिख दी तो वही प्रमाण हो गया।

यह सूक्ति वाक्य जैसा बहुत सुनाई देता है कि क्या पढ़ें से ज्यादा जरूरी है कि क्या न पढ़ें। पर 'क्या न पढ़ें' यह कोई तो बताएगा? उसके लिए उसे पढ़ना तो पड़ेगा? और जब वो यह काम करना चाहता है तो क्यों उसे यह कह कर चुप करा दिया जाता है कि ऐसा मत करो, यह नकारात्मक ही सही, है तो प्रचार ही।

आज गलत का विरोध नहीं करेंगे तो कल चारों ओर बस गलत ही गलत दिखेगा और हम यूहीं हाथ मलते रह जाएंगे। गलत का पुरजोर विरोध कीजिये और जो कर रहे हैं उन्हें करने दीजिए।

बाकी,
मस्त रहें, मर्यादित रहे, महादेव सबका भला करें।
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अजीत
22मार्च 18

आंनद नीलकण्ठन की महाभारत: एक सुनियोजित षड्यंत्र

#महाभारत

'महाभारत' मेरा प्रिय विषय है। एक से बढ़कर एक पात्र, उनके विशिष्ट चरित्र अपने आप में शोध का विषय हैं। मुझे महाभारत सम्बंधित जो भी मिलता है उसे पढ़ लेना चाहता हूँ। महाभारत पढ़ने की लालसा कभी खत्म नहीं होती।

#आनन्द_नीलकण्ठन' से मेरा परिचय उनकी पहली किताब Asura:Tale of the Vanquished: The Story of Ravana and His People (हिंदी अनुवाद: असुर : पराजितों की गाथा, रावण व उसकी प्रजा की कहानी) से हुआ था। आनन्द पराजितों की कथा लिखते हैं, और इतनी बेहतरीन लिखते हैं कि रावण जैसे खल चरित्रों को बिलकुल देवता दिखा देते हैं। एक उदाहरण देखिए कि रावण ने सीता का अपहरण इसलिए किया कि सीता उनकी बेटी थी और बेटी को जंगल में तकलीफ न हो, इसलिए उसे उठाकर लंका ले आया। सीता की अग्नि परीक्षा के समय वे अग्नि में कूदते समय अपने पिता रावण को याद करती हैं।

आनन्द की दूसरी किताब महाभारत पर है और दो भागों में है। पहली Ajaya: Roll of the Dice (अजय: पांसों का खेल) और दूसरी Ajaya: Rise of Kali (अजय: कली का उदय)।

महाभारत में आपने जो भी अच्छा पढ़ा होगा, यहाँ उसका सब उल्टा मिलेगा, और जो भी बुरा पढ़ा होगा उसका और अधिक बुरा रूप देखने को मिलेगा।

कथा की शुरुआत गांधार पर भीष्म के आक्रमण से होती है। वे धृतराष्ट्र के लिए गांधारी का हरण करने आये हैं और 'परम्परानुसार' सभी मर्दों की हत्या कर देते हैं। पर उन्हें पलंग के नीचे छुपे 5 वर्ष के राजकुमार शकुनि पर दया आ जाती है और वे उसे हस्तिनापुर ले आते हैं और अपने बेटे की तरह उसका लालन पालन करते हैं। ऐसा आनन्द ही लिख सकते हैं। भीष्म-शकुनि की नहीं, विजेता द्वारा विजितों की हत्या की बात कर रहा हूँ। ज्ञात इतिहास में इस किताब से पहले कभी नहीं पढ़ा था कि किसी भारतीय हिन्दू राजा ने युद्ध जीतने के बाद नगर की प्रजा की हत्या और लूटमार की हो।

इस प्रसंग के बाद उन्होंने भीष्म को बख्श दिया है। भीष्म ऐसे व्यक्ति हैं जो समाज में फैले जातिवाद से नफरत करते हैं और उन्होंने एक शूद्र #विदुर को अपना प्रधानमंत्री बनाया है। वे विदुर के साथ मिलकर बिना जाति का विचार किये राज कार्य करना चाहते हैं, परन्तु दक्षिण भारत के राजाओं पर प्रभाव रखने वाले घनघोर जातिवादी मानसिकता वाले #परशुराम से हुए एक युद्ध में, उन्हें एक संधि करनी पड़ी जिसके अनुसार उन्हें देश में पुरोहित वर्ग के वर्चस्व को स्वीकार करना पड़ा। दूसरे शब्दों में ब्राह्मणों के अनैतिक जातिवादी सोच को पनपने की छूट देनी पड़ी।

विदुर प्रधानमंत्री होते हुए भी शूद्र हैं और इस बात पर कोई भी कभी भी उनका मजाक बना देता है। जातिवादी द्रोण तो इतने दुष्ट हैं कि विदुर का सबके सामने ही अपमान कर देते हैं। वे राजकुमारों की शिक्षा के लिए नियुक्त हैं और दुर्योधन से इसलिए नफरत करते हैं कि वह छोटी जातियों के लोगों से घुलता मिलता है और हृदय से एक कोमल भावनाओं वाला कवि जैसा है। जब तब उसे 'अंधे का बेटा' होने का ताना देकर दुर्योधन की सुकोमल भावनाओं का मजाक बनाते हैं।

शकुनि एक देशभक्त गांधारवासी व्यक्ति है जो अपने गांधार का बदला लेने के लिए पूरे भारत देश को तबाह कर देना चाहता है। वो कुटिल चालें चलता है और इसके लिए पश्चिम दिशा में मुँह करके प्रार्थना करता है। कुछ पन्नों बाद वह प्रार्थना की जगह नमाज पढ़ने लगता है, कुछ पन्नों बाद उसका ईश्वर खुदा हो जाता है। लोग उसे म्लेच्छ कहते हैं। मतलब कि लेखक ने धीरे-धीरे ही सही, शकुनि को एक मुसलमान के रूप में चित्रित किया है।

कुंती शक्तिशाल महिला है, वे दरबार में अत्यधिक प्रभाव रखती हैं। उसका कारण है ब्राह्मण वर्ग। दरअसल दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। कुंती ब्राह्मणों की सभी जायज-नाजायज बातों का समर्थन करती हैं और बदले में ब्राह्मण उनके पर-पुरुषों से पैदा हुए बच्चों को पाण्डुपुत्रों के रूप में माम्यता देते हैं। एक जगह तो इन्होंने लिखा है कि इंद्र विपन्नावस्था में हैं और जब उन्हें पैसों के बदले कुंती को पुत्र प्राप्ति हेतु कुछ सप्ताह साथ रहने का प्रस्ताव दिया जाता है तो वे बड़े खुश होते हैं।

युधिष्ठिर धर्म का दिखावा करने में बहुत कुशल है और बचपन में जब तब मौका देखकर दुर्योधन को पीट देता था। एक प्रमुख पात्र एकलव्य है जो जंगल जंगल अपने काकी और उसके पाँच बच्चों के साथ भटक रहा है। एकलव्य शूद्रों में भी शूद्र निषाद जाती का है। अंगूठे वाली कथा समान ही है पर यहाँ अर्जुन खुश होता है और दुर्योधन को बहुत बुरा लगता है।

एकलव्य निराशा में भंगी का काम करने लगता है और मैला ढोता है। मतलब लेखक के अनुसार भंगी और मैला ढोने की प्रथा उस समय भी थी। कर्ण को जब दुर्योधन राजा बना देता है तो एकलव्य को प्रेरणा मिलती है और वह फिर से अपनी प्रैक्टिस शुरू कर देता है। इससे वह अपनी काकी और उनके पाँच बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाता। काकी और उसके बच्चे एकलव्य को छोड़कर नए बन रहे शहर वारणावर्त आ जाते हैं। वहाँ कुंती और युधिष्ठिर उन्हें अपने महल में बुलाकर नींद की दवाईयां मिला भोजन करवाते हैं और उनके सो जाने पर महल में आग लगाकर निकल जाते हैं। आग लगाने से पहले जब अर्जुन इस अमानवीय कार्य का विरोध करते हैं तो युधिष्ठिर उन्हें समझाते हैं कि वे सभी धर्म के लिए मर रहे हैं और इस कारण वे अगले जन्म में ऊँची जाति में पैदा होंगे। इस बहस के दौरान भीम उकता कर नकुल-सहदेव के पास चले जाते हैं जो शराब और जवान लड़कियों की बातें कर रहे होते हैं।

इन कुटिल योजनाओं में दुर्योधन का कोई रोल नहीं है। भीम को जहर देकर डुबाने की योजना शकुनि की थी, पर वहां भी वो भीम को बस कुछ दिनों के लिए गायब करना चाहता है, जिससे लोगों को लगे कि दुर्योधन ने ऐसा कुछ किया और पाण्डवों-कौरवों में बैर बढ़े। लाक्षागृह भी शकुनि की योजना थी, कि पाण्डवों का महल तो जले पर वे साफ बचकर निकल जाए और शक दुर्योधन पर हो। पांडव बचकर निकल जाते हैं और कुछ दिनों बाद द्रौपदी को जीत लेते हैं। यहाँ विशेष यह है कि द्रौपदी कर्ण की सुंदरता और वीरता पर मोहित है पर कृष्ण के दबाव में वह कर्ण को सूतपुत्र बोलकर खारिज कर देती है। बहुत बाद में भीम याद करता है कि जब वह और द्रौपदी प्रेम कर रहे होते हैं तो द्रौपदी अक्सर ही कर्ण का नाम फुसफुसाती है। युद्ध बाद हिमालय की किसी खाई में गिरकर मरने से पहले भी द्रौपदी कर्ण का नाम पुकारती है।

यहाँ सुभद्रा भी है। सुभद्रा यौवन के प्राथमिक चरण में दुर्योधन की प्रेमिका है और वे हाथों में हाथ डाले घण्टों घूमते हैं, चुम्बन लेते हैं और साथ जीने मरने की कसमें खाते हैं। कुछ समय बाद जब द्रोण शिष्यों की परीक्षा के समय दुर्योधन कर्ण का साथ देता है तो यह सुभद्रा को अर्जुन का अपमान लगता है। वह अर्जुन की तरफ आकर्षित हो जाती है और बाद में शादी कर लेती है।

कथा में दुर्योधन और अर्जुन इत्यादी के बच्चे भी हैं। दुर्योधन के बच्चे हैं लक्ष्मण और लक्ष्मणा। अर्जुन का बेटा है अभिमन्यु, जिससे उसके काका दुर्योधन बहुत प्रेम करते हैं। लक्ष्मण कवि हृदय है और क्षत्रियोचित व्यवहार नहीं करता। अभिमन्यु उसकी खिल्ली उड़ाता रहता है। लक्ष्मणा बहुत ही सुंदर युवती है और उसके पिता का मित्र, एकलव्य उसे अपनी पुत्री मानता है। एकलव्य को दुर्योधन ने वन प्रान्त का राजा बना दिया था। अपनी बहन सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करवाने में असफल रहे बलराम, अब अपनी पुत्री वत्सला का विवाह दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण से करवाना चाहते हैं। वत्सला ने पहले तो कोई ऐतराज नहीं किया, पर वो अभिमन्यु को चाहती है। दोनों कृष्ण के पास मदद मांगने जाते हैं। कृष्ण भीम के पुत्र घटोत्कच को एक काम सौंपते हैं। वह लक्ष्मण के कमरे में घुसकर लक्ष्मण को पकड़ लेता है और तभी बलराम उन्हें उनकी "आपत्तिजनक" अवस्था में देख लेते हैं। शादी टूट जाती है और बाद में वत्सला की शादी अभिमन्यु से कर दी जाती है। उत्तरा से शादी के बाद अभिमन्यु वत्सला को भूल जाता है।

यहाँ कृष्ण और आदिवासी रीक्ष जाति की जामवंती का बेटा सांब भी है जो लम्पट और निरंकुश है। एक उत्सव में दुर्योधन की लड़की लक्ष्मणा के साथ अभद्रता कर देता है। बाद में हस्तिनापुर से उसका अपहरण कर बलात्कार करता है और जंगल में यूहीं छोड़कर चला जाता है। लक्ष्मणा को कर्ण वापस लाता है और एकलव्य सांब को पकड़ने द्वारिका जाता है और लाकर हस्तिनापुर की कालकोठरी में बंद कर देता है। तय होता है कि सांब और लक्ष्मणा की शादी कर दी जाए। शकुनि एकलव्य को भड़काता है और उधर कृष्ण को भी सूचित कर देता है। एकलव्य जेल में घुसकर सांब को जान से मारने के लिए उसका गला दबाता है, तभी कृष्ण पहुंचते हैं और छुड़ाने की कोशिश में असफल होने पर एकलव्य के सर में पत्थर मार-मार कर उसे मार देते हैं। यह हत्या छुपा ली जाती है और आगे सांब इसी बात पर कृष्ण को ब्लैकमेल करता है।

युद्ध शुरू होने से पहले बलराम और कृष्ण में भारी बहस होती है, जहां बलराम कृष्ण के तर्कों (गीता के श्लोक) का तार्किक विरोध करते है और कृष्ण बेवकूफ जैसे लगते हैं। अंततः किसी से यह कहते हुए कि किसी और जन्म में अहिंसा का प्रचार-प्रसार करने वे फिर से आएंगे, अहिंसा के पुजारी द्वारिकाधीश (वर्तमान गुजरात) बलराम अपनी परित्यक्ता बेटी वत्सला और सांब की परित्यक्ता बीवी लक्ष्मणा के कंधों पर हाथ रखे महल से निकल जाते हैं। कृष्ण की सेना दुर्योधन से मिल जाती है क्योंकि उनके अनुसार धर्म दुर्योधन के साथ है। युद्ध में पांडव सारे अधर्म करते हैं और दुर्योधन धर्म पर टिका रहता है।

भीम-पुत्र घटोत्कच और अर्जुन-पुत्र इरावान राक्षस और नाग कन्याओं के पुत्र हैं, इसलिए अछूत हैं। वे अपने पिताओं के सामने खुद को साबित करना चाहते हैं और एकलव्य से शिक्षा पाते हैं। लोग क्या कहेंगे कि भीम एक अछूत को अपना बेटा मान रहा है, यह सोचकर वे उससे कभी बात नहीं करते, पर घटोत्कच के मरने पर खूब रोते हैं।

इरावान के लिए लेखक ने बहुत ही विचित्र बात लिखी है। मूल महाभारत में इरावान युद्ध में भाग लेता है और असुर अलम्बुष से युद्ध करते हुए मारा जाता है। पर यहां! यहां पाण्डवों के पुरोहित और ब्राह्मण समाज के मुखिया मुनि धौम्य युद्ध से पहले ही इरावान को बलि चढ़ा देते हैं। और जब कृष्ण गुस्से में इसका विरोध करना चाहते हैं तो धौम्य 'एकलव्य की हत्या' याद दिलाकर ब्लैकमेल करते हैं। इरावान के सर को एक खंबे पर लगा दिया जाता हैं।
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और भी बहुत कुछ लिखा है लेखक ने। लेखक ने आज के (निकट भूतकाल के) परिदृश्य को महाभारत में पिरो दिया है। कई जगह वे बहुत प्रभावित भी करते हैं। पर उनका एकतरफा लेखन चिढ़ पैदा करता है। मूल महाभारत से बस शकुनी और भीष्म का चरित्र मिलता है। दोनों जगहों पर शकुनि दुष्ट है और भीष्म विवश बुजुर्ग।
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उपसंहार में लेखक यह निवेदन करते हैं कि सबको मूल महाभारत पढ़नी चाहिए, और उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए। निश्चित ही ऐसा किया जाना चाहिए, पर यह लिखकर लेखक अपनी महाभारत 'अजय' को एक तरह से जेनुइन बताने की कोशिश करते हैं। जबकि तमाम बातें मूल महाभारत से बिलकुल ही जुदा हैं। सबसे अजब बात तो शकुनि का नमाज पढ़ना और खुदा से दुआ मांगना है। यदि महाभारत को कुछ विद्वानों के अनुसार 3 से 5000 वर्ष पुराना भी माने तो उस समय तक भी इस्लाम का तो कहीं कोई जिक्र ही नहीं था। द्रौपदी और सुभद्रा का पर-पुरुषों को याद करना, कुंती का पैसे देकर गर्भ धारण करना, मेले वगैरह में छिछोरों द्वारा की जाने वाली बदतमीजी को सांब पर आरोपित करना, बलराम और जरासंध का मित्र होना, परशुराम का शूद्र समाज का इतना विरोधी होना, यह सब कहाँ लिखा है महाभारत में? कृष्ण द्वारा एकलव्य का वध है, पर वह एक युद्ध में किया जाने वाला कर्म है। यहाँ तो कृष्ण भगवान बनने की साजिश करते और लोगों द्वारा ब्लैकमेल होते दिखाए गए हैं।

पता नहीं उन्होंने महाभारत खुद भी ध्यान से पढ़ी या नहीं। क्योंकि महाभारत शुरू ही होती है 'सूत जी महाराज' के कथा सुनाने से। सूत जी महाराज खुद सूत हैं जिनके आसन के नीचे सारा ऋषि समाज हाथ जोड़कर कथा सुनने के लिए बैठा है। वे कहते हैं कि वेद व्यास अपनी रचना को लिखने के लिए लिपिक के तौर पर ब्रह्मा से गणेश की मांग करते हैं। माताओं के नाग और राक्षस होने से क्षत्रियों के पुत्रों को भी अछूत चित्रित करने वाले लेखक ध्यान नहीं देते कि महाभारत के रचयिता खुद उसी निषाद जाति की स्त्री के बेटे हैं जिस जाति का एकलव्य है।
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आनन्द नीलकण्ठन की नवीनतम किताब 'बाहुबली: शिवगामी' वास्तव में बहुत बढ़िया किताब है। इसकी समीक्षा बड़े भाई अरुण ने की है, जिसे पढ़ा जाना चाहिए। किताब की प्रस्तावना में लेखक कहते हैं कि बाहुबली के निर्देशक राजामौली उनकी #असुरा से बहुत प्रभावित थे और उन्होंने उन्हें बाहुबली मूवी से पहले की कथा लिखने के लिए प्रेरित किया।

सुना है कि राजामौली महाभारत पर फ़िल्म बनाने वाले हैं। यदि वे आनन्द नीलकण्ठन से आगे भी इतने ही प्रभावित रहते हैं तो भूल जाइए "पद्मावत" का विरोध। महाभारत का महाविरोध देखेंगे आप सन 2020 में।

बाकी,
मस्त रहें, मर्यादित रहें, महादेव सबका भला करें।
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अजीत
18 मार्च 18

Friday, 9 February 2018

आखिर गांधी अफ्रीका गए ही क्यों!



पोरबंदर, नाम में लगा बन्दर मतलब बंदरगाह। बंबई के बनने से पहले यहीं से सिंध, बलुचिस्तान, पूर्वी अफ्रीका और फारस से व्यापार होता था। बम्बई बना तो पोरबंदर को बहुत नुकसान उठाना पड़ा।

पोरबंदर काठियावाड़ के सत्तर रजवाड़ों में से एक था। छोटा इलाका और इतने शासक। कोई 'राजा', कोई 'नवाब', कोई 'राव' तो कोई 'जाम साहेब'। पोरबंदर का राजा 'राणा' कहलाता था।

अंग्रेजों ने इस इलाके को सीधे अपने हाथों में नहीं लिया था। वे तब तक इन राजाओं को राज करने देते थे, जब तक उन्हें बर्दाश्त किया जा सके। राजाओं की सात कैटेगरी होती थी। क्लास वन का राजा अपनी प्रजा का सर्वेसर्वा होता था, किसी अपराधी को सजाए मौत तक दे सकता था। वहीं क्लास सेवन के राजा को 15 दिन की कैद की सजा देने के लिए भी अंग्रेजों की अनुमति लेनी होती थी। बहरहाल, 70000 की आबादी वाले पोरबंदर का 'राणा' श्रेणी वन का राजा था। पहले गांधी 'लालजी' थे जो पोरबंदर राजा की नौकरी में आये और इनकी चौथी पीढ़ी में हुए उत्तमचन्द गांधी उर्फ 'ओटा बापा' जो दीवान बने। दीवान मतलब राजा के बाद सबसे बड़ा अफसर। हालांकि ओटा बापा पढ़ाई में निल बटा सन्नाटा थे।

राणा की मृत्यु हुई, उसका बेटा नाबालिक था तो शक्ति रानी के हाथ में आ गई। रानी ओटा बापा को पसन्द नहीं करती थी तो ये पोरबंदर छोड़ जूनागढ़ चले आये। जब रानी मरी तो नए राणा विक्रमजीत ने उन्हें वापस बुलाया और दीवानी सौंप दी। फिर कुछ दिनों बाद राणा और दीवान में किसी मुद्दे को लेकर अनबन हुई तो राणा ने इन्हें हटाकर इनके बेटे करमचंद उर्फ कबा को दीवान बना दिया।

कबा की पहली दोनों पत्नियां मर गई, उनसे एक-एक बेटी भी हुई थी, वो भी नहीं बची। तीसरी शादी की, कोई बच्चा नहीं हुआ। फिर पत्नी की रजामंदी से उन्होंने अपने से बाइस साल छोटी पुतलीबाई से विवाह किया। उनसे इन्हें बच्चे हुए, लक्ष्मीदास, लड़की रैलियत, करसनदास और फिर हुए मोहनदास करमचंद गांधी।

मोहनदास के पैदा होने के समय राज्य पर विपत्ति आई हुई थी। राजा के बड़े बेटे की उत्तेजक दवाइयों (शराब) के प्रयोग से बड़ी दर्दनाक मौत हुई थी। राजा ने इसके लिए राजकुमार के सेवक लुकमान को दोषी माना, कि उसने ही उन दवाइयों की आपूर्ति की थी। नाक-कान काटकर उसे किले की दीवार से फेंककर मार डाला गया। एक अरब सिपाही को भी मार डाला गया। अंग्रेज इन सजाओं के लिए राणा के तर्कों से सहमत नहीं हुए और इसे सत्ता का गम्भीर दुरुपयोग मानते हुए राजा का दर्जा घटाकर तीन कर दिया।

राजा का दर्जा घट जाने से कबा को तकलीफ हुई और वे राजकोट चले आए। पोरबंदर में 20 सालों का दीवानी का अनुभव काम आया और वे दो साल में राजकोट के दीवान बन गए। मोहनदास की पढ़ाई वहीं शुरू हुई। इनके दोनों बड़े भाई पढ़ाई में डब्बा गोल रहे, ये भी कुछ खास नहीं थे पर फिर भी कइयों से बहुत बेहतर थे।

इनकी शादी हो गई। जब ये 16 साल के थे तो इनके पिता की मृत्यु हो गई (सन 1885)। 1888 में इन्होंने ग्रेजुएशन में दाखिला लिया। उसी समय इनके घर एक आदमी मेहमान बन कर आया जिसने लन्दन जाकर बैरिस्टरी करने की सलाह दी। बीए में 4-5 साल लगना था और बैरिस्टरी ढाई-तीन साल में हो जाती थी। पिता थे नहीं, माता धार्मिक थी जो नहीं चाहती थी कि बेटा विदेश जाए। गांधी ने जिद की तो कुछ वचन देने के बाद इन्हें परमिशन मिल गई। पूरा खानदान विरोध में था पर बड़े भाई लक्ष्मीदास इनके साथ मजबूती से खड़े रहे। उन्होंने आशीर्वाद के साथ पैसों का भरपूर बंदोबस्त किया, इसमें घर के जेवरात भी गिरवी रखने पड़े।

समय बदल गया था, गांधी के बाप-दादा अनपढ़ होते हुए भी दीवान बन पाए थे पर अब राजाओं को पढ़े लिखे नौजवान चाहिए थे। लक्ष्मीदास और करसनदास कुछ खास पढ़ नहीं पाए थे, तो यही सोचा गया कि छोटे को पढ़ा दिया जाए कि यही बन जाए दीवान।

गांधी निकल लिए इंग्लैंड। इधर करसनदास राजकोट रियासत में और लक्ष्मीदास पोरबंदर रियासत में छोटे मोटे नौकर हो गए। इस समय तक पोरबंदर के राणा का दर्जा वापस मिल गया था लेकिन उसे बम्बई में रहना होता था। वह कभी-कभी अपनी रियासत आ तो सकता था लेकिन लगातार रह नहीं सकता था। जो राजकुमार मर गया था उसके बड़े बेटे को राजा बनने की ट्रेनिंग दी जा रही थी। पर उसका मन शिकार, शराब और शबाब में लगता था। शादीशुदा था, बावजूद इसके उसका अपना हरम था। अनाप-शनाप खर्चे। राजा उससे नाउम्मीद हो चुका था और अंग्रेज भी उससे खफा थे।

एक बार राजकुमार अपने दादा मतलब राजा के महल में घुस आया और ताला तोड़कर जवाहरात और महंगे बर्तन उठा ले गया। मुकदमा चला तो उसने कहा कि राजा इन्हें खर्च कर देता इसलिए उसने यह सब अपने कब्जे में कर लिया।

यह सब तो रजवाड़ों में होता ही रहता था। पर दिलचस्प बात यह थी कि उस राजकुमार के मुख्य सलाहकार थे अपने लक्ष्मीदास गांधी। आरोप तो यह भी था कि उस रात राजकुमार के साथ लक्ष्मीदास भी थे। उन्हें पोरबंदर से तड़ीपार की सजा दी गई।

जब मोहनदास गांधी बैरिस्टर बनकर वापस लौटे तो उनके दीवान बनने के चांस खत्म हो चुके थे। विडम्बना ही थी कि जिस भाई ने अपनी सारी जमा-जथा गांधी को दीवान बनते देखने के लिए उनकी पढ़ाई में खर्च कर दी, अब उन्हीं के कर्मों की वजह से गांधी के सारे मौके खत्म हो गए। अपराधी के भाई को दीवान कौन बनाता?

गांधी वहां से बम्बई आ गए, कोर्ट में नामांकन कराया। करीब एक साल तक कमरे से कोर्ट आते-जाते रहे और नाकाम होते रहे। वकालत जमी नहीं बम्बई में तो वापस राजकोट आ गए। वहीं एक ऑफिस बनाया और मसौदे वगैरह तैयार करते। इसमें वे सफल रहे। बढ़िया पैसा कमाने लगे। पर वे थक चुके थे। इतनी उच्च शिक्षा और लेखकीय कौशल बर्बाद हो रहा था यहां। (गांधी उच्चकोटि के लेखक थे।)

एक मौका बना। पोरबंदर का एक मुस्लिम गुजराती दादा अब्दुल्ला नटाल और ट्रांसवाल (साउथ अफ्रीका) में रहता और व्यापार करता था। नटाल खुद देखता और ट्रांसवाल की दुकानें अपने रिश्ते के भाई तैयब हाजी खान को सौंप रखी थी। उनमें ही कुछ गबन घोटाला हुआ था, जिससे मुकदमा दायर हो गया। दादा अब्दुल्ला की दिक्कत थी कि उनका सारा खाता-बही गुजराती में था। उसे ऐसे वकील की जरूरत थी जो गुजराती जानता हो, अंग्रेजी पर अधिकार हो और जो कुछ महीनों या साल तक नटाल और ट्रांसवाल में रह सके।

उसने पोरबंदर के अपने मित्र लक्ष्मीदास को ऐसा वकील ढूंढ देने को कहा। लड़का घर में ही था और बाहर निकलने के लिए तड़प रहा था। जहाज के टिकट, रहने-ठहरने के खर्च और 150 पाउंड फीस ने गांधी को 23 अप्रैल 1893 को बम्बई से डरबन के जहाज पर सवार करवा दिया।

और मोहनदास को 'दि गांधी' बनाया साउथ अफ्रीका ने।

गांधी में यकीनन बहुत कुछ खास बातें थी, पर खास इंसानों को महामानव बनाने में नियति का भी योगदान होता है। कौन जानता है कि यदि परिस्थितियां वैसी न बनी होती तो गांधी किसी छोटी सी रियासत के दीवान बने रहते या राजकोट में मसौदे लिखकर पेट पालते।

बाकी फिर कभी.....

मस्त रहें, मर्यादित रहें, महादेव सबका भला करें।
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अजीत
30 जनवरी 18

गणतंत्र और हम

विरोध और असंतुष्टि हमारी नसों में कहीं बहुत अधिक गहरे पैवस्त हो चुकी हैं। हमें जब भी कुछ दिखता है तो बस कालिमा दिखती है। हम जब भी बात करते हैं तो बस दोषारोपण करते हैं, और दोष मढ़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं।

अभी कुछ दिन पहले हमने अपना गणतंत्र दिवस मनाया। हमने मनाया का मतलब सरकार ने, क्योंकि आप तो इस गणतंत्र को गाली दे रहे थे कि हमें क्या मिला इस लोकतंत्र से, इस संविधान से, इस देश से? एक मैसेज बड़ा चला कि हिंदुओं को बांट दिया और मुसलमानों को एकजुट कर दिया। हद्द है! हिंदुओं को बांट दिया और आप अलग हो गए। गोया आपकी कोई मर्जी नहीं, किताब में लिखे चंद अल्फाजों से आप अलग हो गए?

संविधान सभा कोई एकलौती पार्टी की सभा नहीं थी और न ही उस समय की कांग्रेस आज की कांग्रेस जैसी थी। वैसे ही जैसे उस समय की कांग्रेस आजादी से पहले वाली कांग्रेस से अलहदा थी। कांग्रेस का नाम सुनते ही मन में जो गुबार फूटता है उसे उस समय की कांग्रेस पर मत फोड़िये क्योंकि तमाम राष्ट्रवादी लोग उस समय कांग्रेस का हिस्सा थे, और उसी से निकल कर कई लोग जनसंघ इत्यादि में शामिल हुए। बहरहाल,

जब आप भारत के आईन की बुराई करते हैं तो इसे किसी से कम्पेयर भी तो कर के देखिए कि हम किनके मुकाबले बेहतर या बदतर हैं। हमारे साथ ही हमारा ही टुकड़ा पाकिस्तान भी आजाद हुआ था। उसकी हालत देखिए आज। मजहब के नाम पर बने मुल्क में 1954 तक गणतंत्र दिवस मनाया गया फिर वही पाकिस्तान दिवस हो गया क्योंकि वहां गण का, मने लोक का तंत्र रहा ही नहीं। हमारे यहां पहले दिन से यह तय था कि हम चुनाव करवाएंगे, सरकार जनता चुनेगी, एक सुदृढ न्यायपालिका होगी, मीडिया स्वतंत्र होगी। और यह सब कुछ ही दिनों में हो गया। भले ही आजादी के कई सालों तक एक ही पार्टी ने राज किया पर उसे राज करने का अधिकार यहां की जनता ने दिया। यहां के आम चुनाव अनडाक्युमेंटेड वंडर हैं क्योंकि इतने बड़े देश में चुनाव करवाना हँसी खेल नहीं।

पाकिस्तान और बहुत सारे अन्य मुल्क शीत युद्ध के समय अमेरिका या सोवियत रूस की गोदी में बैठ गए। खुदमुख्तारी हासिल नहीं कर पाया पाकिस्तान। वो दिन है और आज का दिन है कि पाक मोहताज बना हुआ है। अमेरिका भीख देता है तो उसके टैंक चलते हैं, उसके जहाज उड़ते हैं। एक हम थे जिन्होंने अपनी बुनियाद मजबूत बनाई, किसी के आगे झुके नहीं और आज का दिन है कि हम दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनते जा रहे हैं।

पाकिस्तान की ही बात करें तो उसने अपने राज्यों को एकीकृत किया, केंद्रीकृत शासन चलाने की कोशिश की और नतीजा, बांग्लादेश अलग हो गया। बलुचिस्तान, पख्तूनख्वा और सिन्धुदेश अलग होने को तड़प रहे हैं (ये सब उस समय खुशी-खुशी राजी हुए थे)। इधर हम हैं जहां सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ। हमने राज्यों को उनकी संस्कृति, उनकी भाषा, उनके रिवाजों के साथ प्रशासन का अधिकार दिया। पाकिस्तान की तरह यूपी और आंध्रा और तमिलनाडु और बंगाल को एक ही लाठी से नहीं हांका, मतलब एक यूनिट नहीं बनाई। एक के बाद एक बनाते गए और आज 29+7 हैं। हमने राज्य की भावना का ख्याल किया जिससे राष्ट्रीयता मजबूत हुई। वहाँ केवल एक भाषा उर्दू को सरकारी भाषा बनाया गया जिससे बाकी भाषा-बोली बोलने वाले जब-तब बवाल काटते रहते हैं, जबकि हमारे यहां 22 सरकारी भाषाएं हैं।

पाकिस्तान तो चलो बकवास देश है। कम्पेयर करते हैं यूरोप के समृद्ध देशों से। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि क्राइम के मामले में हम उनसे कहीं बेहतर हैं। माना कि अपराध की संख्या ज्यादा है क्योंकि हम खुद बहुत ज्यादा हैं। अनुपात देखें तो हम कई यूरोपियन मुल्कों से कहीं अच्छे हैं। हमारे यहां गरीबी भी है पर हमारे यहां का गरीब से गरीब आदमी भी शॉपिंग कर सकता है, गिफ्ट दे सकता है, बेटी को पार्क में घुमा सकता है, बीवी को डिनर पर ले जा सकता है और परिवार को बस या ट्रेन से एक से दूसरे शहर ले जा सकता है। यूरोप का गरीब इस बारे में सोच भी नहीं सकता। वहां जो है वो ठीक-ठाक पैसे वालों के लिए है। वो ट्रेन या बस नहीं ले सकता, शॉपिंग नहीं कर सकता, बाहर खा नहीं सकता। या खायेगा भी तो कबाब या ब्रेड, इससे अधिक का मूल्य चुकाना उसके बस की बात नहीं। पर हमारे यहां बाजारों की इतनी वेराइटी है कि अमीर से अमीर और गरीब से गरीब के लिए सुपरमार्केट और बाजार हैं। 10 रुपये से लेकर दुनिया की सबसे महंगी डिश है यहां। यूरोप का गरीब जो ब्रेड और कबाब से ज्यादा सोच नहीं सकता, हमारे यहां मल्टीकुजिन, बोले तो चाइनीज और इटैलियन गलियों में बड़े आराम से ₹10 या ₹20 में मिल जाएगा। यहां हर तरह की लाइफ स्टाइल है।

चीन से तुलना कीजिये। चीन में लोकतंत्र वगैरह तो है नहीं, इंफ्रास्ट्रक्चर है, बड़े बड़े प्रोजेक्ट हैं। आइए, कुछ अपने प्रोजेक्ट देखिए। नवी मुंबई एयरपोर्ट, दुनिया के पांच बड़े एयरपोर्ट में से एक होगा। ऐसे ही हैदराबाद मेट्रो रेल प्रोजेक्ट है। गिफ्ट सिटी का नाम सुना होगा। गिफ्ट सिटी (Gujarat International Financial Tech-City) एक फाइनांशियल हब की तरह विकसित होता शहर है जहां दुनिया की तमाम वित्तीय संस्थाएं काम करेंगी। लंदन से पांच गुना बड़े इस हब में तकरीबन 220 से अधिक गगनचुंबी इमारतें होंगी, जिनमें से 2 तो बन भी चुकी और जिनमें विभिन्न आफिस काम करना शुरू कर चुके हैं।

नर्मदा नदी प्रोजेक्ट है जो चीन की तीन सबसे बड़ी परियोजनाओं की कुल क्षमता एवं लागत से भी बड़ी है। इसमें 3000 डैम हैं जिनसे बाढ़ नियंत्रण, बिजली, पेयजल, कृषि-सिंचाई जैसे तमाम आवश्यकताएं पूरी होंगी।

प्रोजेक्ट्स का ताऊ है अपना दिल्ली-मुम्बई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, मतलब औद्योगिक गलियारा, जो सम्भवतः दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है। 100 बिलियन डॉलर का यह प्रोजेक्ट देश के छह राज्यों के 1483 किलोमीटर से होता हुआ जाएगा जिसका कवरिंग एरिया छह लाख वर्ग किलोमीटर होगा। आज देश की राजधानी दिल्ली से देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई का माल-ढुलाई सफर 4 से 14 दिनों का है जो घटकर 14 घण्टे हो जाएगा। हार्बरों का नवीनीकरण, हाई-स्पीड रेल-रोड, छह लेन का एक्सप्रेस वे, 2 पावर प्लांट, 23 इंडस्ट्रियल हब, 6 एयरपोर्ट, 24 नए स्मार्ट शहर। यह सब बनेगा इस प्रोजेक्ट में, करीब 3 मिलियन नई नौकरियों के सृजन के साथ-साथ जीडीपी में 25% की बढोत्तरी।

यह हवाई बातें नहीं हैं। हो रहा है सब काम। हमें नहीं पता क्योंकि हमारा इंटरेस्ट नहीं है।

इस मुल्क में क्या नहीं है! नमक का रेगिस्तान, लद्दाख का ठंडा रेगिस्तान, राजस्थान का थार रेगिस्तान, वर्षावन, आइलैंड, ज्वालामुखी, विशाल नदियां, सैकड़ों झरने, चाय और कॉफी के बागान, लंबे समतल हरे मैदान, महान हिमालय, 7000 किलोमीटर का कोस्टल एरिया जिस पर कुछ बहुत ही खूबसूरत बीच हैं, महान और दुर्गम किले,  आदिम जातियां जो आज भी अपने उसी रूप में हैं, पुरातन गांव, आधुनिक शहर, टैम्पो से भी कम लागत में मंगल ग्रह तक भेजने की काबिलियत। यहां कल्चरल टूरिज्म है, प्रोफेशनल टूरिज्म है, मेडिकल टूरिज्म है, आध्यात्म है। दुनिया के सभी मजहब यहां हैं। यहां 22 तो ऑफिसियल भाषाएं हैं, 200 के करीब विकसित भाषाएं हैं, 6000 से ज्यादा बोलियां हैं। बताइये कि यहां क्या नहीं है?

एक समय था जब गोरे आप पर राज करते थे और यह केवल 70 साल पहले तक था (किसी राष्ट्र के पैमाने पर देखा जाए तो 70 साल कुछ नहीं होते)। सड़कें और सिनेमाघरों की सीटों पर लिखा होता था कि भारतीय और कुत्ते आर नॉट अलाउड। नैनीताल में 2 समांतर सड़कें हैं, ऊंची वाली पर अंग्रेज और नीची वाली पर हम "कुली" चलते थे। और आज देखिए कि आपका PM जब उनके यहां जाता है तो उनका PM हजारों की भीड़ के सामने गलबहियां डाले फोटो खिंचवाता है।

दुनिया के 90 देश मिला दें तो बनता है एक हिन्दोस्तान। इसकी इज्जत करें क्योंकि यह आपसे नहीं है, आप इससे हैं।

जय हिंद।

बाकी,
मस्त रहें, मर्यादित रहें, महादेव सबका भला करें।
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अजीत
31 जनवरी 18

Tuesday, 21 November 2017

भानुमति_14

भानुमति_14
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प्रधानमंत्री विदुर धीर-गम्भीर व्यक्ति थे परंतु आज उनका उत्साह देखते ही बन रहा था। राजकर्मचारियों, सेवक-सेविकाओं को आश्चर्यचकित करते हुए वृद्ध विदुर बालकों की तरह उछल-उछल कर माता सत्यवती के कक्ष की ओर भागे जा रहे थे, फिर जाने क्या सोचकर महामहिम भीष्म की ओर चल दिये। अभी आधे रास्ते भी नहीं गए थे कि फिर महाराज धृतराष्ट्र की ओर मुड़ गए। महाराज अपने महल के संगीत कक्ष में संगीत में डूबे हुए थे तभी विदुर की चहकती हुई आवाज ने उन्हें चौंका दिया, "महाराज, महाराज, बधाई हो महाराज"।
"कौन? विदुर! क्या हुआ?"
"महाराज, कुरुओं के पीढ़ियों से शत्रु, पांचाल हमारे मित्र हुए। हमारे राजपरिवार सम्बंधी हुए।"
चेहरे पर अथाह प्रशंसा लिए धृतराष्ट्र बोले, "विदुर, पहेलियां मत बुझाओ, साफ बताओ, क्या हुआ?"
"महाराज, मेरे भतीजों ने स्वयंवर में अपना पराक्रम दिखाया। एक कुरुवंशी ने अचूक लक्ष्यवेध किया। पांचालराज याज्ञसेन द्रुपद की पुत्री द्रौपदी हस्तिनापुर की बहू हुई महाराज।"
"अहोभाग्य विदुर, अहोभाग्य। तुमने बहुत शुभ समाचार दिया। दुंदुभी पिटवाओ, प्रजाजनों को करों में छूट दो, नगरजनों से कहो कि वे अपने घरों को नए रंगों और विभिन्न चित्रकारियों से रंग दें, फूल मालाओं से सजा दें। जो असमर्थ हों उन्हें राजकीय सहायता दो। आज इसी प्रहर से वर वधु के आने तक अन्न भंडार और राजकीय पाकशाला आमजनों के लिए खोल दो। अच्छा ये तो बताओ विदुर, मेरे किस पुत्र ने स्वयंवर जीता? तुमने कहा कि लक्ष्यवेधन हुआ, क्या धनुर्विद्या की कसौटी थी? दुर्योधन निपुण धनुर्धर है। क्या दुर्योधन विजयी हुआ, या दुःशासन या युयुत्सु?"
"हाँ महाराज, धनुर्विद्या की कसौटी थी जिसमें एक कुरु-कुमार विजयी हुआ। पर इससे भी अधिक, अत्यधिक प्रसन्नता की बात है कि वो कुमार मेरा भतीजा, आपका भतीजा सव्यसाची अर्जुन है। हाँ महाराज, हमारे भाई पांडु के सभी पुत्र जीवित हैं और उन्होंने द्रौपदी से विवाह किया।"
क्षण भर पहले जो चेहरा प्रसन्नता से दमक रहा था, वह काला पड़ गया, जो आंखें चमक रही थी, पांडवों के सकुशल होने का समाचार सुनते ही बुझ गई। 'पांडव जीवित हैं। कहीं उन्हें यह ज्ञात तो नहीं कि उनकी हत्या करने का षडयंत्र दुर्योधन ने रचा था', यह सोचकर उसके प्राण सूख गए। परन्तु वह एक कुशल राजनीतिज्ञ था, अपनी भावनाएं छुपाना जानता था। पल भर में ही खुद को पुनः व्यवस्थित कर बोला, "अहोभाग्य विदुर, अहोभाग्य। यह तो अत्यंत प्रसन्नता की बात है। अनुज-वधु कुंती भी सकुशल होंगी। अनुज-पुत्र भी तो पुत्र ही हैं। मेरी दी हुए आज्ञाएं पूर्ववत हैं। जाओ, सारी व्यवस्था देखो।" यह सब बोलते समय उसकी वाणी में वह पहले वाला उत्साह नहीं था। कदाचित विदुर यही देखने आए थे। कभी कभी मन इस प्रकार शरारतें करता ही है।
थोड़ा और खिझाने के उद्देश्य से पुनः बोले, "अवश्य महाराज। सभी व्यवस्थाएं मैं स्वयं देख लूंगा। पर उन्हें लाने के लिए भी तो किसी कुरुवृद्ध को जाना चाहिए। मैं अकेले क्या-क्या करूँगा।"
"तो किसी को अपना सहायक रख लो। कृपाचार्य यहीं हैं, संजय को भी अपने साथ रखो। जाओ, जो उचित समझो करो। मुझे विश्राम करने दो।"
विदुर जब कक्ष से निकले तो प्रतिहारियों को पुनः आश्चर्य हुआ। विदुर जैसे वृद्ध को बालिकाओं की तरह अपनी हँसी रोकने के लिए मुँह को हाथ से दबाए जाते देख किसे आश्चर्य नहीं होता।
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फूलों से सजे कक्ष में एक पलंग पर द्रौपदी चुपचाप बैठी हुई अपने आज से पहले के जीवन को स्मरण कर रही थी। उसके पिता ने यज्ञ द्वारा उसे और उसके भाई को एक विशिष्ट कर्तव्य हुए मंत्रों से अभिषिक्त किया। शस्त्र एवं शास्त्र की शिक्षा दी। वे द्रोण और उसके संरक्षक कुरु-साम्राज्य से प्रतिशोध लेने के लिए एक ऐसा जमाता चाहते थे जो सर्वश्रेष्ठ वीर हो। इसके लिए उन्होंने द्वारका के श्रीकृष्ण का चयन किया था। यद्यपि श्रीकृष्ण की पहले से ही कई पत्नियां थी, परंतु वही एक वीर थे जो निर्विवादित रूप से सर्वश्रेष्ठ कहे जा सकते थे। द्रौपदी ने अपने मन को समझा लिया था, पर कृष्ण ने उसे स्वीकार नहीं किया। क्या ये उसका अपमान था, कदाचित था पर फिर उन्होंने उसे अपनी सखी माना और उसके लिए स्वयंवर की योजना प्रस्तुत की। अपना सब कुछ दांव पर लगाकर उन्होंने इसे सफल बनाया और चमत्कार सा करते हुए पांडवों को शून्य में से प्रकट कर दिया। क्या कृष्ण वास्तव में चमत्कारी हैं?
'अब वह पांडवों की, पांच पुरुषों की पत्नी है। क्या वह उन सभी को प्रसन्न रख पाएगी?' विवाह के पश्चात पिछले 15 दिनों के मांगलिक कार्यक्रमों के बाद आज उसकी प्रथम मिलन की रात्रि थी। वह ज्येष्ठ पांडव की प्रतीक्षा कर रही थी। द्वार पर हलचल हुई और उसे युधिष्ठिर आते हुए दिखे। उनके चेहरे पर सहज मुस्कान थी। उन्होंने पूछा, "तुम प्रसन्न तो हो पांचाली?"
"हाँ स्वामी।" कुछ दिनों पहले तक जिस पुरुष से उसका कोई सम्बंध नहीं था उसे यूँ स्वामी कहना बहुत अटपटा सा लगा उसे। युधिष्ठिर अपना मुकुट उतारकर उसे रखने का स्थान ढूंढ रहे थे कि द्रौपदी ने आगे बढ़कर मुकुट अपने हाथ में ले लिया। कल तक वह पिता के लिए भी तो ऐसा ही करती आई थी।
वे दोनों चुपचाप पलंग पर बैठ गए। यह भी एक आश्चर्य ही कहा जायेगा कि धर्मचर्चा में कई प्रहर तक लगातार बोलने वाले धर्मराज यहां चुप बैठे थे। अंततः पत्नी के समक्ष धर्मराज भी तो मात्र पति ही थे।
वार्तालाप का प्रथम सूत्र खोजते खोजते युधिष्ठिर को कुछ मिल ही गया, बोले, "अच्छा, तुम्हें पता है आज कौन आये?"
ऐसे अटपटे प्रश्न पर द्रौपदी अचकचा कर बोली, "मुझे तो कुछ भी ज्ञात नहीं स्वामी।"
"अरे, आज काका विदुर आये थे हस्तिनापुर से। वे राजा धृतराष्ट्र का संदेश लाये हैं कि अब हमें हस्तिनापुर चल देना चाहिए।" थोड़ा संकुचित होकर पुनः बोले, "कदाचित मुझे अभिषिक्त सम्राट बनाया जाए, कम से कम पितामह की यही इच्छा है।"
द्रौपदी हर्षातिरेक से भर उठी। विवाह होते ही हस्तिनापुर जैसे समृद्ध और शक्तिशाली साम्राज्य की साम्राज्ञी बनना, ये तो उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। स्वयं को संभालते हुए उसने प्रश्न किया, "आपके काका विदुर कौन हैं?"
"काका विदुर मेरे पिता सम्राट पांडु तथा पितृव्य धृतराष्ट्र के के भाई हैं। क्या तुम्हें ज्ञात है कि महर्षि व्यास हमारे पितामह हैं? परंतु काका विदुर का बस यही एकमात्र परिचय नहीं है। वे धर्मज्ञ हैं, नीतिज्ञ हैं, राजनीति-शास्त्र के प्रकांड विद्वान हैं। वे हस्तिनापुर के प्रधानमंत्री हैं परंतु महल की अपेक्षा कुटिया में रहते हैं। निःसन्तान हैं, कदाचित इसीलिए वे समस्त प्रजा को अपना पुत्र ही मानते हैं। यदि आज हम भाई जीवित हैं तो ये उन्हीं की कृपा है। मुझे पक्का तो नहीं पता, मुझे ऐसा लगता है कि राज्य की गुप्तचर संस्था के अतिरिक्त उनकी अपनी ही एक गुप्तचर संस्था है।"
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद वे पुनः बोले, "द्रौपदी, मैं तुमसे क्षमाप्रार्थी हूँ। मेरे ही कारण ये स्थिति उत्पन्न हुई जो तुम्हें पांच पुरुषों से विवाह करना पड़ा। पर यही उचित था। तुमने यदि महामुनि व्यास के बताए अन्य विकल्पों को स्वीकार किया होता तो हमारा परिवार अटूट नहीं रह पाता।"
"स्वामी, मैंने वही किया जो उचित था। जब मुनि व्यास, वासुदेव कृष्ण और स्वयं आप कोई व्यवस्था दे रहे हैं तो वह उचित ही हो सकता है। स्वामी, मैंने आप लोगों से पूछे बिना एक निश्चय किया है।"
"क्या?"
"कि मैं प्रत्येक पांडव के साथ एक-एक वर्ष का पत्नीव्रत निभाऊंगी। उस विशिष्ट वर्ष मैं केवल एक पांडव की पत्नी बन उनकी सेवा करूंगी। क्या आप और अन्य पांडव इस पर सहमत होंगे?"
"अवश्य द्रौपदी, अवश्य। और यह भी है कि नियम का पालन हेतु, नियम भंग करने वाले के लिए सजा का प्रावधान भी होना चाहिए। तो यदि कोई अन्य पांडव बिना किसी सूचना के पति-पत्नी के कक्ष में प्रवेश करता है तो उसे बारह वर्ष के लिए नगर छोड़कर जाना होगा। मेरे सभी भाई इस हमारे इस निर्णय पर सहमत होंगे।"
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हस्तिनापुर की आज की राजसभा युवराज दुर्योधन ने बुलाई थी। वह अत्यंत क्रोधित दिख रहा था। उसने धृतराष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, "महाराज, पांडव जीवित हैं और उन्हें आपने हस्तिनापुर बुला लिया। वे यहां आकर अव्यवस्था फैलाएंगे। आज जब सब कुछ सकुशल चल रहा है, उनके आने से सब अव्यवस्थित हो जाएगा। वे सम्राट से अपना अनुचित अधिकार मांगेंगे, मंत्रीपद चाहेंगे। युधिष्ठिर तो कदाचित युवराज पद पर ही अपना दावा कर सकता है या आपको ही सिंहासन से उतरने के लिए कहा जा सकता है। महाराज, उनका रक्त भी तो कुरु-रक्त नहीं है।"
अंधा राजा बोला, "तो तुम क्या सलाह देते हो युवराज?"
"उन्हें यहां ना आने दिया जाए। जो राज्य में अव्यवस्था फैलाना चाहते हों, वे शत्रु ही हैं। मैं तो कहता हूं कि सेना सजा कर उन पर आक्रमण कर दिया जाए। उन्हें बन्दी बनाकर कारागार में डाल दे या उनका वध कर दें।"
आचार्य द्रोण बोले, "वध? पांडवों का वध प्रत्यक्ष युद्ध में? युवराज, वे पांडव हैं कोई गाजर मूली नहीं जो तुम खेल-खेल में ही उन्हें काट सको। मत भूलो कि उधर अर्जुन है, अर्जुन। और उसके साथ खड़े हैं भीम, कृष्ण, बलराम, सात्यकि, कृतवर्मा, सारे यादव अतिरथी योद्धा, द्रुपद और उसके साथ सारे सोमवंशी राजा, मत्स्य नरेश विराट, नागराज कर्कोटक, गन्धर्वराज चित्रसेन। हस्तिनापुर का सैन्य-प्रमुख होने के अधिकार से भी मैं ये कहता हूं कि हमारी सेना पांडवों के नेतृत्व वाली पांचाल, यादव, मत्स्य, गन्धर्व तथा नागों की सम्मिलित सेना के समक्ष टिक नहीं सकेगी।"
धृतराष्ट्र बोला, "तो आपका क्या सुझाव है आचार्य द्रोण?"
"राजन, यह सही है कि अभी आप महाराज हैं तथा दुर्योधन युवराज। परंतु आप कार्यकारी राजा हैं। महाराज पांडु के ना होने पर आपको कार्यभार सौंपा गया था, राजा के रूप में आपका अभिषेक नहीं हुआ। परिस्थिति कुछ ऐसी बनी कि पांडवों की अनुपस्थिति में दुर्योधन का युवराज के रूप में अभिषेक हुआ। यद्यपि युधिष्ठिर ने आपके कहने पर यह पद त्याग दिया था पर उसका अधिकार सिद्ध है। उसे युवराज अथवा सम्राट बनना चाहिए। यहां यह भी देखना है कि अधिकार भले उसका हो, आधिपत्य दुर्योधन का है जो इसे किसी भी तरह छोड़ना नहीं चाहता। तो मेरा सुझाव यह है कि राज्य का बंटवारा कर दिया जाए। एक भाग पर आप अथवा दुर्योधन राज करें तथा दूसरे पर युधिष्ठिर का स्वतंत्र राजा के रूप में अभिषेक हो।"
सभा में पल भर के लिए सन्नाटा छा गया, जिसे देवव्रत भीष्म की क्रोधित वाणी ने भंग किया, "आचार्य द्रोण! क्या कहा आपने? बंटवारा! मेरे पूर्वजों की इस भूमि का बंटवारा? आप ऐसा सुझाव दे भी कैसे पाए? क्या आपको नहीं पता कि राज्य का बंटवारा स्थाई शत्रुता का कारण बनता है? कभी एक ही देश के नागरिक इस छुद्र राजनीति के कारण आजन्म शत्रु बन एक दूसरे के रक्त के प्यासे हो जाते हैं? किसी अन्य का आधिपत्य मात्र होने से क्या राज्य के अधिकारी से उसका आधा राज्य छीनकर उसे दण्ड दिया जाएगा? यदि आधिपत्य ही कसौटी है तो कल भविष्य में भी क्या किसी अन्य के आधिपत्य से राष्ट्र के और टुकड़े नहीं होंगे? फिर ये राष्ट्र का टूटना कब तक चलेगा, कोई अनुमान है किसी को?
मेरे पितृव्य देवापि ने राज्य का मोह छोड़ अपने अनुज अर्थात मेरे पिता शांतनु को सम्राट बनाया। महात्मा देवापि के पुत्र-पौत्र भी हैं इस कुरु-सभा में, उन्होंने तो कभी सम्राट शांतनु के वंशजों के राजसिंहासन पर बैठने को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई। तो आज दुर्योधन को क्या आपत्ति है? ये सिंहासन पांडु का है, उसके पश्चात उसके पुत्रों का। धृतराष्ट्र का इस पर कोई अधिकार नहीं, ना ही उसके पुत्रों का। यदि वंश ना भी देखें तब भी युधिष्ठिर राजा बनने के लिए किसी भी अन्य कुरु-कुमार से अधिक योग्य है।
और तुमने क्या कहा दुर्योधन, कि उनका रक्त कुरु-रक्त नहीं है? क्या तुम्हें नहीं पता कि तुम्हारे पिता, तुम्हारे पितामह विचित्रवीर्य की औरस सन्तान नहीं हैं? यदि तुम पांडवों को पांडु का पुत्र नहीं मानोगे तो अपने पिता को भी कुरु-वंशज विचित्रवीर्य की संतान नहीं मान पाओगे। सिंहासन पर तुम्हारा दावा तो तुम्हारे ही तर्क से अप्रमाणित हो जाएगा पुत्र।
यदि कुरु-रक्त ही सिंहासन का अधिकारी है तो यहां मात्र मैं ही अधिकारी हूँ और यह मेरा निर्णय है कि पांडवों के आते ही युधिष्ठिर का हस्तिनापुर के सम्राट के रूप में अभिषेक किया जाएगा। दुर्योधन चाहे तो युवराज बना रह सकता है, या हस्तिनापुर के अधीन किसी राज्य का मांडलिक परन्तु स्वायत्त राजा बन सकता है।"
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अजीत
21 नवम्बर 17

Saturday, 11 November 2017

भानुमति_11

भानुमति_11
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नए राजा वृकोदर ने अपनी पहली ही राजाज्ञा द्वारा नरमांस-भक्षण निषेध कर दिया था। दोषी राक्षसों के लिए प्राणदण्ड का प्रावधान था। परंतु दण्ड कितना भी कठिन हो, अपराधी अपराध करना कहाँ छोड़ते हैं। जिह्वा के दास कुछ राक्षस प्रायः ही मुख्य बस्ती से दूर जाकर अपनी जठराग्नि शांत करते। जब हिडिम्ब राजा था तो वे शिकार करने निकटवर्ती राज्यों में निकल जाते। युद्ध और विज्ञान में प्रवीण आर्यों की बस्तियों में वे अधिक सफल नहीं होते पर आर्यों की तुलना में कम विकसित नागों की बस्तियां उनका आसान शिकार होती। पहले जो शिकार वैध था अब राजा वृकोदर के सत्ता संभालने पर अवैध हो गया था।
ऐसे ही किसी अभियान में जब राक्षस नागों की किसी बस्ती से वापस लौट रहे थे, उनके साथ का एक दस वर्षीय बालक किसी गड्ढे में गिरकर घायल हो गया। उसे मरा हुआ समझ उसके साथियों ने उसे वही छोड़ दिया। वह बालक मृत्यु की प्रतीक्षा करता वही पड़ा रहा कि उसपर भगवान विरोचन की कृपा हुई, पांडवों की खोज में निकले उद्धव ने उसे देख लिया। मानव मात्र के लिए प्रेम से भरे उद्धव के लिए उसे वहीं छोड़कर आगे बढ़ जाना सम्भव नहीं था। उन्होंने उसे गढ्ढे से निकाला और अपने अथर्ववेद के ज्ञान से उसे कुछ ही दिनों में ठीक कर दिया। 
जहाँ प्रेम हो वहां भाषा की कठिनाई नहीं आती, बालक और उद्धव संकेतों में बात करते। एक दिन बालक कुम्भ के मुंह से अस्पष्ट सा शब्द 'भीम' निकला। उद्धव के कानों को यह शब्द अमृत जैसा लगा। उन्होंने कुम्भ से संकेतों में ही ढेरों प्रश्न किये। उन्हें समझ आया कि एक विशाल व्यक्ति अपने कुछ साथियों के साथ कुम्भ की बस्ती में रहता है। उत्साह से भरे उद्धव बालक कुम्भ के साथ उसकी बस्ती की ओर चल पड़े।
एक दोपहर उन्हें वन में हलचल सुनाई दी। राक्षसों का झुंड उनकी ओर बढ़ रहा था। कुम्भ तत्काल ही एक ऊंचे वृक्ष पर चढ़ा और नीचे उतर कर उद्धव को उनकी विपरीत दिशा में खींचने लगा। उद्धव को समझ नहीं आया कि अपने सजातीय राक्षसों की ओर जाने की अपेक्षा कुम्भ उन्हें दूर क्यों ले जाना चाहता है। वे अभी इसी उहापोह में थे कि वन शांत हो गया, जैसे उन्हें मानव गंध मिल गई हो। अस्पष्ट ध्वनियों से यह निश्चित हो गया कि उन्हें एक लंबे वृत्त में घेरा जा रहा है। कुम्भ ने यकायक ही उनसे अपना हाथ छुड़ाकर उन्हें वृक्ष पर चढ़ जाने का संकेत किया और स्वयं तीर की तेजी से झाड़ियों की ओर दौड़कर विलुप्त हो गया।
ध्वनियां पास आती गई। उद्धव ने अपने अस्त्र-शस्त्र देखे, केवल एक धनुष, कुछ बाण और एक कटार शेष रह गई थी। वन के उबड़-खाबड़ पथरीले मार्गों पर खड्ग, गदा या भरा हुआ तुरिण लेकर चलना अव्यवहारिक सोचकर उन्होंने पहले ही उनका त्याग कर दिया था। इनके बल पर भिड़ना वीरता नहीं मूर्खता होगी, यह विचार कर वे पेड़ पर चढ़ गए।
धीरे-धीरे वे राक्षस आये और उद्धव को पेड़ पर चढ़ा देख शोर करने लगे। उनकी आवाज इतनी भयंकर थी कि कोई सामान्य व्यक्ति हृदयाघात से वहीं मर जाता। उद्धव बहुत वीर थे परंतु उनकी रीढ़ में भी शीतल जल बह चला। उन्होंने पेड़ की शाखा कसकर पकड़ ली। राक्षसों की संख्या तीस के आसपास थी, और उनके साथ रस्सियों में जकड़े दो अभागे मानव भी थे। एक राक्षस ने पेड़ पर चढ़ने का प्रयास किया जिसे उन्होंने तीर मारकर नीचे गिरा दिया।
थोड़े समय पश्चात राक्षसों ने उद्धव से ध्यान हटा लिया। कदाचित यह सोचा हो कि ये तो पेड़ पर ही है, जब चाहेंगे, उतार लेंगे। उनमें से कुछ सूखी टहनियां तथा कुछ बड़े-बड़े पत्थर ले आये। आग लगाकर पत्थरों को गर्म किया गया और फिर उन अभागे मनुष्यों को उनपर बिठा दिया गया। मर्मान्तक चीखों से वन गूंज उठा और उद्धव की आखों से यह सोचकर अश्रु बह चले कि मुझ क्षत्रिय के होते हुए यह अत्याचार हो रहा है और मैं कुछ कर भी नहीं सकता।
अर्धरात्रि में राक्षसों का महाभोज शुरू हुआ और सुबह तक चला। काटने, चबाने और डकार की भयंकर आवाजों ने उद्धव को पागल सा कर दिया था। कहीं वे इस मनस्थिति में वृक्ष से कूद ना जाये, उन्होंने स्वयं को दुप्पटे द्वारा एक तने से बांध लिया।
अगला पूरा दिन राक्षस सोते रहे और उद्धव थकान, चिरांध और उस वीभत्स भोज से आंदोलित अर्धमूर्छित अवस्था में थे। उन्हें लगता कि अब किसी भी समय वे गिर पड़ेंगे, या कोई राक्षस ऊपर चढ़कर उन्हें नीचे धकेल देगा। उन्हें भी गर्म पत्थर पर भूना जाएगा, उनके शरीर को खंड-खंड कर इन राक्षसों का भोजन बना दिया जाएगा। उन्हें कभी-कभी कृष्ण दिखाई देते जो उनकी तरफ बढ़े चले आ रहे थे। अपनी पत्नियां कपिला और पिंगला दिखाई देती, पिता देवभाग दिखाई देते। उन्होंने कृष्ण के साथ, कृष्ण के लिए अनगिनत पराक्रम के काम किये थे, पर आज कायरों की भांति इस वृक्ष पर खुद को बांधे अपनी निश्चित मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे  थे। उनके हृदय से आवाज निकली, 'हे गोविंद, तेरा ये भक्त तुझे अपने हृदय में समाए तुझमें विलीन होता है। मुझे मुक्त कर, यमराज मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं'। उन्हें कृष्ण की गूंजती आवाज सुनाई दी, 'जब तक कृष्ण जीवित है, उद्धव को यमराज नहीं ले जा सकेंगे'।
दूर कहीं हलचल से उद्धव की तन्द्रा टूटी तो उन्होंने देखा कि मांसभक्षी राक्षसों में भगदड़ मची थी और सैनिकों जैसे लगने वाले राक्षस उन्हें पकड़ रहे थे। वृक्ष के नीचे कुम्भ के साथ खड़े एक अतिविशाल राक्षस ने विशुद्ध देववाणी में उनसे कहा, "अरे बन्दर, डाली से क्या चिपका है। कूद जा, राजा वृकोदर की ये बलिष्ठ बाहें तुझे लपक लेंगी।"
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नींद से बोझिल आंखें जब दुबारा खुली तो उन्होंने भाई भीमसेन को देखा, जिन्होंने राक्षसी भड़कीले वस्त्र पहने थे, बस एक अंतर था कि उनके दांत राक्षसों की तरह घिस कर नुकीले नहीं बनाए गए थे। भीम ने उनकी तरफ देखकर कहा, "उठ गया? अभी और सो ले। तब तक इन राक्षसों को दंड दे लूँ।"
अगली सुबह वे सभी मुख्य बस्ती गए। रास्ते में उन्होंने भीम से पूछा, "तुम इनके राजा कैसे बन गए?"
भीम ने अपनी गूंजती आवाज में कहा,"जब पापी दुर्योधन ने हमें जलाकर मारने का षडयंत्र किया था तो चाचा विदुर के आदेशानुसार हम इधर वन की ओर चल दिये। यद्यपि मुझे समझ नहीं आया कि साक्ष्य होते हुए भी अपराधी दुर्योधन के स्थान पर हमें सजा क्यों दी जा रही है। यदि बड़े भैया का आदेश ना होता तो मैं उसी समय हस्तिनापुर जाकर दुर्योधन को पटक-पटक कर मार डालता।
वन में एक रात्रि जब सभी विश्राम कर रहे थे, राक्षसों का राजा हिडिम्ब अपनी बहन हिडिम्बा सहित आ धमका। तुम मेरी देह तो देख ही रहे हो, उसे लगा होगा कि इस एक व्यक्ति से कई दिनों तक उसकी उदरपूर्ति होती रहेगी। मुझसे आ भिड़ा, और जानते हो उद्धव, मैंने दुर्योधन, कर्ण, शकुनि का सारा क्रोध उस अभागे राक्षस पर उतार दिया। उसको इतना पटका कि उसकी हड्डियों का चूरा बन गया।
इनकी संस्कृति हमसे अलग है। पिता या भाई की द्वंदयुद्ध में वध करने वाले वीर से ये प्रेम करने लगती हैं, उनसे विवाह करती हैं। चूंकि ये आर्य कन्या नहीं थी, माता ने बड़े भाई के होते हुए भी आपद्धर्म मान मुझे हिडिम्बा से विवाह करने की अनुमति दी। तुम मिलना उससे, वह बहुत ही अच्छी है। हमारी संस्कृति समझने का, अपनाने का प्रयास करती है।"
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माता सत्यवती के आदेश पर महामुनि व्यास राक्षसावर्त पधारे थे। राक्षस राजा वृकोदर तथा नागराजा कर्कोटक के मध्य उद्धव की मध्यस्थता से संधि हो गई थी। संधि के अनुसार अब नागों के सीमावर्ती गाँवों की सुरक्षा राक्षस करते थे। मांस, चमड़े तथा औषधियों का व्यापार, कृषि, पशुपालन, शिकार तथा सुरक्षा की तकनीकों का आदान प्रदान शुरू हुआ था तथा नए मार्ग बनाये जा रहे थे।
महामुनि का आना राक्षसों के लिए कौतूहल का विषय था। उनकी आंखें तब फटी रह गई जब उन्होंने अपने महान राजा को किसी दास की तरह उनके चरणों में लोटता हुआ पाया। राजा की बूढ़ी माता तथा अन्य भाइयों ने भी उसी प्रकार अभिवादन किया। देखा देखी राक्षसों ने भी दण्डवत करने का प्रयास किया।
औपचारिकताओं के पश्चात महामुनि कुंती से बोले, "कैसी हो पुत्री, सब कुशल तो है?"
"हाँ गुरुवर। मेरे पुत्र जहाँ हों वहां कुशलता क्योंकर नहीं होगी। मेरा तो अधिकांश जीवन ही वनों में बीता है। परंतु आर्यपुत्र के साथ हम जिस भी वन में रहे वे सभी आर्य ऋषि थे। यहां की संस्कृति हमसे भिन्न है।"
"सब एक जैसे ही हो जाएं तो जीवन में माधुर्य कहाँ बचेगा पुत्री। तुम सुनाओ पुत्रो, तुम सब कैसे हो?"
नकुल बोल पड़े, "पितामह, आपके दर्शनों से हम अत्यंत प्रसन्न हैं। परंतु यहां सबसे अधिक दुखी मैं ही हूँ। बड़े भैया को तो बस धर्मचर्चा के लिए एक भी व्यक्ति मिले तो ये सारा जीवन कहीं भी काट सकते हैं, कोई नहीं मिला तो माता तो हैं ही। भैया भीम तो यहां के राजा ही हैं, इन्हें राजकाज से ही अवकाश नहीं मिलता, जो मिला भी तो भाभी हिडिम्बा के साथ वन में घूमते रहते हैं। ये सव्यसाची अर्जुन, महान धनुर्धर वनों में अपने खिलौना धनुष-बाण से मृगया करते रहते हैं, राक्षस बालकों को धनुर्विद्या सिखाते हैं। अब तो घटोत्कच भी आ गया है तो उसी के साथ लगे रहते हैं। फिर ये मेरे प्रिय सहदेव हैं, ये कभी सीधे देखते ही नहीं। या तो ऊपर आकाश में तारों को देखते हैं या नीचे धरती पर आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचते रहते हैं। बचा मैं, मैं अपना समय काटने के लिए यहां बकरियों और खरगोशों को प्रशिक्षित करता हूँ, अगली सुबह तक वे राजा वृकोदर की प्रजा के उदर में समा जाते हैं। मुझे लगता है पितामह कि हम सब भूल गए हैं कि हम क्षत्रिय हैं, वनवासी नहीं।"
"तो तुम सब बाहर क्यों नहीं आते? वन में क्यों छुपे हो? क्या दुर्योधन से डरते हो?"
"पाण्डुपुत्र किसी से नहीं डरते गुरुदेव। ये तो हमारे बड़े भैया का आदेश है कि हमें उचित समय तक वन में ही रहना चाहिए।"
"हूँ, और धर्मराज युधिष्ठिर, वह उचित समय कब आएगा पुत्र?"
सत्यनिष्ठ युधिष्ठिर अपने युवराजत्व के अल्पकाल में ही अपनी न्यायप्रियता और सदाशयता के कारण चहुँओर धर्मराज के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे, बोले, "पितामह, चाचा विदुर ने हमें लाक्षागृह की गुप्तसूचना दी थी, और वन में छुपे रहने के लिए कहा था। वे जब कहें, हम स्वयं को प्रकट करने के लिए सज्ज हैं।"
भीम बोले, "मुझे समझ नहीं आता कि हमें छुपे रहने की आवश्यकता ही क्या थी, हम क्यों बार-बार दुर्योधन से छुपते फिरें। मेरे हाथ में मेरी गदा हो, अर्जुन के पास उसका धनुष, खड्गधारी नकुल हो तो हमें त्रिलोक में कौन हारा सकता है?"
"तुम्हें इसलिए छिपना था पुत्र कि आमने-सामने के युद्ध में भले ही त्रिलोक में तुम्हें कोई ना हरा सके पर पीठ पीछे किये गए प्रहार का क्या उत्तर है तुम्हारे पास? तुम एक बार बचोगे, दो बार बचोगे, बारम्बार कैसे बच पाओगे। स्मरण रखो, उन्हें बस एक बार ही तो सफल होना है। यदि आज तुम्हें शस्त्र दे भी दिए जाएं तो भी तुम्हें दुर्योधन पर वार नहीं करने दिया जाएगा, और उसे वार करने से कोई रोक नहीं सकेगा। हम चाहते हैं कि तुम इतने शक्तिशाली बनो कि तुम्हारा अहित करने का विचार भी कोई अपने मन में ना ला सके।"
धर्मराज बोले, "तो हमें क्या करना चाहिए गुरुदेव?"
"इस वनवास का समय समाप्त हुआ। श्रीकृष्ण इस प्रयास में हैं कि तुम जब संसार के सामने आओ तो पर्याप्त शक्तिशाली होकर आओ। कुछ ही समय में याज्ञसेनी द्रौपदी का स्वयंवर है। गोविंद चाहते हैं कि तुम सब उसमें सम्मिलित हो। काम्पिल्य नरेश को अपने जमाता के रूप में सर्वश्रेष्ठ वीर चाहिए, तो आज पाण्डवों से बढ़कर वीर कौन है? पांडवों को शक्तिशाली मित्र चाहिए, तो आर्यावर्त में पांचालों के अतिरिक्त सामर्थ्यवान तथा धर्मपरायण कौन हो सकता है भला? राजनीति बदल रही है पुत्रो, इस एक विवाह से कई पुराने समीकरण टूटेंगे तो कई नई संधियां जन्म लेंगी। पुरुषार्थ दिखाने का इससे उत्तम अवसर नहीं मिलेगा पुत्रो।"
भीम की भुजाएं फड़कने लगी, पराक्रम प्रदर्शन का कोई अवसर वे नहीं छोड़ना चाहते थे। परंतु जितनी तीव्रता से उनके चेहरे पर चमक आई थी, उतनी ही तीव्रता से उनका चेहरा कुम्हला गया। महामुनि ने इसे देखा और मुस्कुराते हुए पूछा, "क्या हुआ पुत्र? तुम विचलित दिख रहे हो।"
"पितामह, मेरा पुत्र घटोत्कच, मैं उसे छोड़कर कैसे जाऊं? वह अभी केवल 4 माह का है। हमारे अपने पिता हमें बाल्यावस्था में ही छोड़ दिवंगत हो गए थे। उनके ना रहने पर हम भाइयों ने सदैव ही सौतेलापन पाया है। अपने अधिकारों के लिए भी हमें भिक्षुक समान माना गया। मैं अपने पुत्र के लिए ऐसी परिस्थिति नहीं चाहता पितामह।"
"बालकों जैसी बातें ना करो पाण्डुपुत्र भीम। क्या पांडु के ना होने पर मैंने, भीष्म ने या विदुर ने तुम लोगों में कभी भेद किया है, तुम्हारे गुरु द्रोण ने तुम्हें कम शिक्षा दी? किसी के होने ना होने से सृष्टि रुक नहीं जाती पुत्र। बंधन में मत बंधो, अपना कर्म करो। रही घटोत्कच की बात, तो उसे मैं देखूंगा कि वह शास्त्र और शस्त्र में पारंगत हो। वह एक महान योद्धा बनेगा पुत्र, और संसार तुम्हें उसके पिता के रूप में याद रखेगा।"
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प्रस्थान से एक दिन पूर्व हिडिम्बा अपने पति राजा वृकोदर को एक अत्यंत ही मनोरम स्थान पर ले आयी। भीम ने प्रकृति की ऐसी अद्भुत छटा पहले कभी नहीं देखी थी। यकायक उनके मुख से उद्गार निकला, "अहा, ये तो साक्षात स्वर्ग है। मन करता है कि आजीवन यहीं रह जाऊं।"
हिडिम्बा बोली, "तो रह क्यों नहीं जाते वृकोदर? क्यों जाना चाहते हो यहां से? ये दृश्य तो कुछ भी नहीं, मैं तुम्हें ऐसे-ऐसे स्थान दिखाउंगी जो तुम्हारी जाति के किसी मनुष्य की कल्पना में भी नहीं आये होंगे। तुमनें इसे स्वर्ग कहा, परन्तु तुम्हें उन स्थानों के लिए कोई शब्द नहीं मिलेगा।"
भीम चुप ही रहे तो हिडिम्बा पुनः बोली, "और तुम चाहते हो कि मैं भी तुम्हारे साथ चलूँ। पर क्या तुम्हारे नगर यहां की तरह हैं? क्या वहां मुझे वही स्वतंत्रता प्राप्त होगी जो यहां हैं? तुम्हारी माता कुंती मुझे बहुत प्रेम करती हैं, मेरी गर्भावस्था में उन्होंने मेरा इतना ध्यान रखा कि जब भी सोचती हूँ, आंखों में अश्रु आ जाते हैं। पर उनके अनुशासन में मेरी सांस रुकती है। यदि एक आर्य स्त्री के होने पर ऐसा है तो मुझे डर है कि अनेक आर्य स्त्रियों की रोकटोक से मैं कहीं मर ही ना जाऊं।
मुझे यह भी समझ नहीं आता कि उनके चार अन्य पुत्र भी तो हैं, वे मेरे पति को मुझे सौंप क्यों नहीं देती, मेरे पति को भी अपने साथ क्यों रखना चाहती हैं। हमारे यहां तो वयस्क होते ही पुरुष अपनी पत्नी के साथ अलग हो जाता है।"
"सालकंटकटी, क्या तुम नहीं जानती कि मैं यहीं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं, पर यह असम्भव है। यदि तुम मेरा वास्तविक परिचय जानती तो कदाचित तुम मुझे रोकने का प्रयास नहीं करती। आह! यदि मैं तुम्हें बता सकता कि हमारा पुत्र केवल विरोचन का ही वंशज नहीं, अपितु संसार के श्रेष्ठतम कुल का उत्तराधिकारी है। यदि मैं तुमसे तुम्हारे पुत्र को अलग कर दूं तो तुम्हें कैसा लगेगा? मैं भी तो अपनी माता का प्रिय पुत्र हूँ, उनसे अलग कैसे रह सकता हूँ? मैं माता से उसके पुत्र को अलग नहीं करना चाहता पर मेरा पुत्र अनन्य वीर होना चाहिए प्रिये। उसे वीर बनाना।"
"इसमें कोई संदेह हैं क्या, वह वीर पुत्र है। वीर ही बनेगा।"
"केवल किसी का पुत्र होने भर से कोई वीर नहीं होता हिडिम्बा, उसे आधुनिक शिक्षा लेनी होती है, संस्कार सीखने होते हैं।"
"कभी-कभी तुम विचित्र बातें करते हों। हमारे समाज में ये सब नहीं होता तो क्या हम लोग वीर नहीं हैं?"
"तुम वीरता किसे मानती हो? तुम्हें लगता है कि तुम्हारा भाई बहुत वीर था?"
"हाँ, क्या वो वीर नहीं था? उसके भय से सभी कांपते थे, कोई उसके पास नहीं आता था। हमारे इस वन में मनुष्य पैर नहीं रखते थे।"
"तुम इसे वीरता कहती हो? क्या मेरे पुत्र को भी तुम अपने भाई जैसा ही वीर बनाओगी? क्या वह भी किसी पेड़ पर बैठा जंगली पशु या किसी मानव की प्रतीक्षा करता हुआ लटका रहेगा, और आखेट मिलते ही उसे कच्चा चबा जाएगा? अच्छा हिडिम्बा, क्या मैं वीर नहीं हूं?"
"तुम तो वीरों के वीर हो, तुमसे अधिक वीर पुरुष मैंने नहीं देखा।"
"तो क्या मैंने कभी किसी मानव या राक्षस की हत्या कर उसका मांस खाया? जब मैंने हिडिम्ब का वध किया तो तुम्हारी प्रथा के अनुसार तुम्हारे पुजारियों ने उसे पकाकर खा जाने का प्रस्ताव किया था, तुम भी उसकी खोपड़ी अपने पास रखना चाहती थी। मैंने ये सब नहीं होने दिया।
हिडिम्ब की प्रजा उससे भय खाती थी, उसके राज्य में कोई मनुष्य प्रवेश नहीं करता था। परंतु आज तुम्हारे समाज का कोई बालक भी निःसंकोच मेरे पास आ जाता है। नागों और आर्यों से व्यापार शुरू हुआ है।
तुम्हारा भाई केवल अपना पेट भरने के लिए हत्याएं करता फिरता था, मैंने अपनी, अपने माता तथा भाइयों की प्राणरक्षा के लिए उसका वध किया। मैंने अपने प्राणों को संकट में डाल अनगिनत मानव-मांसभक्षी राक्षसों का वध किया। मेरे पुत्र को मुझ जैसा वीर बनाना। संसार यह जाने कि वह मेरा पुत्र हैं, कि मैं घटोत्कच का पिता हूँ। उसे जिस भी गुरु से शिक्षा दिलवाना पर उसे मूल शिक्षा तुम देना कि उसे कमजोरों की ढाल बनना है, और आतताइयों का वध करना है।"
"तो क्या उसे तुम्हारे समाज में जाना होगा। तुम लोगों की रीतियाँ अपनानी होंगी।"
"यदि ऐसा करने से कुछ शुभ हो तो अवश्य। संस्कृतियों को एक दूसरे में मिल ही जाना चाहिए। जो तुमसे अलग हैं, आवश्यक नहीं कि तुम्हारे शत्रु ही हों। उनसे कुछ सीखो, उन्हें कुछ सिखाओ। एक दूसरे को नष्ट करने की अपेक्षा साथ रहकर स्वयं का विकास प्रत्येक दृष्टि से शुभ है प्रिये।"
"ठीक है वृकोदर, मुझे मेरा मार्ग दिख गया है। मैं अपने पुत्र को उसके पिता जैसा वीर बनाउंगी। वह राक्षसों के आर्य राजा वृकोदर का सच्चा उत्तराधिकारी होगा। मुझे वचन दो कि यदि भविष्य में कभी तुम संकट में घिरे तो हमें बुलाने में संकोच नहीं करोगे। हमसे सम्पर्क बनाये रखना प्रिय, हमें स्मरण रखना"
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अजीत
12 नवम्बर 17